The Token System – Chapter 931
मैंने तीनों सिक्के एक साथ रखे — मेरा टोकन, लक्ष्मी दीदी वाला, और अब ये।
तीनों के निशान मिलकर एक हो गए। एक पूरा उलटा कोना-चिह्न।
और टोकन पर एक नई लकीर उभरी।
उस लकीर के नीचे शब्द —
"तीसरा। सुबह। हवेली।"
कौशल्या ने देखा और उसकी आँखें फैल गईं।
"ये… ये तीसरा है?" उसने पूछा।
"तुम जानती हो?"
"मैंने इसे बीस साल पहले देखा था।" वो उठी। "तेरे दादा के हाथ में।"
"कब?"
"जिस रात उन्हें मारा गया।"
मैंने सिक्के समेटे।
"कौशल्या," मैंने कहा, "उस रात और कौन था?"
"तीसरा," उसने कहा। "तीसरा वहाँ था। और उसने देखा। पर उसने कुछ नहीं किया।"
"क्यों?"
"क्योंकि उसने खुद ही कहा था।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "वो बोला था — 'आज कोई नहीं बचेगा। हिसाब अब मेरा है।'"
कमरे का दरवाज़ा खुला।
राजेंद्र अंदर आया, पिस्तौल निकाली हुई।
"मन्नू?"
"ठीक है," मैंने कहा।
"सफ़ेद कुर्ते वाला भाग गया। पकड़ नहीं पाया।" उसने कौशल्या की तरफ़ देखा। "ये?"
"कौशल्या।"
राजेंद्र ने पिस्तौल नीची कर दी।
कौशल्या ने उसकी तरफ़ देखा।
"तुम पुलिस हो?"
"हाँ।"
"तो मेरी बात सुनो।" उसने काग़ज़ मेज़ पर रखा। "मैं अदालत में गवाही दूँगी। पर मेरी बहन के पास दो पुलिस वाले होंगे। रात-दिन।"
राजेंद्र ने मेरी तरफ़ देखा।
"हो जाएगा।"
कौशल्या ने अपनी साड़ी ठीक की।
"तो चलो," उसने कहा। "मुझे अदालत ले चलो।"
तीनों नीचे उतरे। आँगन में भीड़ कम हो चुकी थी। सफ़ेद गाड़ी गेट के बाहर खड़ी थी, इंजन बंद।
राजेंद्र ने मुझे रोका।
"मन्नू," उसने धीरे कहा, "तीनों सिक्के मिल गए। इसका मतलब?"
"मतलब," मैंने कहा, "कि अब हिसाब सिर्फ़ दो लोगों के बीच नहीं है।"
"फिर कितने लोगों के बीच?"
"जितने काग़ज़ पर हैं," मैंने कहा। "और जितने काग़ज़ के पीछे बैठे हैं।"
राजेंद्र ने अपनी घड़ी देखी।
"चार बजे हैं।"
"तो चलो।"
हम गाड़ी की तरफ़ बढ़े। कौशल्या पीछे बैठी। गाड़ी चल पड़ी।
सड़क पर मोड़ आया।
कौशल्या ने मेरी तरफ़ देखा।
"मन्नू," उसने कहा, "तू जानता है तेरे दादा को किसने मारा?"
"भवानी और जगन्नाथ ने।"
"नहीं।" उसने सिर हिलाया। "भवानी का हाथ था, पर मारने वाला तीसरा था। और उसने उस रात मुझे भी देखा था।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"तो फिर तुम बची कैसे?"
"क्योंकि तेरे दादा ने मुझे छिपा दिया।" उसकी आवाज़ भर्राई। "आख़िरी साँस में।"
गाड़ी अदालत की तरफ़ मुड़ी। मैंने अपनी जेब से वो तीन सिक्के निकाले और उन्हें एक साथ मुट्ठी में रखा।
मुट्ठी इतनी गरम हो रही थी कि जलने लगी।
मैंने हाथ खोला।
टोकन पर एक और नई लकीर उभरी थी, और उसके नीचे एक नाम —
"राधे।"
॥
गाड़ी का दरवाज़ा खुला और मैं कूदकर बाहर गिरा, क्योंकि मेरी मुट्ठी अंदर जल रही थी और मैं बैठा नहीं रह सकता था।
राजेंद्र ने ब्रेक मारे। कौशल्या पीछे से चीखी — "क्या हुआ?"
मैंने हाथ खोला। तीनों सिक्के एक दूसरे से चिपके बैठे थे, और बीच में मेरा टोकन ऐसे गरम था कि उसे हथेली पर रखना मुश्किल।
सुमन अस्पताल के फाटक पर खड़ी थी। उसने मुझे देखा और भागकर आई।
"अमर ने आँखें खोल दी हैं," उसने कहा। "पर वो कुछ बोल नहीं रहा। बस छत को देख रहा है।"
मैंने सिक्के जेब में डाले और अंदर भागा।
सीढ़ियाँ चढ़ते वक़्त मेरे पैर फिसल रहे थे। दूसरी मंज़िल पर अमर का कमरा था। दरवाज़े पर एक नर्स बैठी थी — सफ़ेद टोपी, हाथ में रजिस्टर।
"अंदर मत जाइए," उसने रोका। "डॉक्टर सुमन के सिवा किसी को…"
"मैं आया हूँ," सुमन ने पीछे से कहा। "इन्हें आने दो।"
अमर चारपाई पर लेटा था। चेहरा पीला, आँखें खुली, होंठ सूखे। उसका हाथ चादर के बाहर था और उँगलियाँ हवा में कुछ पकड़ने की कोशिश कर रही थीं।
मैं उसके पास बैठ गया।
"अमर।"
उसने धीरे से सिर घुमाया। मुझे देखा।
"मन्नू भाई," उसकी आवाज़ किसी और की लग रही थी। "मैंने माँ को देखा।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा सा उतरा।
"कहाँ?"
