The Token System – Chapter 930
मैं दरवाज़े तक गया। फिर रुका।
"सुमन," मैंने कहा, "लक्ष्मी दीदी की बात याद रखना। अगर मैं लौटा और तुमसे न मिल पाया, तो राजेंद्र के पास जाना। और उसे ये देना।"
मैंने सिक्का उसकी तरफ़ बढ़ाया, फिर हटा लिया।
"नहीं। रहने दे। मैं सँभाल लूँगा।"
मैं बाहर निकला। सीढ़ियों पर सफ़ेद कुर्ते वाले दो आदमी खड़े थे, पर मेरी तरफ़ नहीं देखा। जैसे मुझे न देखने का उन्हें हुक्म मिला हो।
घर पहुँचा तो साढ़े सात बजे थे।
राजेंद्र दरवाज़े पर खड़ा था।
"कुछ मिला?"
"शेखर बाबू की कोई खबर नहीं।" उसने सिर हिलाया। "पर दफ़्तार में एक चीज़ मिली है।"
"क्या?"
"एक पुराना काग़ज़। फटा हुआ। जिस पर दो अक्षर हैं — 'बी. देवी'।"
मेरे पाँव जम गए।
"कहाँ है वो?"
"मेरे पास।" राजेंद्र ने काग़ज़ निकाला। "ये शेखर बाबू की डायरी के पन्नों के बीच था। जैसे किसी ने छिपाकर रखा हो।"
मैंने काग़ज़ लिया। पीला, पुराना, फटा। ऊपर कोने में — "बी. देवी।" नीचे कोई तारीख़ थी, आधी मिटी।
"ये अमर की माँ के नाम का काग़ज़ है," मैंने कहा।
"कैसे पता?"
"लक्ष्मी दीदी ने अभी बताया।" मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा। "अदालत चलते हैं।"
अदालत का गेट खचाखच भरा था। अख़बार वाले, कैमरे, पुलिस की दो गाड़ियाँ। राजेंद्र ने मुझे बगल के रास्ते अंदर डाला।
जज साहब पहले से बैठे थे। सुनवाई शुरू हुई।
हरीश चंद्र ने काग़ज़ उठाया।
"जज साहब," उन्होंने कहा, "अभी तक ये माना जा रहा था कि हवेली के चार हिस्से थे। पर मेरे पास एक काग़ज़ है जो पाँचवें हिस्से की बात करता है।"
अदालत में सन्नाटा छा गया।
"कौन सा काग़ज़?"
"भवानी जी की तरफ़ से दिया गया। उन्होंने ख़ुद मुझे दिया था — ये कहकर कि अब हिसाब पूरा करो।"
जज ने चश्मा ठीक किया।
"और वो काग़ज़ क्या कहता है?"
"ये काग़ज़ मोहन लाल का है। जो पाँच पीढ़ियों से भवानी के होम का हिसाब रखता आया है। इसमें लिखा है कि हवेली का पाँचवाँ हिस्सा नहीं था। चौथा हिस्सा दो भागों में बँटा था।"
"किसके-किसके?"
"एक भाग सुखदेव माली का, और दूसरा भाग…" उन्होंने रुककर काग़ज़ देखा, "उस औरत का जिसका नाम काग़ज़ों में कभी नहीं लिखा गया। सिर्फ़ 'बहन' लिखा गया।"
मेरी जेब में टोकन ने एक झटका दिया।
जज ने काग़ज़ मँगाया। हरीश चंद्र ने पेश किया। वकील ने आपत्ति की, पर जज ने खारिज कर दी।
"ये काग़ज़ रिकॉर्ड में लिया जाता है।" वो बोले। "अगली तारीख़ पर इस पर बहस होगी।"
फिर वो मेरी तरफ़ मुड़े।
"मनोहर जी, आपके पास कुछ कहना है?"
मैं उठा। मेरे हाथ में काग़ज़ आ रहा था — कौशल्या वाला।
"जज साहब," मैंने कहा, "जिस 'बहन' की बात ये काग़ज़ कर रहा है, वो मेरी माँ की बहन है। कौशल्या।"
अदालत में फुसफुसाहट उठी।
"और मेरे पास उसका हिस्सा साबित करने वाला काग़ज़ है।"
मैंने काग़ज़ आगे बढ़ाया। जज ने लिया, पढ़ा, हरीश चंद्र को दिया।
हरीश चंद्र ने पढ़ा और मेरी तरफ़ देखा।
"ये काग़ज़ असली है," उन्होंने कहा। "मुहर भी असली है।"
जज ने एक पल सोचा।
"अगर ये काग़ज़ सही है, तो हवेली का आधा हिस्सा जगन्नाथ के परिवार का और आधा उन परिवारों का जिनसे ज़मीन छीनी गई — उसमें कौशल्या का हिस्सा भी जुड़ता है।"
"जी," हरीश चंद्र ने कहा।
"तो कौशल्या इस अदालत में क्यों नहीं आई?"
मैं चुप रहा।
"क्योंकि वो डरती है," मैंने धीरे कहा।
"किससे?"
"जो अभी भी बाहर घूम रहा है।"
जज ने मेरी तरफ़ देखा, फिर फ़ाइल बंद की।
"ठीक है। मैं आदेश देता हूँ कि कौशल्या को अदालत में पेश किया जाए। पुलिस उसे सुरक्षा देगी।" उन्होंने सुनवाई आगे बढ़ाई।
बाहर निकला तो दो बज रहे थे। राजेंद्र मेरे साथ था।
"तीन बजे," उसने कहा, "तू अकेले जाएगा?"
"हाँ।"
"और अगर मैं पीछे आऊँ?"
"तो वो भाग जाएगा।"
राजेंद्र ने कुछ नहीं कहा। फिर एक लिफ़ाफ़ा मेरी जेब में डाल दिया।
"अंदर एक पर्ची है। मेरा नंबर।" उसने कहा। "अगर तीन बजकर पंद्रह तक फ़ोन न आए, तो मैं अंदर आऊँगा।"
मैं मुस्कुराया।
"भरोसा है?"
"तुझ पर।"
तीन बजे मैं अदालत के पिछले कमरे के सामने खड़ा था। दरवाज़ा बंद। अंदर से कोई आवाज़ नहीं।
मैंने दरवाज़ा खटखटाया। तीन बार।
कोई जवाब नहीं।
मैंने धक्का दिया। दरवाज़ा खुल गया।
कमरे में एक लकड़ी की मेज़ थी, दो कुर्सियाँ, और खिड़की पर परदा। मेज़ पर एक पीली लिफ़ाफ़ा और एक छोटी पीतल की डिबिया रखी थी।
मैंने लिफ़ाफ़ा उठाया। खोला।
"तू आ गया। अच्छा किया। डिबिया खोल।"
मैंने डिबिया खोली। अंदर एक काग़ज़ था, और उस पर मेरी ही लिखाई में — "कौशल्या का नाम — अब मेरे पास नहीं।"
मैंने काग़ज़ गौर से देखा। स्याही ताज़ी थी।
पीछे मुड़ा।
खिड़की का परदा हिला। कोई बाहर निकल रहा था।
मैंने परदा हटाया। खिड़की खुली थी। नीचे आँगन में एक सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी भाग रहा था, हाथ में कुछ दबाए हुए।
मैं खिड़की पर चढ़ा। दो मंज़िल ऊपर थी। नीचे घास।
मैंने कूदने की सोची, तभी पीछे से आवाज़ आई।
"मत।"
मैं मुड़ा। दरवाज़े पर एक औरत खड़ी थी — साठ के आसपास, सफ़ेद साड़ी, हाथ में लाठी।
"कौन हो तुम?"
वो अंदर आई और दरवाज़ा बंद कर दिया।
"मैं वही हूँ," उसने कहा, "जो तेरे पास आने से डरती है।"
"कौशल्या?"
उसने सिर हिलाया।
"तो तुम यहाँ हो? तुम रोज़ डरती हो, और अब अदालत में गवाही देने की बात कह रही हो?"
"मैं गवाही नहीं देने आई।" उसने लाठी टेक दी। "मैं ये बताने आई हूँ कि अगर मैंने गवाही दी, तो तेरी माँ को कुछ हो जाएगा।"
मैं चुप हो गया।
"किसने कहा?"
"उसी आदमी ने, जिसने ये लिफ़ाफ़ा रखा है।" उसने मेज़ की तरफ़ इशारा किया। "उसने कहा — तेरी बहन का हिसाब लिख दिया जाएगा, और तेरे भतीजे का भी।"
"वो झूठ बोल रहा है।"
"झूठ?" उसने मेरी आँखों में देखा। "उसने मुझे वो तस्वीर दिखाई जो किसी और के पास नहीं थी। तेरी माँ की तस्वीर, जो उसने कभी किसी को नहीं दी। और उसपर एक लाइन लिखी थी — 'दो दिन और, बहन।'"
मेरी जेब में टोकन फिर गरम हुआ। मैंने निकाला। उस पर "कौशल्या" पूरा लिखा था।
"तुम्हारा नाम पूरा है," मैंने कहा। "टोकन पर।"
उसने देखा। उसका चेहरा बदला।
"मेरा नाम?" उसने धीरे पढ़ा। "कौ… श… ल्या।"
वो कुर्सी पर बैठ गई।
"मेरा नाम," वो बोली, "पचास साल से किसी काग़ज़ पर नहीं लिखा गया।"
"अब लिखा है।"
वो रोई। नहीं, नहीं रोई — उसकी आँखें भर आईं और उसने हथेली से मुँह ढँक लिया।
मैंने उसके सामने काग़ज़ रखा।
"ये तुम्हारा हिस्सा है। अदालत में बोलो। सब कुछ बदल जाएगा।"
"और मेरी बहन?"
"मेरी माँ को कुछ नहीं होगा। मैं वादा करता हूँ।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"कैसे?"
"क्योंकि मैं उसे अपने पास रखूँगा। रात-दिन। जब तक ये हिसाब पूरा नहीं होता।"
उसने लंबी साँस ली।
"अच्छा," उसने कहा। "अच्छा।"
फिर उसने अपनी साड़ी के पल्लू से कुछ निकाला — एक छोटा सा पीतल का सिक्का। बिल्कुल लक्ष्मी दीदी वाले जैसा। उलटा कोना-चिह्न।
"ये मेरी माँ ने दिया था," उसने कहा। "कहा था — जब नाम पूरा हो, तब इसे किसी के हाथ में देना।"
"किसके?"
"तुम्हारे।"
उसने सिक्का मेरी हथेली पर रख दिया।
मेरी जेब से टोकन ने एक ज़ोरदार झटका दिया, और सिक्का मेरी हथेली में काँपने लगा।
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