The Token System – Chapter 92
"तूने आज तक मुझे क्यों नहीं बताया?"
"क्या बताता? कि तेरे घर की दीवार में एक और दुनिया बंद है? तू तब बच्चा था। फिर तू बड़ा हो गया, पर मैं डरता रहा। भवानी का नाम लेते ही लोगों की ज़ुबान सूख जाती है। मेरी भी सूखी थी।"
मैं वहीं खड़ा रहा। चाय ठंडी हो रही थी। दूर किसी गाड़ी का हॉर्न बजा और बंसी ने कुल्हड़ उठा लिया।
"अब सुन," उसने कहा। "भवानी के दफ़्तर के पीछे एक लोहे की तिजोरी है। उसके होम के पीछे वाले कमरे में। उस तिजोरी को वो किसी को छूने नहीं देता — न मुंशी, न अपने बेटे को, न उन काली शर्ट वाले आदमियों को। एक बार मैं वहाँ गया था, पुराने हिसाब का काम था। उसने मुझे बाहर बैठाया, पर दरवाज़ा पूरा बंद नहीं हुआ था। मैंने देखा — वो तिजोरी खोल रहा था। अंदर से एक पीतल का टुकड़ा निकाला। छोटा सा। और उसे देखकर उसके हाथ काँप रहे थे।"
"काँप रहे थे?"
"भवानी के हाथ। जो आदमी किसी की ज़मीन एक झटके में हड़प लेता है, उसके हाथ काँप रहे थे — किसी पीतल के टुकड़े से।"
मैंने जेब में हाथ डाला। मेरा कोना वहाँ था। ठंडा था। बर्फ़ जैसा ठंडा।
मैंने निकाला। बंसी ने देखा। उसके होंठ सिकुड़े।
"अभी?"
"अभी।"
कोने पर एक नई लकीर उभर रही थी। धीरे-धीरे, जैसे किसी पुराने पत्थर पर उँगली चल रही हो। अक्षर बने — "तहसील दफ़्तर। एक बूढ़ा। दो दिन।"
बंसी ने पढ़ा। "तहसील दफ़्तर?"
"कल मैं वहाँ जाऊँगा।"
"मैं भी चलूँगा।"
"तेरी दुकान?"
"दुकान दो दिन बंद रहेगी तो कोई मर नहीं जाएगा। और अगर मैं नहीं गया, तो वो बूढ़ा तुझे कुछ नहीं बताएगा। तहसील के आदमी बिना जान-पहचान के नहीं खुलते।"
मैंने कोना वापस जेब में रखा। बंसी ने चाय फेंकी और नया कुल्हड़ भरा।
"एक बात और," उसने कहा। "वो लिफ़ाफ़ा — पचास हज़ार वाला।"
"क्या?"
"घर में मत रखना। घर के दीवार में तो कभी नहीं। पैसा जो किसी और की मेहनत का है, वो दीवार में रखो तो दीवार भी बोझ उठा लेती है।"
मैं दुकान से निकला तो दिन चढ़ आया था। लौटते वक़्त मैंने सोचा — घर में क्या है? दीवार के दूसरे पाट में क्या है? वो चीज़ भवानी के टोकन का हिस्सा है, या मेरे टोकन का? और अगर दोनों एक ही दीवार से निकले हैं, तो मेरे दादा ने आधा क्यों छुपाया और आधा जेब में रखा?
घर पहुँचा तो दोपहर ढल रही थी। माँ चूल्हे पर बैठी थीं। मैंने लिफ़ाफ़ा मेज़ पर रखा। माँ ने देखा। कुछ नहीं पूछा। बस चूल्हे की आँच धीमी की और बोलीं — "जो पैसा किसी की मेहनत का हो, वो घर में नहीं टिकता।"
"माँ —"
"मैं कुछ नहीं कह रही। तू जानता है।"
मैंने लिफ़ाफ़ा उठाया। घर की पिछली दीवार के पास गया। वो वाली ईंट। मैंने नाखून से मिट्टी खोदी। ईंट हिली।
मैंने पहला पाट खोला — खाली। पापा का काग़ज़ मैंने निकाल लिया था।
फिर मैंने ईंट को पूरा बाहर निकाला। पीछे अंधेरा था। हाथ डाला। ईंटों के बीच एक और जगह थी, जिसे पहले किसी ने मिट्टी से पोतकर छिपाया था। मिट्टी सूखी थी, पर नई थी — किसी ने हाल में छुआ था।
मैंने मिट्टी खरोंची। अंदर एक छोटी पोटली थी। लाल कपड़े में बँधी। मैंने खोला।
अंदर एक पीतल का टुकड़ा था। मेरे कोने जितना ही, पर इसका किनारा दूसरी तरफ़ टूटा था। मैंने जेब से अपना कोना निकाला। दोनों को पास रखा।
वो दोनों जुड़ गए। एक पूरा सिक्का बन गया — जैसे कभी टूटा ही न हो। सिक्के पर एक ही लकीर उभरी — "हिसाब चालू। दोनों तरफ़ से।"
मेरे हाथ काँप रहे थे। माँ पीछे खड़ी थीं। मैंने पलटकर देखा। उनकी आँखों में पानी था।
"ये तेरे दादा ने छुपाया था," माँ ने कहा। "वो कहते थे, एक दिन लड़का आएगा और इसे जोड़ेगा। पर भवानी वाले को कभी नहीं जोड़ने देना।"
"भवानी के पास वाला टोकन?"
