The Token System – Chapter 919
“रामेश्वर लाल?” मैंने कहा। “ये तो भवानी के बाप का नाम है।”
“हाँ,” शांति ने कहा। “और यही नाम वो कल अदालत में बोलेगी?”
“बोलूँगी,” उसने कहा। “मैं चालीस साल से इस एक लाइन के लिए ज़िंदा हूँ।”
उसने दीया उठाया और मेरी तरफ़ बढ़ाया।
“ये दीया मैंने तेरे दादा के नाम का जलाया था,” उसने कहा। “अब तेरे हाथ में दे रही हूँ। इसे लेकर कल अदालत जा। जब भवानी का बाप का नाम सबके सामने आए, तब इसे बुझा देना।”
मैंने दीया लिया। वो अभी भी गरम था।
हम शांति को लेकर घर लौटे। रास्ते में बंसी ने धीरे से कहा, “मन्नू, एक बात सोच रहा हूँ। भवानी का बाप मरा हुआ है, उसका नाम अदालत में लेने से क्या फ़र्क़ पड़ेगा?”
“फ़र्क़ पड़ेगा,” मैंने कहा। “क्योंकि अगर बाप ने लूटा है, तो बेटे का माल उसी लूट का हिस्सा है। और अब भवानी कहेगा — ये सब मेरे बाप ने किया, मैंने नहीं। उसकी यही बचाव थी। अदालत में यही बचाव था।”
घर पहुँचे तो दालान में लालटेन जल रही थी। पापा चारपाई पर बैठे थे, माँ पास में, और उनके सामने वो काग़ज़ था जो शांति ने दिया था।
“मन्नू,” पापा ने कहा। “इधर आ।”
मैं गया। उन्होंने काग़ज़ पर उँगली रखी।
“रामेश्वर लाल,” पापा ने कहा। “ये नाम मेरे सामने अदालत में आएगा, तो मुझे भी बोलना पड़ेगा।”
“क्या बोलना है, पापा?”
“ये कि हरि सिंह और रामेश्वर दो नहीं थे,” पापा ने कहा। “एक ही आदमी थे। दो नाम, दो रूप। असली नाम रामेश्वर, और हरि सिंह उनका काम का नाम था। जिससे वो गरीबों को डराते थे।”
माँ ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया।
“मुझे आज तक इसका डर था,” माँ ने कहा। “अब छोड़ रही हूँ। जो बोलना है, बोल दो।”
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
“कल सुबह दस बजे,” उन्होंने कहा। “जगन्नाथ की गवाही से पहले मैं बोलूँगा।”
रात बाकी थी। मैं बंसी के साथ चाय की दुकान की तरफ़ चला। रास्ते में बंसी ने वो लिफ़ाफ़ा याद दिलाया जो सफ़ेद गाड़ी से गिरा था।
“अदालत में खोलेंगे,” मैंने कहा। “अभी नहीं।”
पर बंसी ने उसे रोशनी में रखा और चुटकी से किनारा फाड़ दिया। उसने अंदर से एक पीली पर्ची निकाली, जिस पर एक ही लाइन थी — “जो कल बोलेगा, वो कल के बाद नहीं बोलेगा।”
“धमकी है,” बंसी ने कहा।
“धमकी नहीं,” मैंने कहा। “ये सच है। जो कल अदालत में सच बोलेगा, वो और कुछ नहीं बोलेगा। क्योंकि सच बोलने के बाद इंसान को कुछ बोलने की ज़रूरत नहीं रहती।”
बंसी ने पर्ची जेब में रखी।
“मन्नू, तू आज कुछ ज़्यादा ही बोल रहा है,” उसने कहा।
“थक गया हूँ, बंसी,” मैंने कहा। “बोलकर ही आराम मिलेगा।”
सुबह अदालत का आँगन भरा हुआ था। इस बार ज़्यादा भीड़ थी — कुछ नए थे, जिन्हें मैं नहीं जानता था। एक कोने में कुछ औरतें खड़ी थीं, जिनके हाथ में काग़ज़ के बंडल थे। दूसरी तरफ़ कुछ बूढ़े आदमी, जिन्होंने अपनी-अपनी टोपी उतारकर हाथ में रखी थी।
जज साहब आए। चश्मा पोंछकर रखा।
“आज की सुनवाई खास है,” उन्होंने कहा। “क्योंकि आज गवाह और मुलज़िम दोनों तरफ़ के लोग ख़ुद सामने हैं। पहले गवाह — किशनचंद।”
पापा को व्हीलचेयर में अंदर लाया गया। वो बैठे थे, पर उनकी आवाज़ काँपी नहीं।
“जज साहब,” पापा ने कहा, “मैंने उस रात हवेली में जो देखा, वो बीस साल मेरे सीने में रहा। आज बताता हूँ। उस रात हवेली में हरि सिंह के कहे पर रामेश्वर लाल बैठे थे। मेरे दादा को अगले दिन कुएँ में गिराया गया।”
अदालत में सन्नाटा छा गया।
“कैसे मालूम कि रामेश्वर और हरि सिंह एक ही हैं?” भवानी के वकील ने खड़े होकर पूछा।
पापा ने काग़ज़ निकाला।
