The Token System – Chapter 913
"हुज़ूर, ये काग़ज़ असली नहीं है। ये मेरे मुवक्किल के ख़िलाफ़ साज़िश है। इस पर कोई मुहर नहीं, कोई तारीख़ नहीं, कोई गवाह नहीं। और जहाँ तक निशान की बात है, ये कोई बच्चों की पहेली है। कलाई पर निशान बहुत लोगों के होते हैं।"
जज ने सिर हिलाया, जैसे सोच रहे हों। मेरा दिल धक-धक कर रहा था।
और तभी — अदालत के दरवाज़े पर हलचल हुई।
दो सिपाही अंदर आए। उनके बीच एक व्हीलचेयर थी। और उस व्हीलचेयर पर बैठे थे — पापा।
मैंने अपनी आँखों पर विश्वास नहीं किया। पापा का चेहरा पीला था, कमज़ोर, पर आँखों में वो चमक थी जो मैंने बीस साल बाद पहली बार देखी। माँ ने मुँह पर हाथ रख लिया। रीना ने मेरा कंधा पकड़ लिया।
व्हीलचेयर जज की मेज़ के सामने रुकी। पापा ने सिपाही का हाथ पकड़कर ख़ुद को सहारा दिया और धीरे-धीरे उठे। उनकी टाँगें काँप रही थीं, पर वो खड़े हो गए।
"हुज़ूर," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ भारी थी, जैसे बहुत दिनों से इस्तेमाल न हुई हो। "मैं इस काग़ज़ को पहचानता हूँ। ये असली है।"
भवानी के वकील ने फ़ौरन कहा — "हुज़ूर, ये कौन हैं? इन्हें अदालत में पेश होने की इजाज़त किसने दी?"
पापा ने उनकी तरफ़ देखा। "मैं किशन हूँ। कन्हैया माली का बेटा। बीस साल से भवानी के होम की तीसरी मंज़िल पर बंद।" उन्होंने जज की तरफ़ देखा। "और मैं इस काग़ज़ के बारे में सच बता सकता हूँ।"
जज ने सिपाहियों की तरफ़ देखा, फिर सुमन की तरफ़, फिर मेरी तरफ़। "ठीक है। गवाह बोले।"
पापा ने एक गहरी साँस ली और अपनी कमज़ोर आवाज़ में कहा — "यह काग़ज़ असली है। मैंने ख़ुद अपने पिता के हाथ से यह लिखते देखा था। और मैं गवाही दूँगा।"
अदालत में पूरा सन्नाटा छा गया। भवानी की मुस्कान जैसे किसी ने हवा में ही मिटा दी। उसका वकील कुछ कहने के लिए मुँह खोल ही रहा था कि पापा ने हाथ उठाया।
"पर पहले," पापा ने कहा। "मुझे वो आदमी चाहिए जिसने इस काग़ज़ को मेरे बेटे तक भेजा। क्योंकि जो उसने लिखा है — 'तेरे पीछे वाला चुप नहीं बैठेगा' — वो सिर्फ़ धमकी नहीं है। वो सच है। और मैं उसे बाँधकर रखना चाहता हूँ, अदालत के सामने।"
जज ने देखा — पहले पापा को, फिर मेरी तरफ़, फिर राजेंद्र को जो पीछे खड़ा था। और फिर उन्होंने कहा — "यह काग़ज़ न्यायालय के रिकॉर्ड में दर्ज किया जाएगा। और जो आदमी इसके पीछे है, उसकी पहचान जाँच का विषय है।"
फिर वो मेरी तरफ़ मुड़े। "मनोहर, तुमने आज एक ज़रूरी काग़ज़ पेश किया है। लेकिन मैं तुमसे एक सवाल पूछूँगा — तुम्हें यह काग़ज़ किसने दिया? क्योंकि मेरे साथ आने वाला आदमी, जिसकी तुम बात कर रहे हो, वो मेरा कोई नौकर नहीं है। वो मेरे पुराने मित्र हैं। और आज सुबह से वो मेरे घर पर नहीं हैं।"
ये पूरी अदालत के लिए एक खुलासा था। और मेरे लिए, एक नई उलझन।
जज ने आगे कहा — "मैं उनका नाम नहीं लूँगा, क्योंकि मामला जाँच में है। लेकिन मनोहर, तुम अगर उनके नाम का सुराग़ मुझे अलग से दो, तो मैं उसकी जाँच करवाऊँगा।"
मैंने सिर हिलाया।
तभी पापा ने धीरे से कहा — "हुज़ूर, एक बात और। मेरे पास वो काग़ज़ नहीं है, पर मुझे याद है कि उस रात मेरे पिता ने मुझसे क्या कहा था। उन्होंने कहा था — 'बेटा, अगर कभी टोकन वाला हिसाब खुले, तो उसमें नाम उसका लिखा जाएगा जिसने बही लिखी। और बही वाला नाम कभी किसी की जेब में नहीं रखा जाता। हर व्यक्ति के दिल में होना चाहिए।'"
जज कुछ पल सोचते रहे। फिर उन्होंने कहा — "आज का काम इतना ही। मनोहर, यह काग़ज़ न्यायालय के कब्ज़े में रहेगा। तुम और तुम्हारा परिवार, तीनों गवाहों के नाम पर हस्ताक्षर करो।"
मैंने काग़ज़ के नीचे अपना नाम लिखा, बंसी ने भी, और सुमन ने भी।
जब हम बाहर निकले तो माँ चुपचाप रो रही थीं, पर उनके होंठ मुस्कुरा रहे थे। पापा की व्हीलचेयर सिपाहियों ने अस्पताल की तरफ़ मोड़ी — डॉक्टर उन्हें बिना जाँच के छोड़ने को राज़ी नहीं थे।
रीना ने पापा का हाथ पकड़ लिया और धीरे से कहा — "पापा, अब आप घर चलिए। माँ ने चाय रखी है।" पापा हँसे — एक छोटी सी हँसी, जैसे बहुत दिनों बाद।
मैं अदालत के बाहर बंसी के साथ खड़ा था। सामने सड़क की तरफ़ देख रहा था। और तभी मुझे वो काग़ज़ याद आया — पिछवाड़े के फाटक पर आ जाने की शर्त।
"बंसी," मैंने कहा, "उस आदमी ने शर्त रखी थी कि काग़ज़ लेकर अस्पताल के पिछले फाटक पर आ जाना। उसे पता है कि इस काग़ज़ को स्वतः सबसे पहले कहाँ छिपाया जाता है?"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "तू कहना क्या चाहता है?"
"वो जानता था कि हम इस काग़ज़ को अस्पताल में रखेंगे। जैसे शेखर बाबू के पास से लिया काग़ज़ पहले रिकॉर्ड कमरे में जाएगा। इसका मतलब वो हमारे हर क़दम का अंदाज़ा लगा रहा है।"
बंसी ने सिर हिलाया। "या फिर वो हमारे किसी आदमी से बात कर रहा है।"
मैंने पीछे की तरफ़ देखा — अदालत के सीढ़ियों पर, भीड़ के आर-पार, एक आदमी वहाँ से जा रहा था। उसका चेहरा नहीं दिखा। उसके कंधे पर एक पुराना सफ़ेद कपड़ा था और कलाई पर कुछ था — मैं दूर से ठीक से नहीं देख सका, पर वो उल्टे लंबे ज़ख़्म जैसा लगा।
मैंने झपटकर देखा और रीना की तरफ़ हाथ बढ़ाया। "रीना, ये आदमी…"
"मैंने इसे देखा नहीं," रीना ने कहा। "जबसे पापा आए हैं, मैं तो…"
"कोई नहीं," मैंने कहा। "छोड़ो।"
मैंने जेब से टोकन निकाला। वो अभी भी ठंडा था, पर "नाम" शब्द धुँधला पड़ रहा था और उसके नीचे नई लकीरें उभर रही थीं। नीचे कोई शब्द बन रहा था।
"क्या लिखा है?" बंसी ने पूछा।
"अभी पूरा नहीं बना," मैंने कहा। "पर लगता है वो भी उसी शख्स का इंतज़ार कर रहा है। जो मेरे पीछे सफ़ेद कुर्ते में छुपा है — और जिसने काग़ज़ माँगा, पर नाम नहीं दिया।"
तभी मेरा मोबाइल बजा। स्क्रीन पर सुमन का नाम था।
"मन्नू," सुमन की आवाज़ में हड़बड़ी थी। "अमर के कमरे में कोई घुसा था। उसने उसका पर्दा हटाया, पलंग के नीचे हाथ डाला, पर जब मैं आई तो फुर्र से निकल गया। और — मैंने उसकी कलाई पर वो निशान देखा, मन्नू। उलटा ज़ख़्म।"
"क्या चीज़ गायब हुई?"
"कोई चीज़ नहीं," सुमन ने कहा। "पर अमर की जेब में एक पर्ची छोड़ गया है। तीन लाइनें हैं। पढ़ूँ?"
"पढ़ो।"
"पहली — 'उसने तुम्हें बचा लिया।' दूसरी — 'पर सच तो अभी भी उसके पास है।' और तीसरी — 'उसका नाम जानने के लिए तैयार रहो, बेटा।'"
मैं कुछ पल चुप रहा। मेरे हाथ में टोकन था और उस पर नई लकीरें बन रही थीं।
"सुमन," मैंने कहा, "पर्ची मत फाड़ना। और अमर से पूछो — उसने मुझे जो टोकन दिया था, वो किसने दिया था? क्या उसने ख़ुद वो टोकन किसी से लिया था?"
फ़ोन पर सन्नाटा रहा। फिर सुमन ने धीरे से कहा — "मन्नू, अमर कह रहा है कि उसने वो टोकन उस आदमी से लिया था जो उसके पापा के पास से आया था — और उस आदमी का नाम उसने कभी नहीं बताया, बस इतना कहा था — 'जब हिसाब खुलेगा, तब नाम भी खुलेगा।'"
मैंने फ़ोन रखा और टोकन को फिर से देखा। नीचे की लकीरें अब साफ़ हो रही थीं। चार अक्षर का एक शब्द बन रहा था। पहला अक्षर — "रा…"
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी ने गहरी साँस ली।
"वो नाम अब पूरा होने वाला है," बंसी ने कहा। "और जिस दिन ये पूरा होगा, उस दिन पता चलेगा कि तेरे पीछे कौन है।"
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