The Token System – Chapter 920
“और ये गरम क्यों है?” मैंने पूछा।
“यही तो,” राजेंद्र ने कहा। “गवाही से पहले ठंडा था। भवानी के हार मानने के बाद से गरम है।”
“मतलब?”
“मतलब कुछ बड़ा होने वाला है,” राजेंद्र ने कहा। “क्योंकि जब टोकन गरम होता है, तो खाता बोलता है।”
मैंने टोकन देखा। राजेंद्र की हथेली पर वो गरम पीतल चमक रहा था, और उस पर धुँधले अक्षर उभरने लगे थे। मैंने करीब देखा। एक शब्द था।
“क्या लिखा है?” बंसी ने पूछा।
“ये,” मैंने कहा और उँगली रखी। शब्द था — “अधूरा।”
और उसके नीचे एक छोटी लकीर। पंद्रहवीं।
“इसका मतलब?”
“इसका मतलब यही कि भवानी ने हार मान ली, पर हिसाब नहीं माना,” मैंने कहा। “हिसाब अभी अधूरा है। और ये सिक्का बता रहा है कि जिसने इसे दिया, उसने अंतिम बात छिपाई है।”
“कौन सी बात?”
“ये तो वो ख़ुद बताएगा,” मैंने कहा। “कल फ़ैसले के वक़्त, जब सब खत्म होने वाला होगा — तब।”
मैंने सिक्का राजेंद्र को लौटाया। पर जैसे ही उसने उसे थामा, सिक्का और गरम हो गया — इतना कि राजेंद्र ने उसे फेंक दिया। सिक्का ज़मीन पर गिरा, गोल घूमा, और रुका — चमकता हुआ।
“इसे वापस उठाओ,” मैंने कहा। “कल तक संभालकर रखो। और किसी को मत बताना।”
“तेरे अलावा?”
“हाँ,” मैंने कहा। “क्योंकि ये सिक्का अब भवानी का नहीं, इसका है जो इसका हिसाब पूरा करेगा।”
राजेंद्र ने रूमाल से सिक्का उठाया और जेब में रखा। हम बाहर निकले। अदालत के बाहर भीड़ छँट रही थी, और एक तरफ़ खड़ी सफ़ेद गाड़ी की खिड़की में वो उलटे ज़ख़्म वाला हाथ फिर दिखा। इस बार गाड़ी में बैठा आदमी हाथ हिलाकर मुस्कुराया — जैसे कहे, “आज तो तू जीता, कल देखेंगे।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा और हाथ में पकड़े बुझे दीये को ऊपर उठा दिया। वो हँसा, खिड़की बंद हुई, गाड़ी चली गई।
“ये ज़ख़्म वाला कौन है?” बंसी ने कहा।
“पता चलेगा,” मैंने कहा।
घर की तरफ़ चलते वक़्त माँ ने रास्ते में पूछा, “कल फैसला है — तू डर रहा है?”
“डर नहीं,” मैंने कहा। “बस थोड़ा सोच रहा हूँ — दीवार पर जो नाम लिखा था, वो मैंने नहीं लिखा।”
“तू लिखेगा,” माँ ने कहा। “जब लिखेगा, तब उसका मतलब होगा — तूने माँगा, और हिसाब ने दिया।”
रात को मैंने टोकन जेब में रखा। वो ठंडा था, पर उस पर पंद्रह लकीरें अब भी उभरी थीं। और उसके नीचे छोटे अक्षरों में अब पाँच शब्द थे — “माँ। मिला। अधूरा। कल।”
अगली सुबह मैं अदालत पहुँचा तो सूरज निकले भी नहीं था। पर भवानी वहाँ पहले से बैठा था — उसी कुर्सी पर, सफ़ेद कुर्ता, बाल बिखरे, आँखों के नीचे काले घेरे। मुझे देखा और हाथ से इशारा किया, पास आ जा।
“रात भर सोया नहीं,” भवानी ने कहा। “घर में सब काग़ज़ फैला के बैठा रहा। पुराने रसीदें, ज़मीन के काग़ज़, मरीज़ों की पर्चियाँ।”
“तो?”
“तो ये कि तेरा हिसाब सही था,” उसने कहा। “मैंने अपने बाप के काग़ज़ों में एक नाम ढूँढा — श्यामलाल का नाम। असली नाम। जो उसने कभी किसी को नहीं बताया।”
“क्या नाम?”
