The Token System – Chapter 904
मैंने टोकन जेब में रखा और आसमान की तरफ़ देखा। सुबह होने में कुछ घंटे बाकी थे। और उन घंटों में — शायद — मेरे दादा का सबसे बड़ा राज़ खुलने वाला था।
सुबह पाँच बजे रीना ने चाय दी। माँ चूल्हे के पास बैठी थीं, हाथ में माचिस की वही डिब्बी घुमा रही थीं। मैंने डायरी और अमर वाला जला काग़ज़ सामने रखा।
“माँ,” मैंने कहा। “ये देखो। दादा ने लिखा है कि तीसरा टुकड़ा उसी के पास रह गया जिसे सबसे भरोसेमंद माना गया था।”
माँ ने काग़ज़ नहीं देखा। उन्होंने सीधे मेरी आँखों में देखा।
“मैं जानती हूँ,” उन्होंने कहा।
कमरा एक पल के लिए रुक गया।
“क्या?”
“मैं जानती हूँ कि उस रात कौन था।” माँ ने माचिस की डिब्बी मेज़ पर रखी। “तेरे दादा ने मुझे मरने से तीन दिन पहले बताया था। पर मुझे क़सम दिलाई थी कि जब तक टोकन पूरा न हो जाए, मैं किसी को नहीं बताऊँगी।”
“माँ —”
“अब टोकन पूरा हो गया,” उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ टूटी। “तीन टुकड़े जुड़ गए। चौथा चोरी हो गया। मैं अब और चुप नहीं रहूँगी।”
रीना ने माँ का हाथ पकड़ा। “माँ, कल अदालत में —”
“अदालत में मैं ख़ुद बोलूँगी,” माँ ने कहा। “उस आदमी का नाम।”
बंसी दरवाज़े पर खड़ा था। उसने मेरी तरफ़ देखा। मैंने उसकी तरफ़ देखा।
और उसी वक़्त मेरे मोबाइल पर संदेश आया — राजेंद्र का।
“अदालत का वक़्त सुबह दस से दोपहर बारह हो गया है। जज ने आदेश दिया — जो भी गवाही देगा, उसे अपने साथ काग़ज़ लाने होंगे। कोई मौखिक गवाही नहीं। लिखित में दो।”
मैंने ये सबको सुनाया।
माँ ने माचिस की डिब्बी खोली, उसमें से आधी जली तीली निकाली, फिर बंद कर दी।
“लिखित में देना है न,” उन्होंने कहा। “तो लिखो।”
बंसी ने जेब से कलम निकाली। रीना ने काग़ज़ लाया।
माँ ने कलम पकड़ी — उनके हाथ काँप रहे थे — और पहला शब्द लिखा।
“कमलेश को मारने वाला आदमी —”
कलम रुकी।
फिर उन्होंने आगे लिखा: “— मेरे ससुर के कमरे में उस रात मौजूद था, और वो आदमी आज भी मेरे घर आता है।”
॥
रात के दो बजकर चालीस मिनट पर मेरा मोबाइल बजा। स्क्रीन पर सुमन का नाम था। मैंने उठाते ही सुना — पीछे मॉनिटर की तेज़ बीप, और सुमन की आवाज़ में वो घबराहट जो वो कभी नहीं दिखाती।
"मन्नू, अमर की साँस रुक-रुक कर चल रही है। वो बार-बार तेरा नाम ले रहा है। जितना जल्दी हो सके आ जा।"
मैंने बंसी को जगाया। वो खटिये से उठकर सीधा जूते पहनने लगा। माँ दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं, हाथ में वही माचिस की डिब्बी।
"माँ, अमर —" मैंने कहना शुरू किया।
"जा," उन्होंने कहा। "मैं रीना के साथ हूँ। सुबह अदालत में मिलेंगे। मेरा काग़ज़ लिखा हुआ है।"
बंसी की पुरानी साइकिल पर हम दोनों अस्पताल तक पहुँचे। रास्ते में गली का एक भी दीया नहीं जल रहा था। सिर्फ़ स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी में साइकिल की छाया हमारे आगे-आगे दौड़ रही थी।
इमरजेंसी के बाहर सुमन खड़ी थी। उसने सफ़ेद कोट के ऊपर से हाथ रगड़ा, जैसे ठंड लग रही हो। मुझे देखते ही बोली — "अंदर। ज़्यादा देर मत कर।"
वार्ड के अंदर जाते वक़्त मेरे पैर रुक गए। अमर बिस्तर पर पीला पड़ा था। छह महीने की बंद कोठरी, बदली हुई दवा, और अब ये हाल। उसके होंठ सूखे थे, आँखें धँसी हुईं, और हाथ चादर के ऊपर रखे काँप रहे थे।
मैंने उसके पास कुर्सी खींची और हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ बर्फ़ जैसी ठंडी थीं।
"मन्नू," उसने धीरे से कहा, आवाज़ गले से निकलती हुई। "मेरे बाप ने जो किया, उसका हिसाब मुझ पर आया है।"
"तू बोल मत —"
