The Token System – Chapter 932
जिसका कोई दरवाज़ा नहीं था।
मैंने उँगली उस पर रखी।
"ये क्या है?"
राजेंद्र ने काग़ज़ को घुमाया।
"इस पर एक तरफ़ लिखा है — 'पहली मंज़िल। भीतर। बंद।' और यहाँ…" उसने नीचे की तरफ़ इशारा किया। "ये निशान है। वही उलटा कोना-चिह्न। जो तेरे टोकन पर है।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"ये वो कमरा है," मैंने कहा। "जो बीस साल से बंद है।"
"कैसे जानता है?"
"क्योंकि अमर ने अभी बताया।" मैंने सुमन की तरफ़ देखा। "उसने कहा — छोटा कमरा, ऊपर एक छोटी खिड़की, फ़र्श पर पानी। ये हवेली के उसी कमरे का हाल है।"
सुमन ने मुँह पर हाथ रखा।
"मतलब अमर की माँ उसी कमरे में है?"
"या थी," राजेंद्र ने कहा। "नक्शे के नीचे एक तारीख़ है।" उसने स्याही पर उँगली रखी। "ये नक्शा उस दिन बना था जिस दिन हवेली की नींव रखी गई थी।"
"तो ये असली है।"
"बिल्कुल असली।" राजेंद्र ने काग़ज़ मोड़ा। "पर एक दिक्कत है। इस कमरे तक जाने का रास्ता नक्शे में नहीं है। बस एक तीर है जो दीवार से शुरू होकर उस कमरे में जाता है।"
"यानी रास्ता दीवार के अंदर है।"
"हाँ।"
मैं कुछ देर खड़ा रहा। फिर मेरे दिमाग़ में कुछ चमका।
"उस दिन," मैंने धीरे कहा, "जब मैंने दीवार का पहला पत्थर खोलने की कोशिश की थी — तब आवाज़ आई थी। 'अभी नहीं'। और टोकन पर लिखा था — 'अमर का हिसाब पहले। हवेली का दूसरा।'"
"तो?"
"तो अब अमर का हिसाब पहले हो गया," मैंने कहा। "उसने आँखें खोल दीं। उसने माँ को देखा।"
"मन्नू," सुमन ने कहा, "ये सब बहुत तेज़ी से चल रहा है।"
"तेज़ी से नहीं," मैंने कहा। "ये हिसाब है। ये अपना काम कर रहा है।"
मैंने अमर की तरफ़ देखा। वो सो रहा था, पर उसके होंठ हिल रहे थे। कुछ कह रहा था। मैं झुका।
"माँ," वो कह रहा था। "दरवाज़ा… दरवाज़ा बंद है।"
मैं सीधा खड़ा हुआ।
"राजेंद्र," मैंने कहा, "नक्शा यहीं रख। और बंसी को बुला।"
"अभी?"
"अभी।"
राजेंद्र भागा। सुमन ने मेरी बाँह पकड़ी।
"तू क्या करने वाला है?"
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "पर अमर की माँ अगर उस कमरे में है, तो उसे निकालना होगा।"
"और अगर वहाँ कोई नहीं है?"
मैंने सिक्का उठाया। वो अब भी हल्का गरम था।
"तो टोकन जवाब देगा," मैंने कहा। "वो झूठ नहीं बोलता।"
दस मिनट बाद बंसी दौड़ता हुआ आया। सिर पर पसीना, हाथ में चाय का गिलास, जो उसने रास्ते में कहीं रख दिया।
"क्या हुआ?"
मैंने नक्शा दिखाया।
"ये कमरा," मैंने कहा, "हवेली की पहली मंज़िल पर है। बिना दरवाज़े का। और अमर की माँ वहीं है।"
बंसी ने नक्शे को गौर से देखा। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।
"बीस साल पहले," उसने धीरे कहा, "एक रात मैंने हवेली में रोशनी देखी थी। उस कमरे की तरफ़ से। मैंने सोचा था कि भवानी का कोई आदमी होगा। पर सुबह जब गया, तो वहाँ कोई नहीं था।"
"तूने किसी को बताया?"
"किसे बताता?" उसने कंधे उठाए। "उस वक़्त भवानी का डर था।"
मैंने सिक्के समेटे।
"हम अभी चलते हैं," मैंने कहा।
"अभी?" सुमन ने कहा। "दिन चढ़ रहा है। भवानी के आदमी हवेली पर होंगे।"
"भवानी जेल में है," राजेंद्र ने कहा, जो लौट आया था। "उसके आदमी बिखर गए हैं। आधे भाग गए। जो बचे हैं, वो…"
"वो कुछ और चाहते हैं," मैंने कहा।
"क्या?"
"राधे," मैंने कहा। "जो नाम टोकन पर उभरा।"
राजेंद्र ने मेरी तरफ़ देखा।
"तुझे पता है वो कौन है?"
