The Token System – Chapter 924
"माँ की पोटली मेज़ पर रखी थी। मैं रसोई की सीढ़ी के नीचे से दीया उठाकर लाया, उसमें तेल डाला और साथ ले लिया — पूरी रात जलने के लिए नहीं, बस दीवार तक रास्ता दिखाने के लिए।
सुबह के छह बजे मैं शेखर बाबू के दफ़्तार पहुँचा। उनका दफ़्तार अस्पताल के पुराने रिकॉर्ड कमरे के बगल में था — पीली इमारत, टूटी सीढ़ियाँ, और पहली मंज़िल पर लोहे की एक पुरानी मेज़। शेखर बाबू पहले से बैठे थे। चश्मा नाक पर, हाथ में चाय का कप, सामने खुली एक मोटी फ़ाइल।
मैंने दरवाज़ा खटखटाया।
उन्होंने सिर उठाया, मुझे देखा और फ़ाइल बंद कर दी।
"तुम?" उनकी आवाज़ में वो चुभन नहीं थी जो पहले थी। अब वो थकान जैसी थी। "इतनी सुबह?"
"मेज़ पर एक चीज़ रखनी है," मैंने कहा और सीधे उनकी मेज़ के पास पड़ी कुर्सी खींच ली।
"मैंने कुछ कहा था कल रात फ़ोन पर, तुमने सुना नहीं?" उन्होंने फ़ाइल को दराज़ में रखकर उसे ताला लगा दिया। फिर चाबी जेब में डालकर मेरी तरफ़ मुड़े। "मैंने कहा था — मुझे अकेला छोड़ दो। मेरा अपना हिसाब है।"
"आपका हिसाब मुझसे बड़ा नहीं है, शेखर बाबू," मैंने कहा।
वो हँसे। एक छोटी, सूखी हँसी। "बड़ा-छोटा की बात नहीं। तुम सोचते हो तुमने सब जीत लिया? भवानी का टोकन अदालत में, हवेली का दावा वापस — बहुत बड़ी बात है। पर तुम्हें पता है क्या है? भवानी ने मुझे कल रात फ़ोन किया था। कहा — सब संभल गया। कहा — तू चुप रह, और जो काग़ज़ तेरे पास है, वो मुझे भेज दे।"
"और आपने क्या कहा?"
"मैंने कहा — ठीक है।" उन्होंने जेब से चाबी वापस निकाली और दराज़ खोलकर उसमें से एक पीला मोटा लिफ़ाफ़ा निकाला। "क्योंकि मैं तीस साल से यही करता आया हूँ। जो ठाकुर कहते हैं, मैं करता हूँ। और ये —" उन्होंने लिफ़ाफ़ा हिलाया — "ये मेरे घर की दीवार में ईंट के पीछे पड़ा था। इसमें वो लाइनें हैं जो मैंने तुम्हारे पापा के कहने पर लिखी थीं, और जो भवानी के कहने पर जला देनी थीं। मैं जला न सका।"
"तो अब क्या करेंगे? भवानी को देंगे?"
"हाँ।"
"क्यों?"
"क्योंकि मेरी बेटी है।" उन्होंने लिफ़ाफ़ा मेज़ पर रख दिया। "और भवानी ने कहा है — लिफ़ाफ़ा नहीं मिला, तो शादी की तारीख़ बदल जाएगी। अब तुम बताओ, मेरे पास क्या रास्ता है?"
मैंने कुर्सी पीछे खींची और सीधा उनकी आँखों में देखा।
"शेखर बाबू, भवानी ने कल अदालत में अपना टोकन हवाले कर दिया। हवेली का दावा भी छोड़ दिया। उसने अपने बेटे के सामने सब कबूल किया। तो अब वो आपको काहे का फ़ोन करेगा — शादी की धमकी देने के लिए?"
शेखर बाबू का हाथ रुक गया। लिफ़ाफ़ा हवा में अधूरा उठा रह गया।
"क्या?" उनकी आवाज़ धीमी हो गई।
"कल अदालत में सब हो गया," मैंने कहा। "आप थे वहाँ? नहीं थे। आप कहीं और थे। किसी ने आपको फ़ोन किया, किसी ने आपको डराया, और आप भाग आए।"
"मैं… मैंने सुना था कि सुनवाई टल गई—"
"किसने कहा?"
वो चुप हो गए।
"भवानी के आदमी ने कहा होगा," मैंने कहा। "और आपने मान लिया। क्योंकि तीस साल से आप यही करते आए हैं। अब एक बार सच सुन लीजिए — भवानी का खेल ख़त्म है। उसके आदमी अब किसी को धमकी नहीं दे रहे, बल्कि खुद पकड़े जा रहे हैं। कल राजेंद्र ने उसके भेस बदलने वाले आदमी तक की पहचान ली है।"
शेखर बाबू ने लिफ़ाफ़ा मेज़ पर वापस रख दिया। उनका चेहरा बदल रहा था। वो उठकर खिड़की तक गए, बाहर देखा, फिर मेरी तरफ़ मुड़े।
"तुम झूठ नहीं बोल रहे?"
"मैं झूठ बोल सकता हूँ," मैंने कहा। "पर उस काग़ज़ की क़ीमत इतनी नहीं कि मैं उसके लिए झूठ बोलूँ।"
वो कुछ देर चुप खड़े रहे। फिर उन्होंने अपना चश्मा उतारा और आँखें मलीं। काँपती आवाज़ में बोले, "तो… तो ये लिफ़ाफ़ा अब भवानी को जाने की ज़रूरत नहीं?"
