The Token System – Chapter 933
और छत पर, ऊपर, एक छोटी सी खिड़की से रोशनी आ रही थी।
यही कमरा था।
मैंने चारों तरफ़ देखा। दीवारों पर ताले थे। बहुत सारे। ज़ंजीरें लटक रही थीं।
और एक कोने में, एक चारपाई पर, एक औरत बैठी थी।
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसके बाल बिखरे थे। गाल धँसे हुए। कपड़े फटे।
पर उसकी आँखें — बीरा देवी की आँखें।
"तुम कौन हो?" उसने पूछा। उसकी आवाज़ रुंधी थी।
"मैं मन्नू हूँ," मैंने कहा। "अमर का दोस्त।"
उसके होंठ काँपे।
"अमर… मेरा अमर…"
"वो ठीक है," मैंने कहा। "अस्पताल में है। उसने तुम्हें देखा। सपने में।"
वो रोने लगी। धीरे, बिना आवाज़ के। फिर उसने अपना हाथ बढ़ाया।
"ये सिक्का," उसने कहा, "मेरे पास था। मैंने इसके बारे में सोचा था आज।"
"तुमने लक्ष्मी को दिया था।"
उसने सिर हिलाया।
"मुझे पता था," उसने कहा, "कि एक दिन कोई आएगा।"
"कौन?"
"तुम," उसने कहा। "मेरे अमर ने तुम्हारा नाम लिया था। बुख़ार में। बहुत बार।"
मैंने उसका हाथ पकड़ा।
"चलो," मैंने कहा। "मैं तुम्हें बाहर ले चलता हूँ।"
हम सीढ़ियों की तरफ़ बढ़े। फिर मेरी जेब में टोकन गरम हुआ। मैंने निकाला।
उस पर तीन शब्द उभरे थे —
"अभी नहीं।"
मैं रुका।
"क्या हुआ?" बीरा ने पूछा।
"ये कह रहा है — अभी नहीं।" मैंने चारों तरफ़ देखा। "कुछ और बाक़ी है।"
मैंने कमरे में नज़र दौड़ाई। ताले, ज़ंजीरें, पानी…
और फिर मैंने देखा — उस चारपाई के नीचे, एक चीज़ रखी थी।
मैंने झुककर उसे निकाला।
एक मोटी, भूरी जिल्द की किताब।
पहला पन्ना खोला।
ऊपर लिखा था — "हिसाब। तीसरा हिस्सा।"
और उसके नीचे, एक लाइन में, एक नाम —
"राधे।"
बीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"ये किताब," उसने धीरे कहा, "मेरे पास रखी थी। पिछले बीस साल से। किसी ने नहीं छीनी।"
"क्यों नहीं छीनी?"
"क्योंकि वो जानते थे," उसने कहा, "कि इसे पढ़ेगा वही, जो इसे समझेगा।"
मैंने किताब बंद की। जेब में डाली।
"अब चलो।"
हम सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। मेरे पीछे बीरा। धीरे। बहुत धीरे।
जब मैं ऊपर पहुँचा, तो दरवाज़े पर राजेंद्र खड़ा था।
उसने बीरा को देखा और उसकी पिस्तौल नीची हो गई।
"ये…"
"बीरा देवी," मैंने कहा। "अमर की माँ।"
सुमन भागकर आई। उसने बीरा को देखा और उसकी आँखों में आँसू आ गए।
"बीरा दीदी…"
बीरा ने उसे देखा।
"सुमन," उसने कहा। "तुम बड़ी हो गईं।"
सुमन उसे गले लगाने लगी।
मैंने राजेंद्र की तरफ़ देखा।
"जो किताब मिली है," मैंने धीरे कहा, "वो हवेली के तीसरे हिस्से का हिसाब है। और उसमें एक नाम है — राधे।"
"तो राधे कौन है?"
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "पर ये किताब कहेगी।"
मैंने किताब खोली। पन्ने पलटे। हिसाब के कॉलम, नाम, तारीख़ें।
और फिर, आख़िरी पन्ने पर, एक लाइन लिखी थी, नई स्याही में —
"जो इसे पढ़ेगा, वो मुझे ढूँढेगा। मैं हवेली में हूँ। — राधे।"
मैंने किताब बंद की। मेरे हाथ ठंडे थे।
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
"अब?"
मैंने दीवार की तरफ़ देखा। दरवाज़ा बंद हो रहा था। धीरे-धीरे। जैसे साँस ले रहा हो।
"अब," मैंने कहा, "हम राधे को ढूँढेंगे।"
और तभी, दूर, आँगन की तरफ़ से, एक आवाज़ आई।
कोई गा रहा था।
धीरे। बहुत धीरे।
वही आवाज़ जो अमर ने सुनी थी।
॥
बंसी की दुकान का शटर मैंने आधा उठाया, तो वो अंदर बैठा कुल्हड़ पर चाय फूँक रहा था।
"अरे, सुबह-सुबह?" उसने कुल्हड़ नीचे रखा। "फ़ैसले के दिन इतनी जल्दी उठ गया?"
"तिजोरी खोल।"
"क्या हुआ?"