"वो असली नहीं है। वो टूटा हुआ है। जब वो टूटा, तो एक हिस्सा तेरे दादा के पास आया और एक हिस्सा — भवानी के दादा के पास। दोनों ने अलग-अलग हिसाब चलाए। पर आधा टोकन कभी पूरा काम नहीं करता। इसलिए भवानी का हिसाब कभी बराबर नहीं होता। वो जितना कमाता है, उतना उसका बोझ बढ़ता जाता है।"
मैंने दोनों टुकड़ों को पोटली में वापस लपेटा।
"अब क्या?" माँ ने पूछा।
"कल तहसील जाना है।"
"बंसी के साथ?"
"हाँ।"
"तो जा। पर एक बात — तू जो भी कर, उससे किसी का घर न टूटे। भवानी का टूटे तो टूटे, पर उसके पीछे जो औरतें बैठी हैं, वो न टूटें।"
मैंने सिर हिलाया।
रात को मैंने पोटली को उसी ईंट के पीछे नहीं रखा। उसे कुर्ते की अंदरूनी जेब में रखा। ईंट वापस लगा दी। फिर मैं छत पर गया।
वहाँ बैठा था कि रीना आई। उसके हाथ में एक कप चाय थी।
"अब बता," उसने कहा। "पचास हज़ार का क्या करेगा?"
"सोच रहा हूँ।"
"सोच-सोच में ज़िंदगी निकल जाती है।"
"तू क्या कहती है?"
रीना ने कप मेरे हाथ में दिया और सामने बैठ गई। "मैं कहती हूँ — जिस मरीज़ को जो चाहिए, उसकी तरफ़ भेज दे। और जो बचे, वो मेरे स्कूल के बच्चों के लिए।"
"स्कूल में क्या?"
"किताबें। बस्ते। जूते। तूने कभी देखा है, मन्नू, हमारे स्कूल के बच्चे चप्पल पहनकर आते हैं? सर्दी में भी।" उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "तीस बच्चे हैं। हर एक के जूते चालीस-पचास के आते हैं। हिसाब लगा।"
"ये तेरी शादी का पैसा है।"
"मेरी शादी को किसी के जूते नहीं चाहिए। मुझे ऐसा घर चाहिए जहाँ आने वाला आदमी ये समझे कि मैं अपना पैसा कहीं और भी लगा सकती हूँ। बाकी उसकी मर्ज़ी।"
वो उठी। सीढ़ी से नीचे जाने लगी, फिर रुकी। "एक और बात। लड़के वाले परसों आ रहे हैं। लालाजी के साथ। देख ले, अपनी शर्ट तो इस्त्री कर ले।"
"अच्छा है," मैं मुस्कुराया।
वो चली गई।
मैंने कुर्ते के अंदर हाथ डाला। पोटली वहीं थी। पर पोटली ठंडी थी।
मैंने निकाला। दोनों टुकड़े अभी भी जुड़े हुए थे। पर उनकी सतह पर एक नई लकीर उभर रही थी, जो पहले नहीं थी। मैंने उसे आँखों के पास उठाया। चाँदनी में पढ़ा।
"दो दिन बाद। तेरा घर। वो आदमी।"
मैंने आसमान की तरफ़ देखा।
भवानी ख़ुद आएगा। मेरे घर।
मैंने पोटली जेब में रखी और चाय की आख़िरी घूँट ली।
चाय की आख़िरी घूँट लेते-लेते मेरे हाथ से कप फिसक गया।
मैंने पकड़ना चाहा, पर देर हो गई। कप सीढ़ी से लुढ़ककर नीचे आँगन की मिट्टी पर गिरा। आवाज़ हुई। नीचे से माँ की आवाज़ आई — "क्या तोड़ा?"
"कुछ नहीं, माँ। कप गिर गया।"
"उसी को तोड़ा है।"
मैं हँसकर नीचे उतर आया। कप नहीं टूटा था, बस चटक गया था। माँ ने उसे उठाकर दीवार के किनारे रख दिया और मेरी टाँगों पर हाथ फेरा। रात की हवा में उनका हाथ ठंडा था।
"तू सो जा," वो बोलीं। "सुबह जल्दी उठना है।"
मैं कमरे में गया। पोटली को तकिये के नीचे रखा। आँख लगी तो सपने में वो दुकान आई जहाँ भवानी बैठता है — पर दुकान खाली थी, सिर्फ़ एक तिजोरी थी, और तिजोरी के अंदर से कोई खटखटा रहा था।
सुबह मैं उठा तो बंसी दरवाज़े पर बैठा था।
"अरे, तू तो अभी से आ गया?"
"रात भर नींद नहीं आई," बंसी ने अपनी मूँछों को सेहरते हुए कहा। "सोचता रहा — तहसील दफ़्तर में बूढ़ा कौन?"
"कौन?"
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