The Token System – Chapter 903
“मतलब?”
“मतलब ये कि तू जब कोई काम करता है, टोकन तय करता है कि कमाई का हिस्सा किसको मिलेगा। तेरे दादा ने पिछले बीस साल में जो कमाया, वो सब किसी के नाम गया। लेकिन आख़िरी बार, दीवार में लौटाने से पहले, उसने लिखा — जिसे सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, उसका नाम लिखना। यानी आख़िरी हिसाब किसी एक के नाम नहीं, ज़रूरतमंद के नाम।”
“तो दादा ने किसका नाम लिखा था?”
बंसी ने कंधे उठाए। “तेरे दादा ने टोकन लौटाया ही नहीं। उन्होंने छिपा दिया। इसीलिए अधूरा रह गया।”
मैं कुछ देर बैठा रहा। संदूक के ढक्कन पर हाथ रखा। ढक्कन ठंडा था।
“कुछ और भी है,” बंसी ने कहा। उसने डायरी के दो पन्ने पलटे। “ये देख — पन्ना सात। तेरे दादा ने लिखा है कि उस रात बंसी आया था, उसके पैर छुए थे। और यहाँ—” उसने उँगली रखी। “लिखा है — ‘इसके बाद मैंने उससे कुछ नहीं पूछा। क्योंकि मैंने उसकी आँखों में वो देखा जो मैंने कभी किसी में नहीं देखा था।’”
“क्या देखा था?”
बंसी ने डायरी बंद कर दी। “लालच।” उसने एक साँस ली। “तेरे दादा ने मान लिया था कि मैंने दुकान के काग़ज़ के लिए कुछ किया है। सच ये है — मैंने कुछ नहीं किया। पर उस दिन के बाद मैं उनसे मिला ही नहीं। मुझे लगा वो मुझे शक की नज़र से देखते हैं। और मैंने सोचा — बीस साल का साथ, और एक शक? तो जाने दो।” उसने आँखें मलीं। “मैं ग़लत था। और वो भी ग़लत थे। दोनों ने एक-दूसरे को बोलना बंद कर दिया, और बीच में एक हत्या हो गई।”
मैंने पूछा, “कमलेश की हत्या?”
“हाँ।” बंसी ने उठकर खिड़की की तरफ़ देखा। “कमलेश तेरे दादा का मुंशी था। जिस रात दादा बोलना बंद कर दिए, उस रात कमलेश भी मरा था। एक ही रात। दो आदमी। एक चुप हो गया, एक हमेशा के लिए।”
मेरा मोबाइल बजा। स्क्रीन पर नाम चमका — सुमन।
“हाँ?”
“मन्नू, तू सुन।” सुमन की आवाज़ में वो तेज़ी थी जो ड्यूटी में होती है, पर इस बार उसमें कुछ और भी था — घबराहट। “अमर सिंह की हालत बहुत ख़राब है। दवा बदलने से उसका पेट खराब हो गया है, साँस भी फूल रही है। वो तुझसे मिलना चाहता है।”
“अभी? रात में?”
“अभी। वो कह रहा है — जब तक देर न हो जाए।” सुमन एक पल रुकी। “और एक बात। वो अपने पास कुछ रखे हुए है। कह रहा है — ये तेरे दादा का नहीं, तेरे पापा का है।”
फ़ोन कट गया।
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। “अमर की हालत ख़राब है।”
बंसी उठ खड़ा हुआ। “चल।”
“तू रुक, माँ के साथ —”
“ना।” बंसी ने चाबी उठाई। “आज रात कोई अकेला नहीं रहेगा। भवानी ने संदूक छोड़ा है, ये उसकी आदत नहीं।”
अस्पताल के वार्ड दो में बत्ती मद्धम थी। अमर के बिस्तर के पास एक बोतल लगी थी और सुमन स्टैंड पर खड़ी काग़ज़ लिख रही थी।
“पंद्रह मिनट,” सुमन ने कहा। “इससे ज़्यादा नहीं।”
अमर मुश्किल से मुड़ा। उसका चेहरा पहले से पतला लग रहा था। उसने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया। मैंने उसका हाथ पकड़ा — हड्डी जैसा हल्का।
“मन्नू,” उसने कहा, आवाज़ फुसफुसी थी। “श्यामलाल के पास जो काग़ज़ हैं, उनमें से एक मेरे पास भी है। मैंने छिपाया था।”
“कौन सा?”
“वो जिस पर तेरे दादा ने अपने हाथ से लिखा है कि टोकन तीन टुकड़ों में क्यों बाँटा गया।” उसने तकिये के नीचे से मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला। “ले।”
काग़ज़ पीला था, किनारों से फटा। पढ़ते ही मेरी गर्दन के बाल खड़े हो गए।
दादा की लिखाई थी — “टोकन तीन इसलिए बाँटा गया कि कोई एक आदमी पूरा हिसाब अपने नाम न कर सके। पर एक ग़लती हुई — तीसरा टुकड़ा उसी के पास रह गया जिसे हमने अपना सबसे भरोसेमंद माना था। उसका नाम —”
आगे का हिस्सा जला हुआ था। सिर्फ़ दो अक्षर बचे थे — “रा…”
मैंने काग़ज़ अमर को दिखाया। “यहाँ नाम पूरा नहीं है।”
“इसीलिए मैंने छिपाया था,” अमर ने कहा। “डर था कि कहीं मेरे बाप को पता न चल जाए। ये काग़ज़ उसने मुझे दिया था, दस साल पहले, जब वो मुझे यहाँ —” उसने चारों तरफ़ देखा, “इसी कमरे में लाया था।”
“क्यों दिया था?”