"नहीं, सुन ले।" उसने मेरी कलाई दबाई। "मेरे हिस्से की हवेली — उन सबको मिले जिन्हें लूटा गया। जिनके काग़ज़ भवानी के दफ़्तार में सड़ रहे हैं। तेरे पास काग़ज़ हैं, तुझे पता है कौन-कौन है।"
सुमन ने पीछे से कहा, "अमर, तू बोलने की हालत में नहीं है।"
अमर ने उसकी तरफ़ देखा और मुस्कुराया — वैसी मुस्कान जो बीमार आदमी के चेहरे पर डर से ज़्यादा डरावनी लगती है।
"डॉक्टर साहब, मैं बीस साल से बोल नहीं पाया। अब बोलने दीजिए।"
फिर उसने अपना दूसरा हाथ चादर के नीचे ले जाकर कुछ निकाला। एक पीतल का टोकन — बिल्कुल मेरे टोकन जैसा, पर सपाट, बिना किसी लकीर का, और इतना ठंडा कि मेरी हथेली पर रखते ही मुझे लगा जैसे बर्फ़ का टुकड़ा रख दिया हो।
मेरी जेब में पड़ा मेरा टोकन, उसी पल, हल्का गरम हुआ। मैंने महसूस किया — जैसे दोनों में कोई बात चल रही हो जो मुझे समझ नहीं आ रही।
"ये मेरे बाप का है," अमर ने कहा। "अब तेरा। इसे लौटाने का रास्ता सिर्फ़ तू जानता है। मैं नहीं जानता। मैंने बीस साल इसी कमरे में सड़कर सिर्फ़ इतना सीखा — जो हिसाब तेरा नहीं, वो तेरे पास नहीं रहना चाहिए।"
"अमर —"
"और एक बात।" उसने मेरी हथेली को अपनी दोनों हथेलियों से ढक दिया। "मेरे बाप ने जो चौथा टुकड़ा तेरे आँगन से उठाया — वो उसने इसलिए उठाया था कि तू टोकन पूरा न कर पाए। पर वो ख़ुद भी उसे जोड़ नहीं पाया। क्योंकि जोड़ने के लिए हिसाब साफ़ चाहिए। और उसका हिसाब साफ़ नहीं है।"
मैंने दोनों टोकन अपनी हथेली पर रखे। एक गरम, एक ठंडा। बीच की हवा में कुछ था — शब्द नहीं, बस एक रुकावट, जैसे दो चीज़ें पास आकर भी नहीं मिल रहीं।
बंसी पीछे खड़ा था। उसने धीरे से कहा, "मन्नू, ये टोकन तेरे दादा वाला नहीं है। ये भवानी के दादा वाला है।"
अमर ने आँखें बंद कर लीं। "हाँ। ये हरि सिंह का है। मेरे बाप ने इसे दस साल जेब में रखा और एक बार भी गरम नहीं होने दिया। क्योंकि जो इसका सही मालिक नहीं, इसके लिए ये पत्थर है।"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो सवाल था जो वो ज़ोर से नहीं पूछ रही थी — क्या तू इसे संभाल पाएगा?
मैंने ठंडा टोकन अपनी जेब में रखा, गरम टोकन अलग जेब में। दोनों में फ़ासला रखा। पता नहीं क्यों — बस लगा कि इन्हें एक साथ नहीं रखना।
"अमर," मैंने कहा। "तेरे बाप का हिसाब — वो तेरे पर नहीं आएगा। मैं नहीं होने दूँगा।"
अमर हँसा। हँसी में खाँसी घुल गई। सुमन दौड़कर आई, उसे करवट दिलाई, ऑक्सीजन का पाइप ठीक किया।
"मन्नू," अमर ने खाँसी रुकने पर कहा, "तेरे दादा ने अपनी डायरी में जो आख़िरी लाइन लिखी — सबको ज़रूरत के हिसाब से बाँटना — वो इसलिए लिखी थी कि वो जानते थे, एक दिन कोई आएगा जो सब कुछ अपने नाम कर लेना चाहेगा। मैं वो नहीं हूँ। मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस — मेरे हिस्से का काग़ज़ उन लोगों के नाम कर दे जो बीस साल से रो रहे हैं।"
मैंने सिर हिलाया। उसकी हथेली पर अपना हाथ रखा।
"तू ठीक हो। बाकी सब मैं देखूँगा।"
अमर ने आँखें बंद कर लीं। उसके होंठ हिले — कुछ कह रहा था, पर आवाज़ नहीं आ रही थी।
मैं कान उसके मुँह के पास ले गया।
"माँ से कहना," उसने फुसफुसाया, "कि उसने जो काग़ज़ लिखा — उसमें जो नाम है, वो मेरे बाप का आदमी नहीं। वो मेरे बाप से भी बड़ा है।"
मैं पीछे हटा। "कौन?"
अमर की आँखें खुलीं। उनमें कुछ था जो मैंने पहले नहीं देखा था — सिर्फ़ डर नहीं, एक पहचान।
"वही जो तेरे घर आता है और तेरे पापा के कमरे में बैठता है।" उसने एक साँस ली। "जो ख़ुद को दादा का दोस्त बताता है।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"रा…" अमर ने कहना चाहा।
पर शब्द पूरा नहीं हुआ।
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