"नहीं," मैंने कहा। "पर ये तीन सिक्के जिसके नाम पर जुड़े हैं, वो ही उस कमरे का दरवाज़ा खोलेगा।"
हम अस्पताल से निकले। गाड़ी में बैठे। कौशल्या पीछे थी, चुप। बंसी आगे। राजेंद्र ने गाड़ी चलाई।
रास्ते में मैंने सिक्के निकाले। तीनों को एक साथ मिलाया। कोना-चिह्न पूरा बन गया। और उसके नीचे की लकीरों में से एक और उभरी।
"तीसरा," मैंने पढ़ा। "सुबह। हवेली।"
"सुबह हो गई," बंसी ने कहा।
"ये सुबह नहीं है," मैंने कहा। "ये उस सुबह का इशारा है जो आने वाली है।"
कौशल्या ने पीछे से कहा, "मन्नू, तेरे हाथ में जो है, वो हवेली की नींव का हिसाब है। अगर वो तीनों सिक्के एक ही जगह रखे जाएँ, तो हवेली अपना दरवाज़ा दिखा देगी।"
"तुमने ये पहले क्यों नहीं बताया?"
"क्योंकि पहले तीन सिक्के थे ही नहीं।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "अब हैं।"
हवेली का गेट खुला था। आँगन सूना। पर मेरी नज़र दीवार पर गई — उत्तर वाली दीवार, जहाँ पहला पत्थर था।
उस पत्थर पर एक नई दरार थी।
मैंने राजेंद्र की तरफ़ देखा।
"किसी ने इसे खोला है।"
हम भागे। पत्थर के पास पहुँचे। दरार ताज़ी थी। पत्थर पूरा खुला नहीं था, पर हिला हुआ था।
"रुको," राजेंद्र ने कहा। उसने अपनी पिस्तौल निकाली। "मैं पहले देखता हूँ।"
वो पत्थर के पीछे गया। मैं पीछे रुका। बंसी ने मेरी बाँह पकड़ी।
"मन्नू," उसने धीरे कहा, "देख — ज़मीन पर।"
मैंने झुका। पत्थर के नीचे, धूल में, पैरों के निशान थे। दो जोड़ी। एक बड़ा, एक छोटा।
और उनके बीच में, धूल में उँगली से लिखा हुआ एक शब्द।
"राधे।"
मैंने राजेंद्र को आवाज़ दी।
"कुछ मिला?"
वो लौटा। हाथ खाली।
"पत्थर के पीछे एक गड्ढा है," उसने कहा। "बहुत पुराना। अंदर कोई चीज़ नहीं। पर दीवार पर कुछ लिखा है।"
"क्या?"
"तीन लकीरें। और उनके नीचे — 'अंदर'।"
मैंने नक्शा निकाला। उसे खोला। पहली मंज़िल का चौकोर कमरा। और उसके ठीक नीचे, धरती की सतह पर, वही जगह जहाँ हम खड़े थे।
"ये कमरा दीवार के उस पार है," मैंने धीरे कहा। "ठीक उसी जगह जहाँ मैंने पहला पत्थर खोलने की कोशिश की थी।"
राजेंद्र ने नक्शे पर उँगली रखी। वो उँगली धीरे-धीरे सरकी। पत्थर से ऊपर।
"तो रास्ता यहीं से है," उसने कहा। "पर कहाँ?"
मैंने सिक्के निकाले। तीनों को हथेली पर रखा। फिर उन्हें दीवार की तरफ़ बढ़ाया।
दीवार ने आवाज़ की।
धीमी, गहरी, जैसे किसी पुराने ताले में चाबी घूमी हो।
और पत्थर के ठीक ऊपर, दीवार की ईंटों में, एक दरार दिखी — सीधी, साफ़, जैसे किसी ने चाकू से खींची हो।
दरार फैलने लगी।
बंसी ने मेरी बाँह पकड़ी और खींचा।
"पीछे हट," उसने कहा। "दीवार गिर रही है।"
पर दीवार नहीं गिरी।
दरार एक दरवाज़े का शक्ल ले चुकी थी। छोटा, संकरा, आदमी के कद का।
और उसके अंदर से एक आवाज़ आई।
"आ गए।"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। सबने मेरी तरफ़ देखा।
मैंने सिक्के जेब में डाले और आगे बढ़ा।
"मन्नू —" राजेंद्र ने कहा।
"मैं अकेला जाऊँगा," मैंने कहा।
"नहीं।"
"राजेंद्र," मैंने कहा, "अगर ये हिसाब है, तो मुझे ही जाना होगा। तुम पीछे रहो। अगर दस मिनट में न निकलूँ, तो अंदर आ जाना।"
कौशल्या ने मेरा हाथ पकड़ा।
"तेरे दादा ने भी यही कहा था," उसने कहा। "वो नहीं लौटे।"
"मैं लौटूँगा," मैंने कहा।
वो मेरा हाथ नहीं छोड़ रही थी।
"देख," मैंने कहा। "मेरे पास तीन सिक्के हैं। तेरे दादा के पास क्या था?"
वो चुप हुई। फिर उसने हाथ छोड़ा।
मैंने दरवाज़े में कदम रखा।
अंदर अंधेरा था। बहुत। मेरी आँखें बंद हो गईं। मैंने हाथ से दीवार टटोली। ठंडी, गीली। सीढ़ियाँ नीचे जाती थीं।
मैं उतरा।
सीढ़ियों के नीचे एक कमरा था। छोटा। बहुत छोटा। फ़र्श पर पानी था। मेरे पैर भीग गए।
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