The Token System – Chapter 914
मैंने टोकन जेब में रखा और सड़क की तरफ़ देखा। अदालत के बाहर तेज़ धूप थी, और उस धूप में एक सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी दूर खड़ा था, अपनी कलाई पर बंधी पट्टी को ठीक कर रहा था। जब उसने मेरी तरफ़ देखा, तो वो मुस्कुराया और गली में मुड़कर ग़ायब हो गया।
"बंसी," मैंने कहा। "अब हमें उससे पहले पता लगाना होगा कि वो कौन है। क्योंकि अगर वो हमसे हमेशा एक क़दम आगे रहा, तो हिसाब कभी बराबर नहीं होगा।"
बंसी ने अपनी जेब से एक चाय की पत्ती निकाली और मुँह में रखी। "तो चल, आज उस आदमी की चाय पीते हैं जिसने तुझे जन्म दिया — किशन चाचा के साथ। और कल से उस आदमी की चाय पिएँगे जिसका नाम तेरे टोकन पर बन रहा है।"
हम दोनों चले। पीछे अदालत की सीढ़ियाँ ख़ाली हो रही थीं, और मेरे टोकन पर नया शब्द अब भी पूरा नहीं हुआ था — पर उतना साफ़ हो गया था कि मैं उसे अपनी उँगली से महसूस कर सकता था।
॥
जज साहब ने चश्मा उतारा और मेज़ पर रख दिया। अदालत में उस वक़्त एक पंखे की भी आवाज़ सुनाई दे रही थी।
"किशनचंद," जज साहब ने कहा, "तुम्हें सिर्फ़ काग़ज़ पर हस्ताक्षर करने के लिए नहीं बुलाया है। तुम्हारा बयान दर्ज होगा। तुम बीस साल से ग़ायब थे। आज तुम्हारे बेटे की गवाही से ये सारा मामला खुल रहा है। तुम अब बताओ — उस रात क्या हुआ था?"
पापा व्हीलचेयर पर बैठे थे, पर जैसे ही उन्होंने मुँह खोला, उनकी आवाज़ में वो कंप नहीं थी जो व्हीलचेयर वाले आदमी में होती है।
"जज साहब," पापा ने कहा, "उस रात मैं हवेली में था। मेरे पापा वहाँ डेढ़ बजे रोज़ जाते थे — दीवार के पास बैठकर कुछ लिखा करते थे। मैंने कभी पूछा नहीं कि क्या लिखते हैं। पर उस रात मैंने पूछ लिया।"
जज साहब झुके। "क्यों?"
"क्योंकि उस रात मैंने उनके हाथ में वो पीतल जैसी चीज़ देखी थी जो आज काग़ज़ों में है। मेरे पापा ने मुझे दीवार के पास खड़ा देखा, तो उनका चेहरा ऐसा हो गया जैसे किसी ने उन्हें चोरी में पकड़ लिया हो।" पापा ने रुककर साँस ली। "उसके बाद मैंने वो सब देखा जो आज इस अदालत में पड़ा है — पर मैं कुछ बोल नहीं पाया। सुबह तक मुझे भवानी के आदमी उठा ले गए।"
अदालत में खुसफुसाहट फैल गई। भवानी का वकील, वो सफ़ेद कुर्ते वाला लंबा आदमी जो कुर्सी से चिपका बैठा था, उठ खड़ा हुआ।
"आपत्ति, जज साहब।" उसने अपनी पेंसिल हवा में दिखाई। "सवाल ये है — अगर ये बीस साल से ज़िंदा हैं और उन्हें पूरा सच पता है, तो इतने साल चुप क्यों बैठे रहे? कोई नौजवान काग़ज़ दिखाकर आता तो ये उसी रात बोल देते।" उसने मेरी तरफ़ उँगली घुमाई। "या फिर ये कहानी बाद में बनाई गई है?"
सबकी नज़रें पापा पर आ गईं। मैंने देखा, माँ के हाथ उनकी व्हीलचेयर के पीछे जम गए।
पापा ने जवाब दिया — "क्योंकि मेरे पापा ने मरे से पहले मेरी पीठ पर हाथ रखकर कहा था — बेटा, जब तक दोनों तरफ़ का हिसाब बराबर न हो जाए, कुछ मत बोलना। ठाकुर की धमकी कोई सुनी हुई बात नहीं थी, सेठ की बही में लिखी हुई थी। और मैंने वो लिखा हुआ देखा था।"
जज साहब मेरी तरफ़ मुड़े। "तुम्हारे पापा किस बही की बात कर रहे हैं, मनोहर?"
