The Token System905 / 1154

The Token System – Chapter 905

7 min read November 6, 2026

उसकी आँखें ऊपर की तरफ़ घूम गईं। मॉनिटर की बीप एक लंबी, सीधी आवाज़ में बदल गई। सुमन ने एक पल देखा और फिर चिल्लाई — "कोड ब्लू! इसका दिल रुक गया है! कार्ट लाओ, जल्दी!"

वार्ड में भागदौड़ मच गई। दो नर्सें दौड़कर आईं, ट्रॉली खड़खड़ाई, सुमन ने अमर की छाती पर हाथ रखकर दबाना शुरू किया।

बंसी ने मेरा कंधा पकड़कर मुझे पीछे खींचा। मैं दरवाज़े के पास खड़ा था, और मेरी जेब में दो टोकन थे — एक गरम, एक ठंडा। और मेरी हथेली पर अमर की ठंडी उँगलियों का निशान अभी भी था।

सुमन ने दो बार अमर की छाती दबाई, फिर रुककर पीछे देखा।

"मन्नू, बाहर जा।"

"मैं —"

"बाहर जा!" उसकी आवाज़ में वो कड़क थी जो डॉक्टर सिर्फ़ उस वक़्त निकालती है जब अंदर मरीज़ की जान और उसके हाथ के बीच सिर्फ़ सेकंड बचे हों।

बंसी मुझे खींचकर बाहर ले आया। दरवाज़ा बंद हुआ। अंदर से मशीन की आवाज़ें, सुमन के हुक्म, नर्सों की भागदौड़।

मैं दीवार से टिक गया। मेरे हाथ काँप रहे थे।

बंसी ने मेरे सामने खड़े होकर कहा, "मन्नू, सुन। अमर ने जो कहा — 'रा…' — वो पूरा नहीं हुआ।"

"मैंने सुना।"

"और उसने कहा — वो तेरे घर आता है, तेरे पापा के कमरे में बैठता है, ख़ुद को दादा का दोस्त बताता है।" बंसी की आवाज़ धीमी हो गई। "मन्नू, तेरे घर पापा के कमरे में कौन बैठता है?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"मैं नहीं जानता," मैंने कहा। "पर माँ जानती है। और अब वो अदालत में नाम लिख रही हैं।"

बंसी ने मेरी जेब की तरफ़ देखा। "और ये दो टोकन?"

मैंने दोनों निकाले। गरम टोकन पर एक हल्की लकीर उभर रही थी — धीरे-धीरे, जैसे कोई अंदर से लिख रहा हो।

शब्द आया — "दो।"

"दो क्या?" मैंने पूछा।

लकीर मिट गई। फिर नई लकीर आई — "एक।"

"मन्नू," बंसी ने कहा, "ये तो घट रहा है। दो से एक।"

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। "मतलब —"

अंदर से सुमन की आवाज़ आई — "एक और बार! चार्ज दो!"

बंसी ने मेरी कलाई पकड़ी। "मन्नू, अगर ये टोकन वक़्त गिन रहा है —"

मैंने ठंडा टोकन जेब से निकाला। वो अब भी ठंडा था। पर उस पर कोई शब्द नहीं।

मैंने दोनों टोकन अपनी हथेली पर एक साथ रखे। बीच के फ़ासले को मिटाया।

दोनों टोकन के बीच में, हवा में, एक पतली सी लकीर बनी — और फिर दोनों एक दूसरे की तरफ़ खिंचने लगे, जैसे चुंबक।

मैंने उन्हें जल्दी से अलग किया।

बंसी ने देखा। "ये तो जुड़ना चाहते हैं।"

"पर अभी नहीं," मैंने कहा। कहाँ से आया ये यक़ीन, मुझे ख़ुद नहीं पता — पर मैंने कहा। "अभी नहीं। अभी वक़्त नहीं है।"

अंदर से आवाज़ आई — मॉनिटर की बीप फिर शुरू हुई। लंबी, सीधी नहीं। रुक-रुककर, जैसे कोई दौड़ता हुआ आदमी साँस ले रहा हो।

सुमन ने दरवाज़ा खोला। उसका माथा पसीने से भीगा था।

"दिल की धड़कन लौट आई," उसने कहा, और फिर दीवार से टिक गई। "पर अगले चौबीस घंटे —"

"क्या?"

"मैं ईमानदारी से कहूँ, तो उसकी हालत जिस हाथ में है, वो हाथ मेरा है — और मेरे हाथ में अब सिर्फ़ इतना है कि मैं उसे आराम दूँ। दवा उसके जिस्म में काम नहीं कर रही। छह महीने का ज़हर एक झटके में नहीं निकलता।"

मैंने उसकी आँखों में देखा। "तू जो कर सकती है, कर।"

"मैं करूँगी।" सुमन ने मेरी जेब की तरफ़ देखा। "और तू — मुझे लगता है तेरे पास आज रात कोई बड़ा काम है।"

मैंने सिर हिलाया।

"तो जा।" उसने कोट ठीक किया। "पर एक बात — अमर के बाप ने जो किया, वो अमर पर मत उतरने दे। वो बच्चा नहीं है, पर अभी उसकी जान उसके बस में भी नहीं।"

बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया।

अस्पताल के बाहर आकर मैंने वो ठंडा टोकन दोबारा निकाला। अब वो बिल्कुल ठंडा नहीं था। हल्का गरम था। और उस पर धीरे-धीरे एक शब्द उभर रहा था, जो मैंने पहले कभी किसी टोकन पर नहीं देखा।

"साफ़।"

मैंने गरम टोकन देखा। उस पर भी एक शब्द था — "अब।"

मैंने बंसी की तरफ़ देखा।

"क्या हुआ?" उसने पूछा।

"टोकन कह रहा है — साफ़। और — अब।"

बंसी ने टोकन पढ़े। फिर उसने आसमान की तरफ़ देखा। "मन्नू, कल सुबह तीन — याद है?"

