The Token System – Chapter 901
"नाम मिटा दिया गया है," मैंने कहा।
"नहीं," भवानी ने कहा। "स्याही ताज़ी है। किसी ने अभी मिटाया है।"
उसने डायरी मेरे हाथ से ली और पन्ने को रोशनी में किया। दाग के नीचे, हल्के उभार में, मैंने एक अक्षर देखा — आधा बना, जैसे कोई जल्दी में लिखकर मिटा गया हो।
"रा…" मैंने पढ़ा।
भवानी ने डायरी बंद कर दी। उसके हाथ काँप रहे थे।
"कल सुबह जज के सामने," उसने कहा, "मैं ये डायरी पेश करूँगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि इसमें मेरे दादा का गुनाह है।" उसने डायरी सीने से लगाई। "और मेरे बेटे को बचाने का आख़िरी रास्ता यही है।"
"इससे तेरा बेटा कैसे बचेगा?"
"क्योंकि जो चौथा टुकड़ा ले गया है, वो इसे बेचेगा। और जो इसे ख़रीदेगा, वो मेरे बेटे को मार डालेगा।" भवानी ने मेरी तरफ़ देखा। "पर तेरे पास अभी भी एक रास्ता है। तू चौथा टुकड़ा वापस ला। तू टोकन को पूरा कर। और फिर तू ख़ुद जज को बता कि इस डायरी में क्या है।"
"और तू?"
"मैं अपने बेटे के पास जाऊँगा।" उसने डायरी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "ये तेरे दादा की लिखाई है। तेरा हक़ है।"
मैंने डायरी ली। भवानी मुड़ा और गली की तरफ़ चला। दरवाज़े पर रुककर बोला, बिना पीछे देखे:
"तेरे दादा ने मेरे दादा को चोर कहा था। आज मैंने उनकी डायरी पढ़ी — वो चोर नहीं थे।" उसने सिर हिलाया। "चोर तो मैं हूँ, जो बीस साल उनकी लिखी बात पर भरोसा नहीं किया।"
वो चला गया। माँ ने दरवाज़ा बंद किया। मैं आँगन में खड़ा रहा, डायरी हाथ में।
रीना दरवाज़े पर आई। उसने मेरा चेहरा देखा और कुछ नहीं पूछा। बस एक गिलास पानी लाई।
"पी," उसने कहा।
मैंने पिया। फिर मैंने डायरी मेज़ पर रखी और उसका आख़िरी पन्ना फिर खोला। दाग के नीचे वो आधा अक्षर अब भी था।
"रा…"
मैंने टोकन जेब से निकाला। तीन टुकड़े जुड़े हुए, चौथे की जगह खाली — और उस खाली जगह पर एक नई लकीर उभर रही थी, धीरे-धीरे, जैसे किसी ने अभी पेंसिल चलाई हो।
लकीर पूरी हुई। और उसके नीचे दो शब्द आए:
"वो आया।"
मैंने आँगन में देखा। खाली। गली में देखा। खाली।
फिर मेरी नज़र संदूक पर पड़ी। ढक्कन खुला था, लोहे की तह उठी थी, गड्ढा खाली था।
और गड्ढे के किनारे, ज़मीन पर, एक पीली पर्ची पड़ी थी जो वहाँ पहले नहीं थी।
मैंने उठाई। उलटा कोना-चिह्न। और नीचे एक लाइन:
"तेरे दादा की डायरी मेरे पास आनी चाहिए थी। तूने पहले पढ़ ली। अब मैं तेरे घर के उस आदमी से मिलूँगा जो रोज़ तेरे पीछे खाता है।"
मैं दौड़कर माँ के पास गया। "माँ, आज रात घर में कौन-कौन है?"
माँ ने गिनाया — "मैं, रीना, तू।"
"बाहर?"
"बंसी की दुकान पर उसका भतीजा है। हरिया गेट पर है।"
"और कोई?"
माँ रुकीं। उन्होंने सोचा। फिर धीरे से बोलीं, "कमलेश की बहन आज सुबह आई थी। कह रही थी रात रुकेगी। वो पीछे के कमरे में है।"
मैं उसी वक़्त पीछे के कमरे की तरफ़ बढ़ा। दरवाज़ा बंद था। मैंने धक्का दिया — अंदर से कुंडी लगी थी।
"कमलेश की बहन?" मैंने आवाज़ दी।
कोई जवाब नहीं।
मैंने कंधा लगाकर दरवाज़ा खोला। कमरा खाली था। खिड़की खुली थी। चारपाई पर कोई नहीं। और चारपाई के नीचे, ज़मीन पर, वही पीली पर्ची — एक और।
मैंने उठाई। इस बार लिखा था:
"मैं वो नहीं जो तू ढूँढ रहा है। मैं वो हूँ जो तेरे दादा ने बीस साल पहले छिपाया था। कल सुबह अदालत में मिल। — रा"
मेरे हाथ से पर्ची फिसल गई। नीचे गिरी, और उसी वक़्त जेब में टोकन गरम हुआ — इतना गरम कि मैंने जेब से निकालकर मेज़ पर रख दिया।
टोकन पर नई लकीर के नीचे तीन शब्द उभरे थे:
"वो तेरा है।"
मैंने टोकन को हथेली पर रखा। “वो तेरा है” — तीन शब्द, और मेरे पैरों के नीचे ज़मीन खिसक गई।
रीना पीछे आकर खड़ी हो गई। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
“क्या हुआ?”