मैंने अपनी पोटली खोली और वो मोटी डायरी मेज़ पर रख दी — दादा की लिखाई वाली, जिसमें टोकन छुपाने की वजह, धमकी और रामेश्वर ठाकुर का नाम था।
"ये जज साहब, दादा की अपनी डायरी है। इसमें तारीख़ों के हिसाब से सब लिखा है। जिस रात पापा ग़ायब हुए, उससे तीन रात पहले दादा ने लिखा था — 'रामेश्वर ठाकुर ने कहा, अगर टोकन हवेली में नहीं छिपाया गया और मेरे हवाले नहीं किया, तो तेरे बेटे का मुँह आख़िरी बार देख लेना।'"
जिस वक़्त मैंने 'बेटे का मुँह' पढ़ा, भवानी की कुर्सी की चूड़ियाँ चरमराईं। वो पहली बार सीधा नहीं बैठा था। उसने कुर्सी के हत्थे पर अपनी उँगलियाँ ऐसे फँसाई थीं जैसे किसी चीज़ को पकड़कर रोक रहा हो।
जज साहब ने डायरी अपने सामने मँगवाई। पढ़ते हुए उनका चेहरा गंभीर होता गया। एक पन्ने पर उन्होंने उँगली रोकी और फिर धीरे से पढ़ा —
"उस रात रामेश्वर का आदमी कुएँ के पास खड़ा था। मैंने टोकन को दीवार में छिपाया और मैंने अपने बेटे को छिपाया — क्योंकि ठाकुर को टोकन चाहिए था, बेटा नहीं। अगर मैं उस रात बोलता, तो हवेली में एक भी आदमी ज़िंदा नहीं बचता।"
जज साहब ने डायरी बंद की। पूरे अदालत में कोई नहीं बोला। तभी भवानी के वकील ने फिर अपनी पेंसिल उठाई, पर जज ने उसे रोक दिया।
"बैठो। अब मैं सुनूँगा।" जज साहब ने भवानी की तरफ़ देखा। "ठाकुर भवानी सिंह, तुम्हारे दादा ने ये किया — तुम्हें मालूम था?"
भवानी खड़ा हुआ। मैंने उसकी आवाज़ में पहली बार एक अलग तरह का धीमापन सुना।
"जज साहब," उसने कहा, "मेरे दादा ने जो किया, वो उनका हिसाब था। मेरे पास अपना हिसाब है। और मेरा हिसाब मैं चुका रहा हूँ — काग़ज़ जो चाहिए, अदालत माँगे।"
"काग़ज़ अदालत माँग रही है," जज ने कहा, "और तुम्हारे वकील उसे नक़ली बता रहे हैं।" उन्होंने मुंशी की तरफ़ देखा। "जगन्नाथ चाचा को कल सुबह दस बजे तलब किया जाए। और उस संदूक की जाँच हो — जो आज मनोहर ने अदालत के हवाले किया है। उसका छिपा खाना, उसकी तह, हर काग़ज़ — सब रजिस्टर में दर्ज होगा।"
मुंशी ने लिखना शुरू किया। भवानी की नज़रें मुझ पर टिकी थीं — पर वो ग़ुस्सा नहीं था। मैंने उनमें कुछ और देखा। थकान। जैसे बीस साल का एक पहाड़ उसके कंधों से उतर रहा हो और वो जानता हो कि अब कोई दूसरा पहाड़ आने वाला है।
अदालत की कार्रवाई खत्म हुई। बाहर निकलते वक़्त रघुवीर मेरे सामने आया। मैंने सोचा वो कुछ कहेगा। पर उसने कुछ नहीं कहा — बस मेरे गले लग गया। उसकी पीठ काँप रही थी। मेरी शर्ट उसके आँसुओं से गीली हुई, पर मैंने उसे हटाया नहीं।
"रघुवीर," मैंने कहा, "तेरे बाप का हिसाब अभी पूरा नहीं हुआ।"
"पता है," उसने कहा और अपना चेहरा पोंछा। "पर मेरे पापा के नाम से जो ज़मीन वापस आई है, वो मेरे लिए बहुत है। अब चाहे कुछ भी हो, मेरे बेटे को उस ज़मीन पर सिर उठाकर चलने का हक़ मिल गया।"
तभी सुमन दौड़ती हुई आई। उसका सफ़ेद कोट पीछे उड़ रहा था और हाथ में स्टेथोस्कोप इस तरह लटक रहा था जैसे भागते हुए भूल गई हो।
"मन्नू," उसने कहा। वो इतनी ख़ुश थी कि उसकी आवाज़ फट रही थी। "अमर की आँखें खुल गईं। और उसने पहली बात जो कही — वो ये कि उसे पानी चाहिए।"
अदालत के बाहर की धूप एकदम बदल गई। माँ ने कहा, "भगवान का शुक्र है।" और उसने अपना आँचल ऊपर करके आँखों पर रख लिया।
हम सब अस्पताल की तरफ़ चले। रास्ते में बंसी ने रघुवीर को गाड़ी में बैठाया। मैं पीछे बैठा था, और भवानी की गाड़ी हमारे पीछे-पीछे आ रही थी — पुलिस की गाड़ी के साथ। मैंने सोचा, भवानी भी अमर को देखने आ रहा है।
अस्पताल पहुँचे। वार्ड दो का दरवाज़ा खुला था। अमर चारपाई पर बैठा था, हाथ में पानी का गिलास। उसका चेहरा पीला था, होंठ सूखे थे, पर आँखों में वो चीज़ लौट आई थी जो पिछले हफ़्ते खो गई थी।
भवानी दरवाज़े पर रुक गया। पुलिस वाला उसके पीछे खड़ा था।
अमर ने उसे देखा। दोनों में कोई शब्द नहीं हुआ। बस भवानी ने अपना हाथ आगे बढ़ाया, और अमर ने उसे पकड़ लिया। मैंने वहाँ से नज़र हटा ली — ये मेरा देखने का पल नहीं था।
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