The Token System – Chapter 902
मैंने लिफ़ाफ़ा फाड़ा। अंदर एक तस्वीर। पुरानी, धुँधली। उसमें चार आदमी खड़े थे। एक तरफ़ दादा, दूसरी तरफ़ भवानी के दादा। बीच में एक औरत, सिर पर घूँघट, हाथ में टोकन।
और चौथा आदमी — मैंने तस्वीर को आँखों के पास लाया।
वही चेहरा। वही नुकीली ठुड्डी। वही टेढ़ी नाक।
कमलेश।
“कमलेश?” मेरी आवाज़ फट गई। “कमलेश उस वक़्त ज़िंदा था?”
“कमलेश तेरे दादा का मुंशी था।” बंसी ने तस्वीर को उलटा किया। पीछे लिखा था: “जो चौथा टुकड़ा ले जाए, उसे कभी भरोसा मत करना। वो तेरे घर के अंदर बैठा है।”
“कमलेश मरा कैसे?”
“किसी ने नहीं बताया।” बंसी ने तस्वीर वापस लिफ़ाफ़े में डाली। “तेरे दादा ने कहा था — खुद मत ढूँढना।”
तभी बाहर गली में कोई भागा। तेज़ क़दम। मैं दौड़कर शटर के बाहर आया। एक साया मुड़ा और पीछे की गली में गया, हाथ में कुछ चमक रहा था — पीतल जैसा।
मैं दौड़ा। गली के मोड़ पर पहुँचा तो साया रुक गया। चाँदनी में उसका चेहरा साफ़ दिखा।
औरत। चालीस के आसपास। माथे पर चौड़ी बिंदी। और कान में वही बाली जो कमलेश की तस्वीर में थी।
“तू रुक,” मैंने कहा।
वो रुकी। मुड़ी। हँसी।
“तू तेज़ है,” उसने कहा। “तेरे दादा भी तेज़ थे। पर एक चीज़ में वो भी हारे।”
“कौन सी?”
“ये मानने में कि घर का आदमी ही दुश्मन हो सकता है।” उसने हाथ खोला। उसमें टूटा पीतल का कोना था। “ये तेरे दादा ने मेरे पिता से लिया था। मैं इसे लेने आई हूँ।”
“तेरा पिता कमलेश था?”
“कमलेश मेरा ताऊ था।” उसने कोना जेब में रखा। “और जिसने मेरे ताऊ को मारा, वो आज तक तेरे घर में खाना खाता है।”
मैं सुन्न। “कौन?”
“कल अदालत में।” वो पलटी। “भवानी को बता देना — डायरी में जो नाम मिटा है, वो मैंने मिटाया है। क्योंकि वो नाम अभी ज़िंदा है, और ज़िंदा आदमी से बदला नहीं लिया जाता, सज़ा दी जाती है।”
वो भागी। मैं उसके पीछे दौड़ा, पर मोड़ पर पहुँचते ही सिर्फ़ खाली गली मिली। दीवार पर एक ताज़ा निशान था — पीली चाक से बना कोना।
मैं लौटा। आँगन में भवानी खड़ा था, संदूक उठाए, मुँह पर कपड़ा बाँधे। मैंने देखा — डायरी उसके हाथ में थी।
“तूने डायरी ले ली?”
“तेरे पीछे-पीछे आया था,” भवानी ने कहा। “पीछे के कमरे में जो पर्ची मिली, वो मेरी थी। नहीं, मेरी नहीं — मैंने वो लिखी नहीं। पर मुझे पता है किसने लिखी।”
“किसने?”
भवानी ने संदूक ज़मीन पर रखा और डायरी मेरी तरफ़ की।
“पढ़। पन्ना पलट। तीसरा पन्ना।”
मैंने डायरी खोली। उस पन्ने पर दादा की लिखाई में एक तारीख़ थी और नीचे लिखा था: “आज बंसी ने मेरे पैर छुए। कहा — बाबू, दुकान मेरे नाम कर दो, कसम खाता हूँ कभी धोखा नहीं दूँगा। मैंने मना किया। उसने कहा — तो फिर काग़ज़ किसी और को मत देना।”
भवानी ने कहा, “तेरी माँ ने वही काग़ज़ आज मुझे दिखाया, जो उसने तुझे नहीं दिखाया। बंसी उस दिन से काग़ज़ माँग रहा है। पर तेरी माँ मना कर देती है। क्यों?”
