The Token System – Chapter 93
"पता नहीं। पर कल मुझे याद आया — तेरे पापा के काग़ज़ पर जो मोहर थी, वो गिरदावर की थी।" उसने चारों तरफ़ देखा। "गिरदावर का मतलब तहसील। तो हिसाब भी वहीं बंद होगा।"
मैंने पोटली जेब में डाली और चाय पीकर निकल पड़ा।
तहसील दफ़्तार उस क़स्बे के बाहर था, जहाँ कभी-कभी ही हम लोग जाते थे। साइकिल से डेढ़ घंटे। बंसी पीछे बैठा था और रास्ते भर बोलता रहा — किसानों की ज़मीन, किसकी फ़सल बिकी, किसका कर्ज़ बढ़ा। मैं सुनता रहा, पर मेरे कान पीछे की तरफ़ थे। सड़क पर एक जीप हमें ओवरटेक करके गई। उसमें बैठे दो लोगों ने हमें देखा। एक ने दूसरे को कुछ कहा। जीप आगे निकल गई।
"उन्होंने हमें देखा," बंसी ने कहा।
"तू तो बोल रहा था।"
"बोलना एक बात है, मन्नू। देखना दूसरी।" उसने मेरी कमर पर हाथ रखा। "तेरे कुर्ते में कुछ है।"
"कल बताऊँगा।"
"आज बताऊँगा वाला जवाब दे।"
मैंने साइकिल रोकी। एक पेड़ की छाँव में ले गया। पोटली खोली। दोनों टुकड़े जुड़े हुए थे।
बंसी ने देखते ही हाथ जोड़ लिए।
"मेरे दादा का," मैंने कहा। "माँ ने बताया। भवानी के पास आधा है, आधा मेरे दादा ने छुपा दिया था। दोनों जुड़ते हैं तो हिसाब पूरा होता है।"
बंसी कुछ देर बैठा रहा। उसने टुकड़े को छुआ नहीं, बस देखा।
"तेरे दादा कभी तहसील जाते थे?"
"पता नहीं।"
"मेरे पापा बताते थे — तेरे दादा हर तीसरे महीने तहसील जाते थे। किसी से मिलते थे। लौटकर कुछ नहीं बोलते थे। माँ से भी नहीं।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "और एक बात। तेरे पापा भी जाते थे। उसी काग़ज़ के सिलसिले में।"
"तूने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?"
"क्योंकि मुझे ख़ुद यक़ीन नहीं था। मरे हुए आदमियों की बात करना… कभी-कभी गलत साबित होता है।" वो उठा। "चल। जो बूढ़ा मिलेगा, वही बताएगा।"
तहसील दफ़्तर पहुँचे तो दो बज चुके थे। दफ़्तर बंद होने की तैयारी थी। एक चपरासी ने हमें रोका।
"काम क्या है?"
"गिरदावर से मिलना है," मैंने कहा।
"आज नहीं। वो अंदर बैठे हैं, पर…"
"कौन बैठा है?" बंसी ने पूछा।
"गिरदावर। बाबू रामदीन।"
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। रामदीन। वो नाम मेरे कानों में कहीं गूँजा। जैसे बचपन में कहीं सुना हो।
"इंतज़ार करेंगे," मैंने कहा और चपरासी के हाथ में पाँच का नोट रख दिया। कुछ नंबरों वाला। उसने कमरे की तरफ़ इशारा किया।
अंदर एक बूढ़ा आदमी था। कमर झुकी हुई। मेज़ पर काग़ज़ों का ढेर। चश्मा नाक पर टिका था। हमें देखकर उसने चश्मा उतारा।
"क्या काम है?"
"रामदीन जी," मैंने धीरे से कहा, "मेरा नाम मन्नू है। मेरे पापा का नाम जगदीश था।"
बूढ़े का हाथ मेज़ पर रखे काग़ज़ पर अटक गया। कुछ देर उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर बंसी को देखा। फिर उसने आँखें बंद कर लीं।
"अब आया तू," उसने कहा। आवाज़ भारी थी। "मैं इंतज़ार कर रहा था। बैठ।"
हम बैठे। उसने अपनी मेज़ का दराज़ खोला। अंदर से एक पुरानी फ़ाइल निकाली। उस पर धूल जमी थी।
"तेरे पापा महीने में एक बार आते थे। एक हिसाब लाते थे। मैं उस पर मुहर लगाता था।" उसने फ़ाइल खोली। "ये हिसाब भवानी के नर्सिंग होम के नाम पर चलता है। पर पैसा चार जगह बँटता है।"
"चार जगह?"
"भवानी को सबसे कम मिलता है। ज़्यादा उसके पीछे बैठे आदमी को। और एक हिस्सा — उस लोहे की तिजोरी में जाता है।"
"तिजोरी किसकी है?" बंसी ने पूछा।
"तिजोरी पर तो कोई नाम नहीं है। पर चाबी भवानी के पास है। और एक दूसरी चाबी —" उसने मेरी तरफ़ देखा, "— तेरे पापा के पास थी।"
मैं सीधा बैठ गया।
"दूसरी चाबी?"
"हाँ। तिजोरी में दो ताले हैं। एक भवानी खोलता है, दूसरा तेरे पापा। अकेले कोई नहीं खोल सकता। दोनों का साथ होना ज़रूरी है। यही उनका सौदा था।"
"तो पापा मरे," मैंने कहा, "और तिजोरी बंद पड़ी है।"
बूढ़े ने सिर हिलाया। "बंद नहीं। भवानी ने अपनी तरफ़ का ताला लगा दिया है। पर जो दूसरी तरफ़ था, वो उसने ख़ुद नहीं लगाया — उसने किसी और से लगवाया।"
"किससे?"
रामदीन ने खिड़की की तरफ़ देखा। बाहर धूप ढल रही थी।
"तेरे पापा के मरने के बाद," उसने कहा, "एक आदमी तहसील आया था। मोटा, बड़ी मूँछें। भवानी के साथ। उसने वही दूसरी चाबी दिखाई। मैंने पूछा — कहाँ से मिली? वो हँसा और बोला, मुर्दे के पास रखी चीज़ें कब तक पड़ी रहेंगी?"
मेरे हाथ मुट्ठी में बंद हो गए।
"उसका नाम?"
"उसने नाम नहीं बताया। पर भवानी उसे 'भैया' कहता था।" रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा। "और वो तेरे पापा के घर आया था। उसी दिन। जिस दिन काग़ज़ ग़ायब हुए।"
कमरे में देर तक कोई नहीं बोला। बाहर चपरासी की खाँसी आई। बंसी ने अपनी जेब से पान निकाला, फिर बिना खाए रख दिया।
"बाबू जी," मैंने कहा, "काग़ज़ की उस फ़ाइल पर हस्ताक्षर किसने किए थे? तहसील की मुहर के साथ?"
"तेरे पापा ने और भवानी ने। दोनों के हस्ताक्षर हैं। हिसाब दोनों के बीच का है।" उसने फ़ाइल मेरी तरफ़ सरका दी। "इसकी एक कॉपी तेरे पास होनी चाहिए।"
"ये तो मेरे काम की नहीं।"
"मन्नू," उसने धीरे से कहा, "तू सोचता है मैं इतने बरस चुप क्यों बैठा था? क्योंकि मैं बूढ़ा हूँ, मेरे बच्चे नहीं। किसी को परेशान करने की ताक़त नहीं। पर तेरे पापा ने मुझ पर भरोसा किया था। उन्होंने कहा था — एक दिन मेरा लड़का आएगा, तो उसे ये दे देना।"
उसने फ़ाइल मेरे हाथ पर रख दी और उठ खड़ा हुआ।
"अब जा। सूरज डूब रहा है। रास्ता लंबा है।"
मैं उठा। दरवाज़े तक गया। फिर रुका। "एक आख़िरी बात। जो मोटा आदमी — वो अब भी आता है?"
रामदीन ने खिड़की के बाहर देखा। "कल आया था। मुझसे पूछ रहा था कि कोई लड़का तहसील आया क्या।"
बंसी ने मेरी कलाई पकड़ ली।
हम बाहर निकले। साइकिल पर बैठे। कुछ दूर आकर बंसी ने कहा — "वो जीप। सुबह वाली।"
"हाँ।"
"मन्नू, वो लोग हमारे पीछे हैं।"
"पता है।" मैंने पैडल मारी। "इसलिए जल्दी घर चल। कल सुबह से पहले मुझे भवानी के दफ़्तार में होना है। दूसरी चाबी उसी के पास है। अगर वो आदमी भी वहीं आया, तो सब एक जगह मिल जाएँगे।"
रात को घर पहुँचा तो बारिश की बूँदें गिरने लगी थीं। माँ बरामदे में बैठी थीं। मैंने फ़ाइल उन्हें दिखाई। उन्होंने छुआ तक नहीं। बस देखा।
"पापा के हस्ताक्षर हैं," मैंने कहा।
"मैं जानती हूँ।" उनकी आवाज़ सपाट थी। "मैंने एक बार इसे देखा था, उसी दिन। जिस दिन वो आदमी घर आया था।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "वो मोटा था? मूँछें?"
"तूने उसे देखा था?"
"देखा था। वो तेरे पापा से लड़ा था। चिल्ला रहा था — 'तू मेरा हिस्सा खा रहा है।' तेरे पापा ने उसे धक्का दिया। वो चला गया। उसके बाद…" उन्होंने लिफ़ाफ़े की तरफ़ देखा। "…उसके बाद तेरे पापा ने ये सब छुपाना शुरू किया। मुझे डर था कि तू भी उसी रास्ते पर निकल जाएगा। इसलिए कुछ नहीं कहा।"
"माँ, तूने मुझे बताया नहीं होता तो मैं कभी नहीं जानता।"
"अब जान गया। और अब सोच ले — तेरे पापा क्या चाहते थे? हिसाब बंद करना, या हिसाब पूरा करना?"
मैं बरामदे में बैठ गया। बारिश तेज़ हो रही थी। माँ चली गईं। बंसी दरवाज़े पर खड़ा था, बैठा नहीं, बस खड़ा।
"कुछ सोचा?" उसने कहा।
"सोच रहा हूँ — अगर कल चाबी हाथ लगी, तो तिजोरी खोलूँ या नहीं?"
"क्यों नहीं खोलेगा?"
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