मैंने टोकन उसे दिखाया। उसने पढ़ा और उसका हाथ मेरे कंधे से उतर गया।
“मन्नू, ये टोकन है या कोई जानवर? ये बोलता क्यों है?”
“मुझे नहीं पता।” मैंने पर्ची उठाई जो गिरी थी। “पर जो भी बोल रहा है, वो जानता है कि घर में कौन-कौन है।”
“कमलेश की बहन?” रीना ने कमरे में देखा। खुली खिड़की से हवा आ रही थी। “वो भागी क्यों?”
“क्योंकि मैंने दरवाज़ा तोड़ा।” मैंने चारपाई के नीचे झुककर देखा। “या क्योंकि उसे तोड़ने की उम्मीद थी।”
चारपाई के नीचे धूल के अलावा एक चीज़ थी — माचिस की डिब्बी। खाली। और डिब्बी के भीतर की तरफ़ नाखून से खुरचकर लिखा था: “माँ से पूछ, बंसी की दुकान किसके नाम है।”
मैं उठा। माँ रसोई में बैठी थीं, चूल्हे के पास, हाथ में मिट्टी का तवा पकड़े, पर आँच बंद थी।
“माँ।”
“हाँ।”
“बंसी की दुकान किसके नाम पर है?”
माँ ने तवा रख दिया। उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा।
“तेरे दादा के नाम पर।”
“मतलब?”
“मतलब ये कि बंसी दुकान चलाता है, मालिक तेरे दादा हैं। बीस साल से।” उन्होंने आँच जलाई, फिर बुझा दी। “तेरे दादा मरे, तब तू छोटा था। काग़ज़ात मेरे पास आए। मैंने सोचा, बंसी परिवार का है, वो ही संभाले। मैंने कभी उससे एक पैसा नहीं माँगा।”
“और बंसी ने कभी बताया नहीं?”
“बताया तो था।” माँ ने पहली बार मेरी तरफ़ देखा। “कहा था — जिस दिन तेरा बेटा पूछेगा, उस दिन सब हिसाब दूँगा।”
“तो आज पूछ रहा हूँ।”
माँ उठीं। उन्होंने पीछे के कमरे का दरवाज़ा खोला, और दीवार पर टँगी एक पुरानी तस्वीर के पीछे से काग़ज़ों का बंडल निकाला। बंडल खोलकर एक काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया।
उस पर दादा का नाम था और नीचे एक लाइन: “यह दुकान बंसी को नहीं, गाँव के ट्रस्ट को दी जाए। मरने के बाद।”
“ये कब लिखा है?” मैंने पूछा।
“तेरे दादा की मौत से तीन दिन पहले।” माँ की आवाज़ सपाट थी। “और इस काग़ज़ पर बंसी के हस्ताक्षर भी हैं। गवाह के तौर पर।”
“बंसी ने इस पर हस्ताक्षर किए? जबकि इससे उसकी दुकान छिन रही थी?”
“हाँ।” माँ ने काग़ज़ मोड़ा। “और इसीलिए बीस साल से मैं बंसी से कुछ नहीं पूछती। वो आदमी चोर नहीं है, मन्नू। वो बस दुकान चला रहा है और इंतज़ार कर रहा है कि मैं ये काग़ज़ उसे दूँ।”
मैं सीढ़ी से नीचे उतरा, सीधा गली में। रात करीब बारह बजे की थी। बंसी की दुकान का शटर आधा गिरा था, पर अंदर लाइट जल रही थी।
मैंने शटर उठाया। बंसी काउंटर पर बैठा था, सामने एक खुली वही, और हाथ में पेंसिल। वो मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराया — वही धीमी मुस्कान।
“आ गया,” उसने कहा, जैसे इंतज़ार ही कर रहा था।
“तू जानता था मैं आऊँगा?”
“मैं जानता था कि आज रात तेरे घर में कुछ टूटेगा।” उसने वही बंद की। “बैठ।”
“मुझे कमलेश की बहन चाहिए।”
बंसी की पेंसिल रुकी।
“कमलेश की बहन?”
“वो आज सुबह आई थी। पीछे के कमरे में रुकी। अभी गायब है।”
बंसी ने पेंसिल मेज़ पर रखी और धीरे से बोला, “कमलेश की बहन मर चुकी है, मन्नू। पिछले साल, बाढ़ में।”
मैं खड़ा रह गया। काउंटर की लकड़ी मेरे हाथ के नीचे ठंडी थी।
“तो आज सुबह जो औरत आई, वो कौन थी?”
“वही जो बीस साल से तेरे दादा के छिपे काग़ज़ात ढूँढ रही है।” बंसी ने अलमारी से एक चीज़ निकाली — मोटे काग़ज़ का एक लिफ़ाफ़ा। “ये तेरे दादा ने मुझे दिया था। कहा था — जिस दिन कोई घर में घुसकर पीली पर्ची छोड़े, उस दिन ये मन्नू को देना।”
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