The Token System912 / 1154

The Token System – Chapter 912

6 min read November 6, 2026

और फिर एक ज़ोरदार धक्का। बंसी ने पूरे ज़ोर से उस आदमी की पीठ पर अपना कंधा मारा। आदमी लड़खड़ाकर सीढ़ी की रेलिंग से टकराया। उसके हाथ से सफ़ेद कपड़े वाली चीज़ छूटकर नीचे गिरी — एक छोटा लोहे का डंडा था, सफ़ेद पट्टी में लिपटा।

मैंने तुरंत मौक़ा देखा और ज़ोर से चिल्लाया — "चोर! चोर! रिकॉर्ड कमरे में चोर!"

नीचे गलियारे से तुरंत पैरों की आवाज़ें आईं। अस्पताल का गार्ड, हाथ में लाठी लिए, सीढ़ियों की तरफ़ भागा। पीछे-पीछे वार्ड की तरफ़ से दो लोग — एक मरीज़ का परिवार वाला और एक सफ़ाई कर्मचारी, जिसके हाथ में अभी भी झाड़ू थी।

सफ़ेद कुर्ते वाले दोनों आदमियों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा, और फिर भागने लगे। छड़ी वाला तो सीढ़ियों से कूदकर बगल के बरामदे में उतर गया और अंधेरे में ग़ायब हो गया। पर दूसरा — जिसे बंसी ने धक्का दिया था — वो रेलिंग में फँसा रह गया। गार्ड ने उसकी कमीज़ का कॉलर पकड़ लिया और घसीटकर नीचे लाया।

"पकड़ा गया!" गार्ड ने कहा। "अब बता, कौन है तू और यहाँ क्यों घुसा?"

आदमी मुँह फेरकर खड़ा रहा। उसका सफ़ेद कुर्ता अब धूल में सना था और माथे पर चोट का निशान उभर आया था।

तभी सुमन सीढ़ियों पर आई। उसके हाथ में स्टेथोस्कोप था और आँखों में वो ठंडक थी जो वो ख़ुद को संभालते वक़्त लाती है। "क्या हुआ मन्नू? मुझे वार्ड से शोर सुनाई दिया।"

"ये दो आदमी रिकॉर्ड कमरे की बत्ती बुझाकर मेरा काग़ज़ छीनने आए थे," मैंने कहा। "एक भाग गया, ये पकड़ा गया।"

सुमन ने उस आदमी की तरफ़ देखा। "तू किसका आदमी है? सच बोल, वरना पुलिस बुलाकर रिपोर्ट लिखवाऊँगी।"

आदमी ने सुमन की तरफ़ देखा, फिर गार्ड की तरफ़, फिर मेरी तरफ़। उसका गला सूख रहा था। "मैं… मैं तो बस काग़ज़ लेने आया था। मुझे फ़ोन आया था।"

"किसका फ़ोन?" बंसी ने पूछा।

"श्यामलाल सर का। जेल से। उन्होंने कहा — भवानी साहब का एक काग़ज़ उस कमरे में है, जो शेखर बाबू ने मनोहर को दिया है। वो उठा लाओ। बदले में इतने पैसे मिलेंगे कि साल भर काम न करना पड़े।"

"और साथ में क्या बताया?" सुमन ने आगे बढ़कर पूछा। "तू अकेला तो नहीं आया था। जो भागा, वो कौन है?"

आदमी ने होंठ सिल लिए।

बंसी ने उसकी कमीज़ का कॉलर थोड़ा और कस दिया। "बोल, वरना अभी चौकी तक घसीटकर ले जाऊँगा और वहाँ जो रात में चाय नहीं मिलती, वो चाय पिलवाऊँगा।"

आदमी ने साँस ली। "वो… वो भवानी साहब का ख़ास आदमी है। नाम मुझे नहीं पता। बस इतना पता है कि वो भेस बदलकर रहता है। कभी चपरासी, कभी मरीज़ का रिश्तेदार, कभी सफ़ाई वाला। आज वो डॉक्टर का कोट पहनकर आया था। उसने ही बत्ती बुझाई थी।"

"और तू?" मैंने पूछा। "तू क्या है?"

"मैं तो बस मज़दूरी करता हूँ। चार रोज़ पहले ही श्यामलाल सर ने काम पर रखा था। कहा था, कुछ काग़ज़ उठाने हैं। बस इतना जानता हूँ।"

गार्ड ने उसकी सफ़ेद पोशाक में हाथ डाला और दो चीज़ें निकालीं — एक मोबाइल और एक पीला लिफ़ाफ़ा। लिफ़ाफ़े पर कोई नाम नहीं था, बस एक कोना स्याही से कटा हुआ था।

सुमन ने लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ाया। "मन्नू, खोल।"

मैंने लिफ़ाफ़ा फाड़ा। अंदर एक ही काग़ज़ था — छोटा, मुड़ा हुआ, जिस पर सिर्फ़ तीन लाइनें लिखी थीं: "काग़ज़ तक मत पहुँचने देना। तेरे पीछे वाला चुप नहीं बैठेगा। काम हो जाने पर अस्पताल के पिछले फाटक पर आ जाना।"