"खोल, बंसी।"
उसने चाय की केतली उतारी, खाट के नीचे से चाबी निकाली और दुकान के पीछे वाले कमरे का ताला खोला। लोहे की छोटी तिजोरी। उसने घुमाया, खोली, और रूमाल में लिपटा टोकन मेरे हाथ में रख दिया।
टोकन ठंडा था। एकदम ठंडा। जैसे रात भर खुले आसमान में पड़ा रहा हो।
पर जब मैंने उसे हथेली पर उलटा, तो मेरा हाथ नीचे को झुक गया।
"ये भारी है।"
"भारी तो पहले भी थी।" बंसी ने पास आकर देखा।
"नहीं, बंसी। ये बढ़ गई है।"
उसने अपने हाथ से वज़न उठाया, फिर मेरी तरफ़ देखा।
"सच कहूँ तो लग रहा है जैसे इसने रात में कोई बोझ उठा लिया हो। किसी का।"
"किसका?"
"वो तो ये ख़ुद बताएगा।" उसने कंधे उचकाए।
मैंने टोकन जेब में रखा और दूसरी जेब से नर्स का सिक्का निकाला — वो जो लक्ष्मी ने बीस साल संभालकर रखा था। उलटा कोना-चिह्न। बंसी ने उसे उँगलियों में घुमाया।
"ये तो…"
"बीरा देवी का।"
"यानी अमर की माँ का?"
"हाँ।"
उसने सिक्का मुझे लौटाया और फिर मैंने जेब से राजेंद्र वाला नक्शा खोला। पीला, मोटा काग़ज़। स्याही फीकी, पर लकीरें साफ़।
बंसी ने नक्शे पर उँगली रखी और उसका चेहरा बदल गया।
"ये कमरा…" उसने धीरे कहा।
"क्या?"
"ये मैंने सुना था। बचपन में।" उसने खाट पर बैठते हुए कहा। "मेरे पापा बताते थे कि पुराने ज़माने में हवेली में एक भीतरी कमरा था जहाँ रामेश्वर लाल अपना खाता रखता था। वो खाता जो किसी को नहीं दिखता था।"
"रामेश्वर लाल?"
"वही जो हरि सिंह बन गया।" बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "उस कमरे का दरवाज़ा बाहर से नहीं था, भाई। दीवार के पीछे था। मेरे पापा कहते थे — एक आदमी गया, दो आए।"
"दो?"
"उसने कभी नहीं बताया। बस इतना कहता था — जो खाता देख ले, वो वापस आदमी नहीं रहता।"
मेरी जेब में टोकन हल्का गरम हुआ। फिर ठंडा।
"मुझे वहाँ जाना है," मैंने कहा। "उसी कमरे में।"
"आज नहीं।"
"बंसी—"
"आज फ़ैसला है, मन्नू।" उसने केतली उठाई। "नौ बजे अदालत। तेरा नाम पहला गवाह है। और तू कहेगा कि तू कमरे में गया और वापस आ गया — बस। पहले फ़ैसला।"
मैंने नक्शा मोड़ा।
"अगर फ़ैसला हमारे हक़ में नहीं हुआ?"
"तो कमरा भी हमारा नहीं।" उसने चाय मेरी तरफ़ बढ़ाई। "पी ले।"
मैंने कुल्हड़ पकड़ा ही था कि दुकान के बाहर चप्पलों की आवाज़ आई। छोटू अंदर आया, हाँफता हुआ। उसके माथे पर पसीना था और पैरों में धूल।
"मन्नू भैया—"
"क्या हुआ?"
"अस्पताल के बाहर एक सफ़ेद गाड़ी खड़ी है।" उसने साँस लेकर कहा। "उसमें एक आदमी बैठा है। बड़ा। सफ़ेद कुर्ता। उसके हाथ पर ज़ख़्म है। उलटा।"
मेरे हाथ से कुल्हड़ फिसलकर खाट पर गिर गया।
"क्या कर रहा है वो?"
"पैसे दिखा रहा है।" छोटू ने आँखें बड़ी कीं। "गेट के गार्ड को। दाई को। जो भी बाहर आता है, उसे नोट दिखाकर कुछ पूछ रहा है।"
"क्या पूछ रहा है?"
"मुझे नहीं पता। पर बाई ने सिर हिलाया और वो हँसा।"
बंसी खाट से उठ खड़ा हुआ।
"ये वही है," वो बोला। "वही जिसने रात काग़ज़ फेंका था।"
"मैं जा रहा हूँ।"
"मन्नू, अदालत—"
"माँ को यहीं छोड़कर नहीं जाऊँगा," मैंने दुकान के बाहर कदम रखा। "जो मुझे ढूँढ रहा है, वो अस्पताल में है। जहाँ मेरी माँ का इलाज चलता है। जहाँ अमर है।"
"तो मैं भी चलता हूँ।"
"तू दुकान पर रह। अगर फ़ोन आए—"
"मैं तेरे साथ जा रहा हूँ," बंसी ने केतली उतारी, "और ये मेरी दुकान है, मैं इसे दो मिनट के लिए बंद कर सकता हूँ।"
हम गली से निकले। रास्ते में मैंने नक्शा जेब से निकाला और चलते-चलते उसे ऐसे मोड़ा कि सूरज की रोशनी उस पर पड़े।
"बंसी, देख।"
"क्या?"
"ये लकीरें।" मैंने उँगली रखी। "ये चौकोर कमरा है — बिना दरवाज़े का। पर यहाँ, इसकी दीवार के बाहर, एक और लकीर है। जो काग़ज़ के किनारे तक जाती है।"
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