“क्योंकि माँ को शक है।”
“शक नहीं, सच।” भवानी ने गला साफ़ किया। “तेरे दादा की मौत से पहले बंसी उनके पास आख़िरी बार मिलने गया था। उस रात के बाद दादा बोलना बंद कर दिए। सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी — ‘जिसे अपना कहा, उसी ने आख़िरी वार किया।’”
मैंने डायरी और पन्ने पलटे। पीछे की तरफ़, कवर के अंदर, एक छोटी जेब थी। जेब में एक पर्ची थी। पर्ची पर दादा की लिखाई: “मन्नू, अगर तू ये पढ़ रहा है, तो मैं हार गया। बंसी से हिसाब ले। पर उसे मार मत। वो भी मेरा बेटा था।”
भवानी ने संदूक उठाया। उसका चेहरा पत्थर सा था।
“अब सुन।” उसने गले से आवाज़ निकाली। “कल सुबह जज के सामने ये डायरी मैं पेश करूँगा, और तेरे दादा चोर साबित होंगे।”
“पर डायरी में तो साफ़ है —”
“डायरी में है कि उन्होंने टोकन चुराया नहीं, बल्कि मेरे दादा को बचाया।” भवानी हँसा। “पर मेरे पास चार गवाह हैं जो कहेंगे कि टोकन कभी मेरे दादा का था ही नहीं। और इसे साबित करने के लिए मैं वो टूटा कोना दिखाऊँगा जो तेरे दादा ने छिपा रखा था।”
मैंने संदूक के पीछे देखा। भवानी की जेब से वही टूटा पीतल का कोना झाँक रहा था — वही जो अभी-अभी औरत ले गई थी।
मेरे मुँह से शब्द नहीं फूटे।
भवानी मुड़ा। दरवाज़े से निकला। गली में उसकी परछाईं लंबी होकर हट गई।
और मैंने अपनी हथेली पर वो टोकन देखा — उस पर तीन शब्द अब भी जल रहे थे:
“वो तेरा है।”
॥
मैंने भवानी का हाथ पकड़ लिया। उसकी जेब से वो टूटा पीतल का कोना आधा बाहर झाँक रहा था — चमकीला, टेढ़ा, और मेरे टोकन के टूटे हुए कोने से बिल्कुल मिलता हुआ।
“ये देखो,” मैंने कहा। “बिल्कुल मेरे टोकन के कोने जैसा।”
भवानी ने हाथ छुड़ाया। चेहरा एक पल के लिए बदला — ऐसा डर जो आदमी के हाथ से पहले आँख में आता है।
“निशानी है,” उसने जल्दी से कहा। “भवानी के खानदान की पुरानी निशानी।”
“निशानी नहीं, हिसाब का हिस्सा है।” मैंने टोकन जेब से निकाला और उसके हाथ के पास किया। “दादा की डायरी में लिखा था — टोकन तीन टुकड़ों में बँटा था। तीन हिस्सेदार, तीन टुकड़े। ये चौथा कहाँ से आया?”
भवानी ने कोना जेब में ठूँसा। “मुझे नहीं पता इतना।”
“तुम्हारे दादा का टोकन था, तुम नहीं जानोगे?”
वो पलटा। मगर तभी माँ आँगन में आई। साड़ी का पल्लू सिर पर, हाथ में माचिस की डिब्बी। उसने भवानी की तरफ़ देखा, फिर मेरी।
“ठाकुर साहब,” माँ ने कहा, आवाज़ सपाट, “रात हो गई। कल अदालत में जो सच है, वह सामने आएगा। आज रात हमें सोने दीजिए।”
भवानी ने माँ को देखा। कुछ कहता, उससे पहले उसकी नज़र संदूक पर पड़ी — जो मैंने उठा रखा था, अपने पैरों के पास।
“संदूक मेरा है,” उसने कहा।
“ये संदूक मेरे दादा की डायरी का है,” मैंने कहा। “डायरी मेरे घर में मिली है। संदूक यहीं रहेगा।”
भवानी के जबड़े की हड्डी उभरी। एक कदम आगे आया, फिर रुक गया — माँ की आँखें उस पर टिकी थीं।
“अच्छा,” उसने धीरे कहा। “कल जज के सामने मिलेंगे।” वो मुड़ा और बिना आवाज़ किए गेट की तरफ़ चला गया। गेट पर हरिया खड़ा था। भवानी उसके सामने से ऐसे निकला कि हरिया एक कदम पीछे हट गया।
गली में उसकी परछाईं दीवार पर लंबी हुई और फिर खत्म हो गई।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। “संदूक खोलते हैं या बाहर छोड़ देते हैं?”
“अंदर।” मैंने संदूक उठाया। “और बंसी को बुलाना पड़ेगा।”
बंसी आधे घंटे में आया। आते ही चाय की केतली रखी, फिर बैठकर बोला, “क्या माजरा है? हरिया ने कहा भवानी तेरे घर से परछाईं की तरह निकला।”
“पहले ये पढ़।” मैंने डायरी उसकी तरफ़ सरकाई।
बंसी ने डायरी खोली। पन्ने पलटे। पहले पन्ने पर नज़र डाली, फिर तीसरे पर। उसका चेहरा नहीं बदला — बस उँगली धीरे-धीरे चलती रही। जब आख़िरी पन्ने पर पहुँचा, तो उँगली रुक गई। कुछ देर वो उसी लाइन पर रुकी रही।
“यहाँ कुछ लिखा है,” उसने कहा। आवाज़ भारी थी।
“कहाँ?” मैंने झुककर देखा।
“आख़िरी पंक्ति के नीचे। हल्की स्याही में।” उसने डायरी मेरी तरफ़ घुमाई।
नीचे किनारे पर, जैसे दादा ने बाद में जोड़ा हो, एक लाइन थी — “टोकन दीवार में लौटाने से पहले जिसे सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, उसका नाम दीवार पर लिखना।”
मैंने दो बार पढ़ा। “ये क्या मतलब?”
बंसी ने चाय का घूँट लिया। “मतलब — टोकन सिर्फ़ पैसा नहीं देता। वो चुनता भी है कि पैसा किसके नाम जाए।”
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