"नहीं।"
"तो मैं इसे क्या करूँ?"
"मुझे दें।"
वो हँसे। फिर भी वही सूखी हँसी, पर इस बार उसमें कुछ और था। जैसे कोई बहुत देर तक रोया हो और फिर हँसना याद आया हो।
"तुम सोच रहे हो — ये बूढ़ा मान जाएगा। सीधा-सीधा लिफ़ाफ़ा दे देगा। नहीं, मन्नू। अभी नहीं।" उन्होंने लिफ़ाफ़ा उठाया और दराज़ में वापस रखा। "मैं इसे तुम्हें तब दूँगा जब मैं ख़ुद अदालत में जाकर कहूँ कि ये लिफ़ाफ़ा मेरे पास था और मैंने इसे छिपाया। बीस साल तक। ये मेरा हिसाब है। अपने हाथ से चुकाऊँगा।"
वो दराज़ बंद करके मुड़े। चाबी घुमाई। फिर जेब में डालने के लिए हाथ बढ़ाया।
मैंने तेज़ी से उनका हाथ पकड़ा — और दराज़ का हैंडल थाम लिया।
"एक बात सुन लीजिए, फिर जाना," मैंने कहा।
वो झुँझलाकर रुके। "क्या?"
"भवानी ने आपको फ़ोन पर झूठ बोला। आपने कल रात जो लिफ़ाफ़ा उसे भेजने की सोची थी, अगर वो उसके हाथ लगता, तो भवानी उसे क्या करता? जलाता नहीं — क्योंकि वही तो उसके ख़िलाफ़ सबूत है। वो उसे अदालत में इस तरह पेश करता कि सारा इल्ज़ाम आप पर आ जाए। बोलता — 'ये शेखर ने बनाए थे।' और आप फँस जाते।"
शेखर बाबू का हाथ रुक गया।
"क्या?" उनकी आवाज़ सूख गई।
"आप उसके आदमी के हाथों लिफ़ाफ़ा देते, और वो पलटकर आपको ही चोर साबित कर देता। भवानी कहता — देखो, शेखर ने खुद काग़ज़ बनाए थे। आपकी बेटी की शादी? वो तो पहले ही टल जाती।"
शेखर बाबू ने चाबी मेज़ पर रख दी। उनके हाथ में कँपकँपी तेज़ थी।
"तो फिर?" उन्होंने धीरे कहा। "मैं क्या करूँ?"
"ये लिफ़ाफ़ा मुझे दें। मैं इसे कल अदालत में राजेंद्र के हाथ में दूँगा। और आप खुद अंदर आकर कहेंगे — ये मेरा था, मैंने छिपाया, मैं गवाही दूँगा। तब आपका हिसाब साफ़ होगा।"
शेखर बाबू कुर्सी पर बैठ गए। उन्होंने चश्मा फिर लगाया और दोनों हाथ मेज़ पर रख दिए। फिर धीरे से बोले —
"तुम्हारे पापा ने भी यही कहा था। बीस साल पहले। उस रात।"
मेरी साँस रुक गई। "क्या कहा था?"
"कहा था — शेखर, हिसाब छिपाने से बड़ा होता है, चुकाने से घटता है।" उन्होंने लिफ़ाफ़ा दराज़ से निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ाया। "ले जाओ। मेरे पापा ने मुझे जो नाम दिया, वो ओढ़ लिया था। अब उतार दूँगा।"
मैंने लिफ़ाफ़ा लिया और शर्ट के अंदर खोंस लिया।
तभी सीढ़ियों से पैरों की आवाज़ आई। भारी, तेज़ क़दम। दो आदमी। मैंने खिड़की से बाहर देखा — दो सफ़ेद कुर्ते, एक के हाथ में लाठी। वो दफ़्तार की तरफ़ ही आ रहे थे।
मैंने शेखर बाबू की तरफ़ देखा।
"पीछे का दरवाज़ा?" मैंने फुसफुसाकर कहा।
उन्होंने सिर हिलाया। "मेज़ के पीछे से — उस आलमारी के पीछे। अंधेरा है, पर मुझे रास्ता पता है।"
"आप बाहर आ जाइए — मेरे साथ।"
"नहीं।" उन्होंने साफ़ मना किया। "अगर मैं भागूँगा तो वो समझेंगे कि कुछ छिपा है। मैं यहीं बैठकर उन्हें चाय पिलाऊँगा। तुम निकल जाओ।"
"शेखर बाबू—"
"जाओ, मन्नू! जल्दी!" उन्होंने ज़ोर देकर कहा और मेरी तरफ़ काग़ज़ों का एक बंडल बढ़ा दिया, जो उन्होंने कहीं से निकाला था। "ये भी ले जाओ। पुराना हिसाब है। पापा का। जो उस रात की गाड़ी से जुड़ा है।"
मैंने बंडल शर्ट में खोंसा। उन्होंने मुझे आलमारी के पीछे धकेला। मैं अंधेरे में घुसा तो एक ठंडा दरवाज़ा महसूस हुआ। धक्का दिया — खुला। पीछे की सीढ़ियाँ। मैं तेज़ी से उतरने लगा। दो क़दम उतरा ही था कि ऊपर से आवाज़ आई —
"शेखर बाबू, हमें ठाकुर साहब ने भेजा है।"
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