The Token System – Chapter 906
“नहीं। मैंने कहा — जिस थैले में वो डायरी है, वो जज साहब के ताले में है। और ताले की चाबी मेरे पास है, पर काग़ज़ निकलने का हुक्म मेरे पास नहीं।” चौकीदार ने मेरी तरफ़ देखा। “वो आदमी बुरा ख़ासा चिढ़ गया था। जाते वक़्त बोला — ठीक है, ताले को तो ख़ुद जज साहब पहनाते हैं।”
बंसी ने मेरी कमीज़ पकड़ी। “मन्नू।”
“सुन रहा हूँ।”
“उस आदमी ने ताले से पहले ये कहा —” चौकीदार ने फिर एक कश लिया, “— कि जज साहब का उसके घर आना-जाना है। हर शुक्रवार।”
मैंने बंसी को देखा। शुक्रवार — कल। और मेरे घर के पीछे वाली गली में जज साहब की कोठी है, जहाँ वो सालों से आते रहे हैं। मेरे पापा के साथ बैठते हैं। चाय पीते हैं।
“चाचा,” मैंने चौकीदार से कहा, “थैला मेरे हाथ में दो। डायरी इस वक़्त रात में लेकर जाना ठीक नहीं। पर एक काग़ज़, बस एक। लिखकर दे दो कि ये थैला शंकर के वारिस को सुपुर्द किया गया।”
चौकीदार ने मेरी आँखों में देखा। “तू शंकर का बेटे का बेटा है?”
“हाँ।”
“शंकर बड़ा सीधा आदमी था। और सीधे आदमी का सीधा वारिस।” उसने हुक्का का पीपा ढक दिया। “काग़ज़ लिखता हूँ। पर मुझे भी एक लाइन लिखनी होगी — कि ये थैला जमा रहा यहाँ तीस साल, बिना खुला। ताकि कल कोई कहे नहीं कि चौकीदार ने कुछ गड़बड़ की।”
वो उठकर अंदर गया। मैं बंसी से धीरे बोला, “जज साहब हर शुक्रवार आते हैं। आज कोई बैठक हुई थी?”
“तेरे घर पर?”
“हाँ। माँ ने कुछ नहीं कहा, पर आज सुबह जब मैं निकला, दालान में दो गिलास पड़े थे। दो।”
बंसी ने माथा खुजाया। “तेरे पापा घर नहीं थे।”
“इसीलिए दो गिलास और सवाल।”
चौकीदार लौटा — हाथ में काग़ज़, और एक पुरानी मोमबत्ती। उसने रजिस्टर पर मोम गिराई और दो लाइनें लिखकर मुझे थमा दीं। रजिस्टर वाला काग़ज़ मैंने जेब में रखा।
“एक बात,” चौकीदार ने कहा। “वो आदमी जाते वक़्त रुका था। दरवाज़े पर। और उसने अपने आप से कहा — ‘अब जज साहब को भी हिसाब देना पड़ेगा।’ मुझे लगा बोल रहा है मुझसे, पर वो बोल रहा था अपने आप से।”
“क्या मतलब?”
“मतलब ये कि वो आदमी जज साहब के बारे में ऊँची आवाज़ में नहीं बोलता। दबी आवाज़ में बोलता है। दबी आवाज़ वाले लोग अक्सर वही बोलते हैं जो वो करने वाले होते हैं।”
हम साइकिल पर बैठे। मैंने मोड़ लिया — घर की तरफ़ नहीं। रीना के स्कूल के पीछे वाली गली की तरफ़।
“ये कहाँ?” बंसी ने पूछा।
“माँ को जगाना है। पर घर में नहीं। घर के कोने पर — जहाँ पहरा बैठता है, उस से दो कदम पहले। अगर वो सुन रहा हो, तो हमें एक ऐसे शब्द की ज़रूरत है जो उसे झूठ पकड़ने पर मजबूर करे।”
“कैसे?”
“माँ से पूछूँगा — ‘आज दालान में दो गिलास थे। एक तेरा, दूसरा किसका?’ अगर माँ कहे — ‘किसी का नहीं था’ — तो माँ झूठ बोल रही है। और अगर माँ सच बोले, तो हमें नाम मिल जाएगा।”
बंसी ने साइकिल रोकी। “मन्नू, माँ से झूठ पकड़ने का खेल? तुझे पता है वो क्या सोचेगी?”
“वो सोचेगी कि मैं पागल हूँ। पर वो बताएगी ज़रूर। माँ झूठ नहीं पकड़ सकती — जब मैं सामने खड़ा होता हूँ, वो पापा की तरह मुँह नहीं छिपा पाती।”
घर के कोने पर पहुँचकर मैंने साइकिल खड़ी की। दरवाज़े की तरफ़ नहीं, खिड़की की तरफ़ गया। खिड़की के नीचे से माँ की आवाज़ नहीं आ रही थी। पीछे के आँगन से आ रही थी — हल्की, थकी।
“माँ।”
चूल्हे की तरफ़ बैठी माँ ने चाय का पतीला उठाया। “इस वक़्त? अमर कैसा है?”
“ठीक।” मैं अंदर घुसा। “माँ, आज दालान में दो गिलास थे। एक तेरा, दूसरा किसका?”