वो बोलने ही वाला था कि दरवाज़े पर पुलिस का सिपाही आया, “भवानी सिंह, अंदर चलिए।”
भवानी उठा। मेरे कंधे पर हाथ रखा और धीरे से बोला, “अगर आज मेरी गवाही के बाद कुछ गड़बड़ हो, तो उस काग़ज़ को मत छोड़ना। पीले रंग का लिफ़ाफ़ा है, मेरी मेज़ की दराज़ में।”
फिर वो अंदर चला गया।
अदालत कमरे में भीड़ थी। माँ सबसे पीछे बैठी थी, गोद में शांति का वो बुझा दीया लिए। रघुवीर सिंह दाईं तरफ़, दो आदमियों के बीच। जगन्नाथ चाचा सबसे आगे — आज उन्होंने अपनी पुरानी शेरवानी पहनी थी, जैसे किसी को खुद से बड़ा साबित करना हो।
जज साहब आए। चश्मा पोंछा, फ़ाइल खोली।
“भवानी सिंह,” जज ने कहा, “कल आपने अपनी गवाही पूरी नहीं की। आज पूरी कीजिए। इस अदालत को सिर्फ़ सच चाहिए।”
भवानी खड़ा हुआ। उसने जेब से दो काग़ज़ निकाले — एक पुराना, पीला, मुड़ा हुआ; दूसरा नया, साफ़ लिखा हुआ।
“मेरे बाप के काग़ज़ कहते हैं,” भवानी ने शुरू किया, “कि हवेली की ज़मीन सौ साल पहले दो हिस्सों में बँटी थी। एक हिस्सा मेरे परिवार का, दूसरा — जगन्नाथ चाचा के परिवार का।”
जगन्नाथ चाचा की कुर्सी हिली। उन्होंने मुँह खोला, पर जज ने हाथ उठाया, “बीच में मत बोलिए।”
“मेरे बाप ने उनका हिस्सा दबा लिया,” भवानी ने कहा। “ये रसीद है — बयाने की, जिसमें मेरे बाप ने काग़ज़ बनवाया पर पैसा कभी नहीं दिया।”
उसने काग़ज़ जज की तरफ़ बढ़ाया। कमरे में सन्नाटा। सिर्फ़ माँ के हाथ में दीया थोड़ा खिसका।
जगन्नाथ चाचा अब खड़े हो गए। “मैं… मैंने साठ साल इस बात को सीने में दबाए रखा। जब मेरे बाप मरे, तब मैंने सोचा — भूल जाओ, हवेली बच्चों के लिए छोड़ जाओ। और यही सोचता रहा, जब तक मेरा बेटा… नहीं रहा।”
उनकी आवाज़ टूटी। वो रो पड़े — बूढ़े आदमी का रोना, जो सबको अंदर तक हिला देता है। भवानी ने नज़रें नीची कर लीं।
जज ने काग़ज़ देखा।
“मिस्टर भवानी सिंह,” जज ने कहा। “आपके ख़िलाफ़ ये गवाही आपको खुद नुकसान पहुँचा रही है। आपको पता है?”
“पता है, माई लॉर्ड,” भवानी ने कहा। “पर ये ज़मीन मेरी नहीं। कभी थी भी नहीं। जो ज़मीन चोरी की हो, वो छुपाने की चीज़ नहीं।”
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कोई जीत नहीं थी — बस एक पुराना सुकून, जैसे बरसों का काँटा टूटा हो।
जज ने फ़ैसला सुनाना शुरू किया। और जैसे-जैसे सुनाते गए, कमरे में हर कोई उस बड़े आदमी के किरदार को टूटते देख रहा था — जिसकी हवेली कभी गाँव की छत थी।
“हवेली किसी एक की नहीं,” जज ने कहा। “इसका आधा हिस्सा जगन्नाथ के परिवार का, आधा उन परिवारों का जिनसे ज़मीन छीनी गई। सूची तैयार की जाएगी। और भवानी सिंह पर लगाए गए हर मरीज़ का हिसाब — जो ज़्यादा पैसा लिया, वो लौटाया जाए।”
रघुवीर सिंह खड़े हो गए। “माई लॉर्ड, मेरा क्या?”
“आपके नाम पर जो ज़मीन है,” जज ने कहा, “वो बिना काग़ज़ के है। माँ के नाम से दर्ज होगी।”
रघुवीर का चेहरा काला पड़ गया। वो कुछ कहने ही वाला था कि भवानी ने उसकी तरफ़ देखकर धीरे से कहा, “बेटा, बैठ जा। मैंने तुझे दिया था — ग़लत था।”
“तुमने मुझे हवेली दी थी!” रघुवीर चीखा।
“और मैंने ही छीन ली,” भवानी ने कहा। “बस, जिसे जाना था उसी को गई।”
जज ने हथौड़ा पीटा। अदालत ख़त्म हुई।
बाहर निकलते ही भवानी ने मेरी तरफ़ देखा। एक पल को लगा कि कुछ कहेगा। फिर बस सिर हिलाया — ऐसे जैसे कहे, “तेरा हिसाब। तेरा बाप। मैंने दिया।”
पर पीछे मुड़ते ही राजेंद्र मेरे पास आया। उसकी आँखें बड़ी थीं, हाथ काँप रहा था।
“मन्नू, इधर,” वो मुझे कोने में ले गया।
“क्या हुआ?”
उसने जेब से वो पीतल का सिक्का निकाला। रूमाल जला-सा लग रहा था। सिक्का लाल था — इतना गरम कि धुआँ उठ रहा था।
“मेरे पास भवानी का टोकन है,” राजेंद्र ने धीरे कहा, “और ये गरम हो रहा है, मन्नू। अदालत के अंदर ठंडा हो गया था — फ़ैसले के बाद से जल रहा है।”
“क्या लिखा है अब?”
“देख, मैं छू नहीं सकता,” राजेंद्र ने कहा और सिक्का ज़मीन पर रख दिया।
सिक्के पर पुराने अक्षर मिट चुके थे। अब एक ही पंक्ति उभरी थी, और उसे पढ़ते ही मेरे हाथ ठंडे हो गए — “अंतिम नाम अभी बाकी है।”
“इसका मतलब?” राजेंद्र ने कहा।
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