“ये हवेली के बँटवारे का काग़ज़ है,” उन्होंने कहा। “इसमें दो जगह दो नाम हैं, पर अँगूठे का निशान एक है। और इसके पीछे, स्याही से मिटाया हुआ, ये लिखा है — ‘एक ही जान, दो नाम।’”
जज साहब ने काग़ज़ देखा और रिकॉर्ड में लिया।
“गवाह — शांति देवी।”
शांति उठीं। उनके हाथ में पोटली थी। वो जज की मेज़ तक गईं और पोटली रख दी।
“जज साहब,” उन्होंने कहा। “ये मेरे भाई कन्हैया की डायरी है। इसमें रामेश्वर लाल का लिखा हुआ एक हिसाब है। और एक नाम है, जो काग़ज़ पर नहीं छपा, पर मेरे भाई ने लिख लिया।”
उन्होंने पन्ना खोला और पढ़ने लगीं। वो पंद्रह साल की उम्र में गाँव से भागी थीं — उन्हें पढ़ना नहीं आता था। पर अब वो पढ़ रही थीं। धीरे, अटक-अटक कर, पर पढ़ रही थीं।
“रामेश्वर लाल,” उन्होंने पढ़ा। “जिसने मेरे भाई को कुएँ में गिराया, उसका असली नाम रामेश्वर लाल था। और उसी रामेश्वर लाल ने मेरे भाई को बेचने की बात लिखी थी — क्योंकि मेरे भाई को टोकन के बारे में पता था।”
अदालत में एक आवाज़ उठी। जज ने मुहर लगाई।
“गवाह — जगन्नाथ चाचा।”
जगन्नाथ चाचा अपनी चाय की दुकान से आए। आँखों में पानी था, हाथ में पुरानी कॉपी।
“जज साहब,” उन्होंने कहा, “मैंने उस रात हवेली में देखा था — रामेश्वर लाल ने टोकन को फाड़ा। और उसका एक टुकड़ा मैंने अपनी जेब में रखा।”
उन्होंने टुकड़ा निकाला। टोकन का वो कोना, जो भवानी ने कल दिखाया था।
“पर ये तो भवानी के पास था?” वकील ने पूछा।
“भवानी के पास नक़ली था,” जगन्नाथ चाचा ने कहा। “असली मेरे पास था। और मैंने इसे बीस साल इसलिए रखा — क्योंकि मुझे पता था, एक दिन कोई इसे माँगने आएगा।”
वो रो पड़े। अदालत में कोई नहीं हिला।
जज साहब ने दो मिनट के लिए सुनवाई रोकी। फिर मेज़ पर अलग-अलग काग़ज़ रखे और पढ़ने लगे। भवानी ने सफ़ेद कुर्ते वाले को धीरे से कुछ कहा; वो सफ़ेद कुर्ते वाला माथा हिलाकर बाहर चला गया।
सुनवाई दोबारा शुरू हुई। भवानी का वकील खड़ा हुआ।
“जज साहब,” उसने कहा, “मेरे मुवक्किल की तरफ़ से एक आख़िरी बात। हवेली मेरे मुवक्किल के नाम पर है, पर वो ख़ुद कहना चाहते हैं।”
भवानी खड़ा हुआ। उसके सफ़ेद कुर्ते का कालर खुला था, और उसका चेहरा पहले जैसा नहीं था — न हँसी, न घमंड, बस थकान।
“जज साहब,” भवानी ने कहा, “मैं हवेली का दावा वापस लेता हूँ।”
अदालत में हलचल मच गई।
“इसका मतलब?” जज ने कहा।
“मतलब ये कि मैंने कभी सोचा नहीं था कि हिसाब इतना लंबा होगा,” भवानी ने कहा। “मैंने सिर्फ़ माल जोड़ा, हिसाब नहीं देखा। अब देखा है — और मैं हारता हूँ।”
उसने अपनी जेब से कुछ निकाला। भवानी का टूटा सपाट टोकन था।
“ये भी अदालत के हवाले,” उसने कहा। “और जो मेरे पास काग़ज़ हैं — सब।”
जज साहब ने काग़ज़ों की तरफ़ देखा।
“मिस्टर भवानी सिंह,” जज ने कहा। “आपकी गवाही अदालत लेती है। फ़ैसला कल सुनाया जाएगा।”
भवानी बैठ गया। उसके वकील ने उसकी तरफ़ देखा, पर वो कुछ नहीं बोला।
अदालत खत्म हुई। लोग बाहर निकलने लगे। मैंने शांति का दीया जलाया रखा था, हाथ में। जैसे ही भवानी बाहर निकला, मैंने दीया उसके सामने रख दिया।
“ये आपके बाप के नाम का जला था,” मैंने कहा। “अब बुझा रहा हूँ।”
मैंने दीया फूँक से बुझाया।
भवानी ने दीये को देखा।
“अब कुछ बचा है?” उसने पूछा।
“बचा है,” मैंने कहा। “आपका हिसाब।”
वो चला गया। राजेंद्र ने मुझे कोने में बुलाया। उसके हाथ में एक पीतल का सिक्का था — सपाट, बिना लकीर, ठंडा नहीं — गरम।
“मन्नू,” राजेंद्र ने धीरे कहा, “ये भवानी का टोकन है। उसने मुझे दिया था, अदालत से पहले।”
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