"हाँ।"

"और अब दो से एक, और फिर साफ़।" बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "तेरे दादा की डायरी में एक लाइन थी — टोकन किसी को मार नहीं सकता, पर वो वक़्त गिनता है। और जब वो वक़्त गिने, तो इंसान को तेज़ चलना होता है।"

मैंने दोनों टोकन जेबों में अलग-अलग रखे। फिर मैंने साइकिल की तरफ़ बढ़ते हुए कहा, "तेरे घर चल। माँ का लिखा हुआ काग़ज़ पढ़ना है। और फिर —"

"फिर?"

"फिर उस आदमी को ढूँढना है जो मेरे पापा के कमरे में बैठता है।"

बंसी साइकिल पर बैठा और पैडल मारते हुए बोला, "मन्नू, एक बात कहूँ?"

"कह।"

"अगर वो आदमी तेरे घर आता है, और तेरे पापा के कमरे में बैठता है — तो मतलब वो तेरे घर का ही कोई है। और अगर वो तेरे घर का है — तो आज रात तेरे घर में जो भी सो रहा है, वो सब शक के घेरे में है।"

मैंने साइकिल रोक दी।

"माँ को छोड़कर," मैंने कहा।

"माँ को छोड़कर," बंसी ने दोहराया। "पर तेरे घर में और कौन है, मन्नू? रीना है। माँ है। तू है। औ—"

वो रुक गया।

"और?"

"और कल रात से वही बूढ़ा भी है — जिसे तू 'पहरा' कहता है।"

मेरे हाथ साइकिल के हैंडल पर कस गए। पहरा — वो आदमी जो ख़ुद को हिसाब का पहरा बताता है, जो कल रात से मेरे घर के बाहर डटा है, जो अमर को भी जानता है।

"बंसी," मैंने कहा, "वो बूढ़ा — जब वो पहली बार मिला था, तब उसने क्या कहा था?"

"कहा था — मैं भी हिसाब में फँसा हूँ, मेरी मदद कर।"

"और उसके बाद वो हर वक़्त वहीं मिला जहाँ मुझे मिलना था।"

बंसी ने धीरे से कहा, "मन्नू, अगर वो आदमी हमें ढूँढ रहा हो — तो हमें उसका इंतज़ार नहीं करना चाहिए।"

मैंने साइकिल घुमाई।

"कहाँ जा रहे हो?" बंसी ने पूछा।

"अदालत। अभी रात है — पर अदालत का चौकीदार रात भर जागता है। मुझे दादा की डायरी जमा करनी है। अगर अमर की हालत खराब है, तो सबूत सुरक्षित रहने चाहिए।"

बंसी कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, "ये तेरे दादा की लाइन है — 'सबूत जिसके पास, हिसाब उसके पास।'"

"नहीं," मैंने कहा। "ये मेरी लाइन है। चल।"

साइकिल अंधेरे में दौड़ पड़ी। पीछे अस्पताल की इमारत रह गई — और उसकी दूसरी मंज़िल की एक खिड़की में पीली रोशनी जल रही थी, जो अभी-अभी जली थी। मैंने देखा। बंसी ने भी देखा।

पर हम रुके नहीं।

अदालत का चौकीदार एक टूटी खाट पर बैठा हुक्का पी रहा था। हमें देखकर उसने हुक्का नीचे रखा, फिर लालटेन उठाई।

“इस वक़्त?” उसने कहा। “अदालत सुबह दस बजे खुलती है।”

“जज साहब से नहीं मिलना,” मैंने कहा। “तुमसे मिलना है।”

“मुझसे?”

“कल कोई आया था — सुबह के वक़्त। पीतल का टोकन दिखाकर पूछ रहा था जमा की गई पुरानी डायरियों के बारे में?”

चौकीदार की आँखें संकरी हुईं। “तू कौन है?”

“मन्नू। शंकर की डायरी मेरे पास है। वो शंकर जिसका नाम तुमने यहाँ तीस साल सुना है।”

उसने लालटेन मेरे चेहरे के सामने की। कुछ देर देखा, फिर हुक्का उठाया और एक लंबा कश लिया।

“हाँ, आया था। काला कोट, गोल चश्मा। कह रहा था — मैं उस डायरी का वारिस हूँ।” चौकीदार हँसा। “वारिस! तेरे दादा तो ख़ुद को किसी का वारिस नहीं कहते थे। वो कहते थे — मैं सिर्फ़ हिसाब रखने वाला मुंशी हूँ।”

मेरे हाथ ठंडे हो गए। “तुमने उसे डायरी दी?”

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