तीसरी लाइन के नीचे हस्ताक्षर की जगह वही उलटा लंबा ज़ख़्म जैसा निशान खींचा था। मैंने उसे सुमन को दिखाया। सुमन का चेहरा कठोर हो गया।

"यही ज़ख़्म माँ ने जज साहब के साथ आए आदमी की कलाई पर देखा था," मैंने धीरे से कहा।

सुमन ने काग़ज़ अपने हाथ में लिया और उसी लम्हे उसकी आँखें तंग हो गईं। "तो इसका मतलब… जो बाहर घूम रहा है, वो श्यामलाल का आदमी नहीं है। वो किसी और का है। और वो चाहता है कि ये काग़ज़ किसी भी हालत में अदालत तक न पहुँचे।"

"पर बाहर जो काली छाया दिखी थी," बंसी ने कहा, "वो लंबी थी और उसके हाथ में लाठी थी, जैसे पहरे वाले की होती है।"

"पता नहीं," सुमन ने कहा। "पर अब इस काग़ज़ को कहीं सुरक्षित रखना होगा। और तुम, मन्नू, अभी अस्पताल से निकलो, और सीधे थाने जाओ। राजेंद्र को सब बताओ।"

मैंने सिर हिलाया। बंसी ने पकड़े हुए आदमी को गार्ड के हवाले किया और हम दोनों पीछे के दरवाज़े से बाहर निकले। रात की हवा ठंडी थी, और अस्पताल के पिछले फाटक की तरफ़ जाते वक़्त मुझे लगा कि कोई मेरी तरफ़ देख रहा है। मैंने मुड़कर देखा, पर वहाँ सिर्फ़ अंधेरा था और दूर स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी।

सुबह नौ बजे हम थाने पहुँचे। राजेंद्र ने पूरी बात सुनी, लिफ़ाफ़ा देखा और उस सफ़ेद कुर्ते वाले आदमी का बयान दर्ज किया। फिर वो मेरी तरफ़ मुड़ा।

"मन्नू, यह बात समझ ले। अगर जज साहब के साथ आने वाला आदमी यही है, तो ये सीधा जज तक जाता है। ये मामला अब तेरे और भवानी के बीच का नहीं रहा।"

"मुझे पता है," मैंने कहा। "इसीलिए ये काग़ज़ आज अदालत में पेश करना ज़रूरी है। अगर मैंने इसे छिपाया और कोई और बात निकली, तो सारा सच झूठ बन जाएगा।"

राजेंद्र ने एक लंबी साँस ली। "अदालत दस बजे है। तू जा। मैं पीछे-पीछे आता हूँ।"

अदालत पहुँचते वक़्त आँगन में भीड़ थी। बंसी ने मेरा हाथ पकड़कर रोका और धीरे से कहा — "काग़ज़ को सीने पर मत रख, जेब में रख। और जब जज पूछें तभी निकालना।"

मैंने सिर हिलाया। जज साहब की कुर्सी के सामने हम सब खड़े हुए। इधर माँ, रीना, बंसी, सुमन, शेखर बाबू। उधर भवानी की कुर्सी, उसका वकील, और भवानी का चेहरा पत्थर जैसा।

जज ने काग़ज़ात मँगवाए। अभी सिर्फ़ औपचारिकता चल रही थी — तारीख़ की पुष्टि, गवाहों के नाम, अगली सुनवाई की तैयारी। तभी मैंने हाथ उठाया।

"हुज़ूर, मेरे पास एक काग़ज़ है जो आज सुबह ही मुझे मिला है। ये उस साज़िश का सबूत है जो मेरे ख़िलाफ़ रची गई थी।"

जज ने चश्मे के ऊपर से मेरी तरफ़ देखा। "क्या काग़ज़ है ये?"

"ये वो काग़ज़ है जो अभी रात को मुझसे छीनने की कोशिश हुई। और जिसे छीनने वाला पकड़ा गया है। उसने कबूला है कि उसे श्यामलाल ने जेल से फ़ोन करके भेजा था।"

अदालत में एक हलचल दौड़ी। भवानी के वकील खड़े हुए — "आपत्ति, हुज़ूर! यह कोई सबूत नहीं है। ये सिर्फ़ रात की कोई घटना है जिसे साबित करने का कोई ज़रिया नहीं।"

"आपत्ति दर्ज की जाती है," जज ने कहा। "लेकिन मैं काग़ज़ देखना चाहूँगा।"

मैंने लिफ़ाफ़ा आगे बढ़ाया। कोर्ट मुंशी ने उसे जज तक पहुँचाया। जज ने काग़ज़ खोला और पढ़ा। फिर उन्होंने उसे नीचे मेज़ पर रख दिया और ऊपर देखा।

"ये तीन लाइनें हैं। और नीचे यह निशान — यह किसका है?"

"हुज़ूर, मेरी माँ ने गवाही में बताया था कि जज साहब के साथ आए आदमी की कलाई पर ऐसा ही निशान था। और रात को इस काग़ज़ पर यही निशान खींचकर भेजा गया था। यानी वो आदमी न सिर्फ़ आपके साथ आता है, बल्कि मेरे काग़ज़ों के पीछे भी पड़ा है।"

अदालत में सन्नाटा छा गया। भवानी मुस्कुराया — वो मुस्कान जो उसे हर मुश्किल में बचा लेती थी। और फिर उसका वकील उठा।

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