The Token System – Chapter 923
भवानी एक पल चुप रहा। फिर धीरे से बोला, "क्योंकि उस रात अमर की माँ की तबीयत बहुत ख़राब थी। इलाज के पैसे नहीं थे। दादाजी ने सिक्का मेरी तरफ़ बढ़ाया और कहा — 'इसे रख ले। पर इसे कभी अपना न मानना। ये जिस हाथ में जाए, उसका हिसाब बांध देता है।' मैंने लिया। पैसे दिए। सिक्का रख लिया। फिर बाद में वो कभी वापस नहीं किया। बस यही मेरा हिसाब है।"
"और सुमन के बेटे का?"
भवानी की आँखें भर आईं। उसने सिर नीचे कर लिया।
"वो बोल नहीं सकता।" मैंने कहा, "समझ गया। अब मुझे हवेली की दीवार पर जाना है।"
"मन्नू," भवानी ने मेरा हाथ पकड़ा। "भीतर का कमरा बीस साल से बंद है। चाबी मैंने खो दी है। दरवाज़े पर खुदा है कि उसे खोलने वाला ही उसे बंद रखेगा। मैंने एक बार खोला था — बस एक बार, और वो सिक्का पहली बार जला था।"
"तुम डर गए?"
"बहुत।"
"और मैं नहीं डरूँ तो लिफ़ाफ़ा मिला ही क्यों?" मैंने कील जेब से निकाली। भवानी ने उसे देखा और एक कदम पीछे हट गया।
"ये मेरी कील है," उसने कहा। "मेरे खाते की।"
"कल रात मेरे आँगन में पड़ी थी," मैंने कहा। "मेरे नाम से। मेरी लिखाई में।"
भवानी ने आँखें मूँद लीं।
"तो हिसाब अभी साफ़ नहीं हुआ," उसने कहा। "बस हमने एक हिस्सा देख लिया।"
—
हवेली की दीवार बाहर से जिस तरफ़ दिखती है, वो तो सिर्फ़ ऊपर की हिस्सा है। बंसी मेरे साथ दीवार के उस पार पहुँचा, जहाँ पुरानी ईंटें धूल में धँसी थीं और ज़मीन में गड्ढा था। यहाँ से हवेली के पिछले कमरों की छतें दिखती थीं — बंद, पुरानी, काई पकड़े हुए।
"ये क्या जगह है?" बंसी ने धीरे पूछा। "यहाँ तो कोई आता ही नहीं।"
"कौन आएगा? हवेली की दीवार कभी ऊँची थी, अब ढही पड़ी है। इस तरफ़ कोई देखता भी नहीं।"
मैंने पोटली खोली। अंदर सूखी लाल मिर्च, थोड़ा सिंदूर, और चावल के कुछ दाने थे — माँ का साधारण नुस्खा, हर घर में पाया जाने वाला। पर नीचे एक महीन पत्तर भी था, किसी पुरानी ताबीज़ का आधा टुकड़ा।
बंसी ने देखकर कहा, "माँ ने ये क्यों दिया?"
"नहीं पता। पर वो कुछ जानती है।" मैंने कील उठाई और दीवार के पहले पत्थर की तरफ़ बढ़ाया। जिस जगह पत्थर में वो उलटा कोना-चिह्न खुदा था।
जैसे ही कील उस पत्थर को छूने लगी, एक लाइन मैंने देखी — पत्थर की चीर में कुछ सफ़ेद जमा था, बरसों पुरानी रेत। और उस रेत में दादाजी की लिखाई झलकी:
"अमन को लौटाने वाला, अमर को पाएगा।"
मैं पत्थर की तरफ़ झुक गया। बंसी ने मेरा कंधा पकड़ा।
"मन्नू, सोच ले। इस पत्थर को हटाया तो आगे जो भी है, हमारा ही होगा।"
"मैं तैयार हूँ," मैंने कहा। "तू?"
बंसी ने एक गहरी साँस ली और कील मेरे हाथ से ले लिया। "दो हाथ लगाएँगे, आधा-आधा हिसाब।"
हमने कील पत्थर की चीर में लगाई और दोनों ने एक साथ दबाया।
न पत्थर टूटा, न हिला। बस चीर से एक ठंडी आवाज़ निकली — किसी दूर से आती एक धीमी गूँज, जो मेरे कानों में एक शब्द बनकर घुल गई।
"अभी नहीं।"
तभी मेरी जेब से टोकन गरम होकर धड़का। मैंने निकाला। ठीक उस समय मेरी उँगली पर सफ़ेद स्याही उभरी और मिट गई —
"अमर का हिसाब पहले। हवेली का दूसरा।"
बंसी ने मेरी आँखों में देखा। "अमर ठीक है ना? सुमन ने कहा था ख़तरा टला।"
"बंसी, टोकन ऐसे ही कुछ नहीं लिखता।" मैंने पत्थर से कील खींच ली और पलटा। "अस्पताल चल। अभी।"
—
अस्पताल के गलियारे में सुमन हमारी तरफ़ दौड़ी आई। सफ़ेद कोट में, हाथ में फ़ाइल।
"मैंने तुम्हें फ़ोन किया था," उसने कहा। "तुम्हारा नंबर नहीं लगा।"
"मोबाइल घर पर भूल आया। क्या हुआ?"
"अमर को दोबारा लाना पड़ा।" सुमन ने धीरे से कहा। "सुबह ठीक था, फिर अचानक धड़कन बहुत धीमी हो गई। हमने उसे ड्रिप पर डाल दिया।"
"अब कैसा है?"
"स्थिर है। पर मैं झूठ नहीं बोलूँगी, मन्नू। ये स्थिरता अच्छी नहीं लग रही। कुछ हो रहा है उसके अंदर जो बाहर से ठीक नहीं दिख रहा।"
मैं उसके साथ वार्ड में गया। अमर सफ़ेद चादर में लिपटा था, आँखें झुकी हुईं, चेहरा फिर पीला। भवानी उसके बगल में फ़र्श पर ही बैठा था, जैसे सुबह से वहीं हो। मुझे देखकर उसकी आँखों में कुछ ऐसा आया जो मैंने उसमें कभी नहीं देखा — सिर्फ़ पसीना और सफ़ेद चेहरा।
"मन्नू," उसने आवाज़ दबाकर कहा, "मैंने जाकर दीवार के पास कुछ नहीं छुआ। मैं कसम खाता हूँ।"
"मैंने छुआ," मैंने कहा। "और टोकन ने रोका।"
भवानी मेरी तरफ़ देखता रह गया।
"अमर का हिसाब पहले — बस यही कह रहा है," मैंने कहा। "तुम्हारा और अमर का हिसाब अभी आधा ही हुआ। तुमने उससे माफ़ी नहीं माँगी।"
"मैंने… मैंने कहा था न, जो किया—"
"तुम्हारा बेटा तुम्हारी आवाज़ सुनना चाह रहा है," सुमन ने कहा। "ड्रिप में नींद में ज़्यादा है, होश में कम। जब होश में आता है, तुम्हारा नाम लेता है। और फिर मुँह फेर लेता है।"
भवानी ने अमर का हाथ उठाया। अमर ने पलकें हिलाईं।
"अमर," भवानी ने कहा। आवाज़ टूट रही थी। "मैं काफ़ी हूँ? देख, तुझे बचाने के लिए ही मैंने सब किया। तेरी माँ बीमार थी, सामने भविष्य अंधेरा था…"
अमर ने आँखें खोलीं। बहुत धीरे, जैसे पानी से ऊपर आता हो। उसकी नज़र भवानी पर पड़ी और फिर मेरी तरफ़। उसने एक गहरी साँस लेकर कहा —
"बाप, तूने मुझे बचाने के लिए किसी और का बच्चा मरवाया — यह बचाना नहीं, हिसाब है।"
भवानी का हाथ काँपा। उसने अमर का हाथ नहीं छोड़ा, पर सिर नीचे कर लिया। कुछ नहीं बोला। रोया। बस फ़र्श पर बैठा, अमर का हाथ पकड़े हुए, चुपचाप रोता रहा।
मैंने जेब से टोकन निकाला। ठंडा था। मैंने भवानी का सिक्का — जो उसने आज सुबह ही मेरे हाथ में दिया था — टोकन के साथ रखा।
दोनों एक पल के लिए ठंडे पड़े रहे। फिर दोनों पर एक ही लाइन उभरी, सफ़ेद स्याही से:
"हिसाब बराबर करने वाला ही असली मालिक है।"
भवानी ने मेरी तरफ़ देखा। आँखों में आँसू, पर आवाज़ में कुछ और।
"तेरे दादा ने यही किया था," उसने कहा। "उन्होंने सिक्का लौटाया था, इसीलिए मेरा खानदान आज तक बैठा है। मैं उन्हें कभी नहीं लौटाया।"
"तो अब तुम्हारा हिसाब भी बराबर होगा," मैंने कहा। "ये सिक्का राजेंद्र के पास है। वो इस बार अदालत में जाएगा। पर उससे पहले तुम एक काम करो।"
"क्या?"
"अमर की माँ के पास जाओ। माफ़ी माँगो। वो माफ़ करे या न करे — तुम्हारा हिसाब तब शुरू होगा।"
भवानी ने एट की तरह सिर हिलाया।
मशीन की आवाज़ बदली। बीप। बीप। बीप — तेज़, साफ़, रुक-रुक कर धड़कती।
सुमन ने कलाई देखी और मुस्कुराई। "मज़ेदार है। ड्रिप अभी बंद नहीं किया था। अब ख़तरा टल गया।"
अमर की आँखें खुली थीं। उसने भवानी की तरफ़ देखा और गहरी साँस लेकर बोला, "तेरे हाथ में गरमी है, बाप। कब से पकड़े है?"
भवानी हँसा। रोता हुआ हँसा। "बहुत देर से।"
—
रात ग्यारह बजे मैं घर पहुँचा। बंसी पीछे-पीछे आया, पर वो रास्ते में अपने घर मुड़ गया।
आँगन में दीया जल रहा था। माँ चौकी पर बैठी थी, शांति उसके पैरों के पास सोई थी।
"दीवार के पास गया?" माँ ने पूछा। "पत्थर?"
"नहीं हटा," मैंने कहा। "टोकन ने रोका। कहा — अमर का हिसाब पहले।"
माँ ने दीये की लौ की तरफ़ देखा। "अब?"
"अब अमर ठीक है।"
माँ ने एक लंबी साँस छोड़ी, जैसे बरसों की थकान एक साथ बह गई। "तू जल्दी कर रहा है, मन्नू।"
"पर माँ
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