"एक कमरे में। बहुत सारे ताले।" उसने हाथ उठाने की कोशिश की, फिर गिरा दिया। "दीवार पर बहुत सारे ताले लगे थे। ज़ंजीरें। और वो बैठी थी। मेरी तरफ़ देख रही थी।"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा।
"बुख़ार का असर है," उसने धीरे कहा। "इसकी दवा से ऐसा होता है।"
"नहीं," अमर ने कहा, और उसकी आवाज़ अचानक साफ़ हो गई। "मैंने उसका चेहरा देखा। वो रो रही थी। और वो कह रही थी… कह रही थी कि मैं आ रही हूँ।"
मैंने उसका हाथ पकड़ा। ठंडा था।
"वो कमरा कैसा था?" मैंने पूछा।
अमर ने आँखें बंद कीं।
"छोटा। बहुत छोटा।" उसकी साँस धीमी थी। "एक खिड़की थी। ऊपर। बहुत ऊपर। छोटी सी। उसमें से रोशनी आ रही थी। और फ़र्श पर पानी था। मेरे पैर भीग रहे थे।"
सुमन ने उसकी कलाई पकड़ी और नब्ज़ देखने लगी।
"इसे सोने दो," उसने कहा।
"एक बात," अमर ने कहा। उसने मेरी तरफ़ देखा। "वहाँ एक औरत और थी। नहीं… कोई नहीं था।" उसने आँखें मसलीं। "पर एक आवाज़ आ रही थी। कोई गा रहा था। बहुत धीरे।"
"क्या गा रहा था?"
"मुझे नहीं पता," उसने कहा। "पर मैंने सुना। माँ उसकी तरफ़ देख रही थी।"
फिर उसकी आँखें बंद हो गईं।
सुमन ने मुझे बाहर खींचा।
"इसके दिमाग़ में जो चल रहा है," उसने कहा, "वो बुख़ार नहीं है। ये कोई पुरानी याद है जो दवा के असर से टूटकर बाहर आ रही है।"
"मतलब वो कुछ देख रहा है?"
"मतलब वो कुछ याद कर रहा है," उसने कहा। "और याद करना कभी-कभी देखने से ज़्यादा ख़तरनाक होता है।"
मैंने जेब से सिक्का निकाला।
"ये अमर की माँ का है," मैंने कहा। "लक्ष्मी दीदी ने दिया। बीस साल से उसके पास था।"
सुमन ने सिक्का हाथ में लिया। पलटा। उलटा कोना-चिह्न देखा। उसका चेहरा बदला।
"ये… ये मुझे कहीं देखा हुआ लग रहा है।"
"कहाँ?"
वो कुछ देर चुप रही। फिर उसकी आँखें बड़ी हुईं।
"मेरे पापा के पास," उसने कहा। "जब मैं छोटी थी। उनकी मेज़ की दराज़ में एक थैली थी। उस थैली में…"
"क्या?"
"रुक," उसने कहा। "मुझे साफ़ याद नहीं। पर ये निशान — ये मैंने देखा है।"
वो सिक्का मुझे वापस देने लगी, फिर रुकी।
"मन्नू," उसने कहा, "ये सिक्का अमर की माँ का नहीं है।"
"क्या मतलब?"
"इस पर लकीरें हैं। ये हवेली के हिसाब का सिक्का है। पर एक और बात है।" उसने सिक्के को रोशनी में किया। "देख — उलटे चिह्न के नीचे एक और निशान है। बहुत छोटा। जैसे किसी ने इसे दोबारा खुरचा हो।"
मैंने झुककर देखा। सच में। उलटे चिह्न के ठीक नीचे, बाईं तरफ़, एक छोटा सा तिल था — जैसे कोई अक्षर आधा मिट गया हो।
"ये अक्षर है," मैंने कहा। "किसी का पहला अक्षर।"
"रा…"
मैंने सिर उठाया। राजेंद्र दरवाज़े पर खड़ा था। हाँफ रहा था। हाथ में एक फटा हुआ काग़ज़ था।
"मिल गया," उसने कहा। "वो लिफ़ाफ़ा जो तूने मुझे दिया था। रात को गाड़ी में। अब मैंने खोला।"
"और?"
"उसमें हवेली का नक्शा है।" उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "पुराना। बहुत पुराना।"
मैंने काग़ज़ खोला। मोटा, पीला, किनारों से फटा। स्याही फीकी। पर नक्शा साफ़ था — हवेली का, दो मंज़िल का, आँगन, कुआँ, पिछला बरामदा।
और बीच में, दीवारों से घिरा, एक छोटा सा चौकोर कमरा।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno