The Token System – Chapter 929
"कौश…" वहीं रुका रहा। अधूरा। जैसे किसी ने बीच में हाथ रख दिया हो।
सुमन मेरे सामने खड़ी थी, हाथ में वो पर्ची, और उसका चेहरा उतना ही सफ़ेद जितना अस्पताल की दीवार। मैंने पर्ची उसके हाथ से ली, दोबारा पढ़ी, फिर जेब में डाल दी।
"अमर कहाँ है?"
"ऊपर। आईसीयू के पास वाले कमरे में। हाल बिगड़ा था, अब संभला है। पर…"
"पर क्या?"
"रात भर कोई उसके पास बैठा था। मैंने नर्स को हटाया नहीं। सोचा, अगर कोई बाहर वाला घुसा, तो पकड़ा जाएगा।"
"तो?"
"तो वो बाहर वाली नहीं थी।" सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "अंदर बैठी थी। और वो बाहर वाली नहीं लग रही थी। मुझे तो… मुझे तो वो जानी-पहचानी लगी।"
हम सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। दो-दो सीढ़ियाँ एक साथ। मेरी जेब में टोकन टिक-टिक कर रहा था, ठंडा, मानो कोई चीज़ सही बैठ गई हो।
कमरे का दरवाज़ा खुला था। अमर बिस्तर पर लेटा था, नींद में। उसके सीने पर पतली चादर, होंठ सूखे, आँखें बंद।
और उसके सिरहाने वाली कुर्सी पर एक औरत बैठी थी।
साठ-पैंसठ की उम्र होगी। सफ़ेद कुर्ता, बाल पूरे सफ़ेद, कमर सीधी। हाथ गोद में रखे थे और आँखें बंद थीं। हमारी आहट से उसने सिर उठाया।
सुमन ने एक कदम पीछे लिया।
"लक्ष्मी दीदी?"
औरत उठी। उसने सुमन की तरफ़ देखा और धीरे से मुस्कुराई।
"तू बड़ी हो गई, सुमन।"
सुमन की साँस अटक गई। "आप… आप इतनी रात यहाँ कैसे?"
"फ़ोन आया था।" औरत ने अमर की तरफ़ इशारा किया। "कहा गया कि अमर का हाल बिगड़ा है। मैं सीधी यहाँ चली आई।"
"किसने फ़ोन किया?"
"पता नहीं। आवाज़ नई थी। बस इतना कहा कि इस बच्चे के पास कोई नहीं है।"
मैंने अमर की कलाई पकड़ी। नब्ज़ चल रही थी, पर कमज़ोर, बहुत कमज़ोर। मैंने सुमन की तरफ़ देखा।
"दवा?"
सुमन ने बैग खोला, एक शीशी निकाली और सुई लगाने लगी। मैंने अमर का हाथ थामे रखा।
"ये कौन हैं?" मैंने धीरे पूछा।
"लक्ष्मी दीदी," सुमन ने सुई लगाते हुए कहा, नज़र नीची किए। "जब मैं यहाँ नई आई थी, ये यहाँ की सबसे पुरानी नर्स थीं। अस्पताल की। भवानी के होम में नहीं, यहाँ सरकारी में।"
लक्ष्मी दीदी कुर्सी पर बैठ गईं। उन्होंने अमर का सिर सहलाया।
"मुझे बुलाया गया," उन्होंने कहा, "तो मैं आ गई। पर ये बच्चा जानता है कि मैं कौन हूँ?"
"नहीं," सुमन ने कहा।
"तो बताना पड़ेगा।" लक्ष्मी दीदी ने मेरी तरफ़ देखा। "तू कौन है?"
"मनोहर। लोग मन्नू कहते हैं।"
"मन्नू।" उन्होंने नाम जैसे मुँह में घुमाया। "कन्हैया का पोता?"
मैं रुक गया।
"आप मेरे दादा को जानती हैं?"
"मैं तेरे दादा को नहीं जानती थी।" उन्होंने अमर की चादर ठीक की। "मैं उस औरत को जानती थी जिसे यहाँ से निकाला गया था। और उस औरत ने मुझे कभी नहीं छोड़ा।"
सुमन मेरी तरफ़ देखने लगी।
"कौन सी औरत?" मैंने पूछा, हालाँकि मुझे पहले से पता था।
लक्ष्मी दीदी ने मेरी तरफ़ देखा। कुछ पल। फिर बोलीं, "अमर की माँ।"
उन्होंने कुर्सी की पीठ पर हाथ रखा और धीरे से कहा, "डॉक्टर बीरा देवी। इसी अस्पताल की। अच्छी, तेज़। मरीज़ों की थी।"
मेरे मुँह से शब्द नहीं निकला।
"उसे भवानी के होम में भेजा गया था," लक्ष्मी दीदी ने आगे कहा। "और वो वापस नहीं आई। मुझे बताया गया कि वो भाग गई। पर मैं जानती थी कि वो भाग नहीं सकती थी। उसका बच्चा यहाँ था।"
"ये बच्चा?" सुमन ने पूछा।
"नहीं।" लक्ष्मी दीदी ने सिर हिलाया। "उस वक़्त ये पैदा भी नहीं हुआ था। वो उस समय अपनी बहन के घर में थी। पर वो आती रहती थी।"
"कब?" मैंने पूछा।
"जब भी मौक़ा मिलता। हम दोनों रात की ड्यूटी में मिलते। वो चाय लाती। बैठती। बातें करती।" लक्ष्मी दीदी ने कमरे की ओर देखा। "फिर एक रात वो आई। फटे कपड़े। हाथ में सिक्का था। उसने मेरा हाथ पकड़कर सिक्का मेरी हथेली पर रख दिया और कहा — 'लक्ष्मी, ये मेरे बेटे को लौटाना। मैं नहीं रहूँगी।'"
"कहाँ गई थी वो?" सुमन ने पूछा।
"उस रात उसे ले गए थे।" लक्ष्मी दीदी ने अपनी आवाज़ नीची कर ली। "सफ़ेद कुर्ते वाले दो आदमी। मैंने रोका नहीं। मैं डर गई थी।" उन्होंने सुमन की तरफ़ देखा। "आज तक डरी हुई हूँ।"
सुमन कुछ कह नहीं पाई।
"और वो सिक्का?" मैंने पूछा।
लक्ष्मी दीदी ने अपना बैग उठाया। काला, पुराना। उसकी ज़िप खोली। अंदर कपड़ा था, और उस कपड़े में कुछ लिपटा हुआ था।
"बीस साल से," उन्होंने कहा। "मैं इसे कभी अपने घर नहीं रखती। हमेशा बैग में। हमेशा साथ।"
उन्होंने कपड़ा खोला।
छोटा पीतल का सिक्का। जैसे मेरा टोकन हो, पर छोटा। सपाट, और उस पर… उलटा कोना-चिह्न।
मैंने हाथ बढ़ाया।
लक्ष्मी दीदी ने सिक्का मेरी हथेली पर रख दिया।
मेरी जेब से टोकन निकलकर गरम हुआ, एक ज़ोरदार झटका। मैंने हाथ उस पर रखा। लक्ष्मी दीदी ने देखा, पर कुछ नहीं बोलीं।
सुमन ने मेरी कलाई पकड़ ली। "मन्नू।"
"अमर ठीक है?" मैंने उसकी तरफ़ देखे बिना पूछा।
"अभी। पर उसका शरीर बहुत कमज़ोर है।"
"तो पहले उसे ठीक करते हैं।"
मैंने सिक्का जेब में डाल दिया और अमर के पास बैठ गया। उसका माथा छुआ। ठंडा था।
"इसे और एक दिन चाहिए," सुमन ने कहा। "दो शायद। देखती हूँ।"
लक्ष्मी दीदी उठीं।
"मैं चलूँ? मैंने तो जो कहना था कह दिया।"
"नहीं," मैंने कहा, बिना सोचे। "आपको एक और बात बतानी पड़ेगी।"
"क्या?"
"जिस रात वो गईं — उस रात और कौन था?"
लक्ष्मी दीदी ने खिड़की की तरफ़ देखा।
"भवानी तो नहीं था," उन्होंने कहा। "पर भवानी का आदमी ज़रूर था। एक और था। चेहरा याद है, नाम नहीं। बहुत मोटा था।"
"मोटा?"
"मोटा। और उसके हाथ में एक डिबिया थी। पीतल की। वो डिबिया बीरा देवी ने मुझे दिखाई थी एक बार। कहा था — इसे मेरे बच्चे तक पहुँचाना।"
मैं कुर्सी पर बैठ गया।
"और वो डिबिया?"
"वो नहीं मिली।" लक्ष्मी दीदी ने सिर हिलाया। "वो उसी रात ग़ायब हो गई।"
सुमन मेरी तरफ़ देखने लगी। मैंने सिक्का जेब से निकालकर उंगलियों में घुमाया।
"मन्नू," सुमन ने देर से कहा। "ये अस्पताल है। यहाँ दो आदमी दरवाज़े पर खड़े हैं। मैं जानती हूँ। मैं अंदर आने से पहले देख चुकी हूँ।"
मैं उठा। "कौन?"
"जो रोज़ आते हैं।"
लक्ष्मी दीदी ने घड़ी देखी।
"मैं अब चलती हूँ," उन्होंने कहा, और बैग उठाया। "इससे पहले कि कोई मुझे यहाँ देख ले।"
"आपका फ़ोन नंबर?"
उन्होंने जेब से एक काग़ज़ का टुकड़ा निकालकर दिया। उस पर नंबर लिखा था। मैंने जेब में रखा।
लक्ष्मी दीदी दरवाज़े तक गईं, फिर रुकीं।
"मन्नू," उन्होंने कहा, "उस सिक्के को मत खोना। उस पर जो निशान है, वो आख़िरी है।"
"क्यों?"
"क्योंकि उस औरत ने मुझसे कहा था — 'जिस दिन तीन सिक्के एक जगह होंगे, उस दिन हिसाब खुलेगा।'" और वो चली गईं।
मैं अमर के पास वापस आया। सुमन उसकी चादर ठीक कर रही थी।
"मन्नू," उसने कहा, "आज दोपहर बारह बजे सुनवाई है।"
"जानता हूँ।"
"और तीन बजे?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तीसरा बुला रहा है।"
"तू जाएगा?"
"अगर मैं नहीं गया, तो कौशल्या का नाम कभी नहीं मिलेगा।"
सुमन ने मेरी आँखों में देखा।
"और अगर तू गया और वो तुझे रोके?"
"तो मैं अंदर से बाहर आऊँगा। जैसे रात आया था।"
वो मुस्कुराई, थकी हुई।
"अच्छा। अब जा। दो घंटे बाद अदालत।"
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