“कहा था — ‘रख ले। जिस दिन मैं मर जाऊँ, इसका नाम पूरा होगा।’” अमर ने आँखें बंद कर लीं। “वो मरा नहीं। पर मैं मरने को हूँ।”
सुमन ने आगे आकर उसकी नाड़ी देखी। “बहुत बोल लिया।”
“एक आख़िरी बात।” अमर ने मेरी कलाई पकड़ी। आवाज़ इतनी धीमी कि सिर्फ़ मैं सुन सका। “श्यामलाल ने मुझे बताया था — बीस साल पहले जिस रात तेरे दादा बोलना बंद कर दिए, उस रात वो ख़ुद उनके कमरे में था। और वहाँ कोई तीसरा भी था। वो तीसरा —” उसकी साँस रुकी। “वो तीसरा तेरे घर का आदमी है।”
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी दरवाज़े पर खड़ा था, चेहरा पत्थर जैसा।
अमर ने आँखें बंद कर लीं। सुमन ने मुझे हाथ से इशारा किया — बाहर जाओ।
डरवाज़े के बाहर मैंने साँस ली। बंसी बाहर आया, पीछे से दरवाज़ा बंद किया।
“बंसी,” मैंने कहा। “अमर कह रहा है कि उस रात तीसरा आदमी था — घर का।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कोई हलचल नहीं थी — और यही सबसे डरावना था।
“कमलेश मर गया उस रात,” बंसी ने कहा। “और मैं पूछता हूँ — कमलेश के मरने से सबसे ज़्यादा फ़ायदा किसको हुआ?”
“तूने तो कहा था — तू उस रात वहाँ नहीं था।”
“मैंने कहा था कि मैं उस रात उस कमरे में नहीं गया।” बंसी ने मेरी आँखों में देखा। “पर मैं उस रात गली में था। और मैंने देखा — एक आदमी तेरे दादा के कमरे से निकला। उसके हाथ में कुछ चमक रहा था। पीतल जैसा।”
मेरे होंठ सूख गए। “तूने अब तक क्यों नहीं बताया?”
“क्योंकि मुझे अभी तक यक़ीन नहीं था कि वो मेरी आँखों का धोखा था या सच।” बंसी ने दीवार को घूरा। “बीस साल मैं ख़ुद को क़सम देता रहा कि मैंने कुछ नहीं देखा। कल अदालत में मुझे ये भी बताना पड़ेगा।”
“किसी ने मुझे बताया नहीं कि वो आदमी कौन था।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। “मैंने बीस साल में उस आदमी को रोज़ देखा है।”
वो रुका। पलक नहीं झपकी।
“तेरे दादा ने मुझे चोर समझा,” उसने कहा। “शायद इसीलिए कि उन्होंने भी वही देखा था जो मैंने देखा था — पर ग़लत आदमी पर शक किया।”
वार्ड से अंदर सुमन की आवाज़ आई। बंसी ने मेरी बांह पकड़ी।
“जो भी हो, कल सुबह जज के सामने सब कुछ साफ़ होगा। और मन्नू — मैं उस आदमी का नाम लूँगा। चाहे मेरी दुकान जाए, चाहे मेरी इज़्ज़त।”
मैंने छत पर आकर टोकन जेब से निकाला। रात की हवा में वो हल्का ठंडा था — और ठंडा होने के साथ उसकी सतह पर उभर रहा था एक ताज़ा शब्द।
“सुन।”
बंसी मेरे कंधे के ऊपर से झाँका।
“ये तो —”
“टोकन कह रहा है — सुन।”
हम दोनों चुप हो गए। नीचे से अमर के कमरे की मशीन की धीमी टिक-टिक आ रही थी। दूर कहीं गली में कोई गाड़ी शुरू हुई और बंद हो गई।
टोकन पर शब्द मिट गया, फिर नई लाइन उभरी — “कल। सुबह। तीन।”
“तीन क्या?” बंसी ने पूछा।
“तीन गवाह? तीन बजे? तीन जगह?” मैंने टोकन हिलाया, पर वो चुप था। “तू कभी जवाब नहीं देता, न?”
बंसी ने टोकन की तरफ़ देखा, फिर मेरे चेहरे की तरफ़। “तेरे दादा ने लिखा था — टोकन सिर्फ़ काम बताता है, सलाह नहीं देता।”
“तो कम से कम साफ़ बताए।”
“साफ़ बताने से सब आसान हो जाए, मन्नू।” बंसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। “हिसाब में आसान कुछ नहीं होता।”
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