माँ के हाथ पतीले पर रुक गए। एक पल। दो पल। फिर उसने पतीला चूल्हे पर रख दिया, और बिना मेरी तरफ़ देखे बोली, “तू अभी छोटा है, मन्नू। बड़ी बातें सुनकर तेरा दिमाग़ और गरम हो जाएगा।”
“गिलास किसका था?”
“बैठ, चाय पी।”
“माँ।”
वो रुकी। मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में जो था, वो डर नहीं था — शर्म थी।
“जज साहब का,” उसने कहा। “वो आए थे। कह रहे थे — शंकर की कुछ काग़ज़ात उनके पास हैं, अमर के बाप के मुक़दमे में काम आएँगे। मैंने कहा — अमर का बाप बीमार है। वो बोले — बीमारी मुक़दमा नहीं रोकती।”
“तूने मुझे क्यों नहीं बताया?”
“क्योंकि तू तब ही रस्सी पर चढ़ा हुआ था। और मुझे लगा —” उसने पल्लू से आँख पोंछी, “— मुझे लगा ये सब तेरे सिर से टल जाएगा। पापा भी यही सोचते थे।”
“पापा कहाँ हैं? अभी?”
माँ ने बाहर आँगन के अंधेरे में देखा। “वो तीन दिन से घर नहीं सोए। कहते हैं — बाहर काम है। पर कल रात मैंने उन्हें जज साहब की कोठी की तरफ़ जाते देखा।”
मैंने बंसी को देखा। बंसी का चेहरा किसी और वक़्त होता तो मैं हँस देता। अब नहीं।
“माँ,” मैंने कहा, “तू घर के अंदर जा। दरवाज़ा बंद कर। और आज रात कोई आए — जज साहब भी — तो मत खोलना।”
“तू क्या करने वाला है?”
“मैं जज साहब की कोठी जा रहा हूँ।”
माँ मेरी तरफ़ बढ़ी। “मन्नू —”
“माँ, अमर मर रहा है। और जो आदमी उसे मार रहा है, वो हमारे घर के गिलास में चाय पीता है। मुझे उसका नाम चाहिए। जज साहब के पास है।”
मैं मुड़ा। पीछे से माँ की आवाज़ आई — आधी हवा में, “जज साहब के पास आदमी है। दो।”
मैं रुका।
“वो गिलास देखकर मुझे बोले — ‘बहू, ये गिलास उलटे रख देना, जब तक मैं लौटूँ।’ और उनके साथ आया आदमी बाहर गाड़ी में बैठा था। बीच वाली सीट पर। मैंने उसका चेहरा नहीं देखा। पर उसकी बाँह पर कलाई — ज़ख़्म था। लंबा, उलटा हुआ।”
बंसी ने धीरे से कहा, “पहरा।”
मैंने साइकिल उठाई। “बंसी, तू घर पर रुक।”
“क्यों?”
“क्योंकि अगर मैं लौटूँ, तो मुझे तेरी ज़रूरत होगी। और अगर अमर को कुछ हो, तो सुमन को एक हिम्मत वाले चेहरे की ज़रूरत होगी — और वो चेहरा तू है।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। फिर साइकिल संभाली। “जज साहब की कोठी के पीछे अंधेरा बाग़ है। वहाँ से घुस। दरवाज़े पर मत जा।”
“तू जानता है ये सब?”
“मैंने उस कोठी में पहले भी —” वो रुका। “कभी तेरे दादा के साथ पानी पिलाया है। चल।”
मैं साइकिल पर सवार हुआ। पर पैडल दबाने से पहले मेरा हाथ जेब में गया। ठंडा टोकन अब गरम था, और गरम टोकन — लगभग ठंडा। किसी ने उनकी जगह बदल दी थी। मैंने उन्हें एक साथ मुट्ठी में दबाया — और मुझे लगा जैसे मेरी हथेली के नीचे दो दिल धड़क रहे हैं।
फिर मेरा पैर डगमगाया। कोठी की तरफ़ से नहीं — उसके उलटी तरफ़ से। अस्पताल की तरफ़ से। मेरा माथा अंधेरे में किसी डोर से छू गया, और मुझे वो आवाज़ सुनाई दी जो मुझे कभी नहीं सुननी चाहिए थी।
मेरी जेब का मोबाइल बजा। सुमन थी। मैंने सुना।
“जा रहा है? लौटते वक़्त तक —” उसकी आवाज़ टूटी। “वो मुझसे तेरा नंबर माँग रहा था। कह रहा था — मन्नू को बोलना, टोकन देख लें, दोनों। अब देख लिए, तो जल्दी आ जाए।”
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
“सुमन —”
“मन्नू, इसे मेरे सामने बोली हुई लाइन है। ये लाइन अमर जैसे आधे बेहोश आदमी की नहीं है। ये — ये वैसे आदमी की है जिसे सब पता है।”
मैंने बंसी को देखा। वो कुछ नहीं बोला — बस आँखों से मुझसे पूछा।
“सुमन,” मैंने कहा, “वो तेरे पास अकेला है?”
“हाँ। बस मैं हूँ — और वो।”
“तो उसे छोड़कर बाहर मत जाना। दरवाज़ा बंद करके बैठ। मैं आ रहा हूँ।”
मैंने फोन काटा और साइकिल घुमाई। बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno