The Token System – Chapter 90
कमरे से बाहर निकला तो गलियारे में रोशनी आँखों में चुभी। मैंने लिफ़ाफ़ा जेब में और काग़ज़ कुर्ते के अंदर खोंसा। दोनों भारी नहीं थे, फिर भी लग रहा था जैसे दो ईंटें लादे चल रहा हूँ।
रीना पीछे से आई और सीधे मेरा हाथ पकड़ लिया। "रुक।"
मैं रुका।
"वो आदमी कौन था?"
"कौन?"
"जो तुझे पीछे ले गया था। चपरासी आकर बुला रहा था। मैंने देखा।"
"कोई था। भवानी का।"
उसने हाथ नहीं छोड़ा। "क्या कहा उसने?"
"बाद में, रीना। अंदर चल। बैठक शुरू होगी।"
"मन्नू।" उसकी आवाज़ बदल गई। "मैं तेरी बहन हूँ। तू मुझसे छिपा रहा है।"
"छिपा नहीं रहा।" मैंने उसका हाथ हल्के से हटाया। "बस अभी दिमाग़ ठीक नहीं है।"
वो मेरी तरफ़ देखती रही, फिर पलटकर अंदर चल दी। मैं उसके पीछे गया।
हॉल में लोग अपनी-अपनी जगह लौट रहे थे। सरोज बुआ पहली बेंच पर बैठी थीं, उनके हाथ में एक कपड़ा था जिसे वो बार-बार मोड़ रही थीं। बंसी दरवाज़े के पास खड़ा था, चाय का कप हाथ में। उसने मुझे देखा और आँख से इशारा किया — कुछ ठीक नहीं है।
मैं बैठ गया। रीना मेरे बगल में। जज आए। बैठक फिर शुरू हुई।
भवानी का पहला वकील खड़ा हुआ। काले कोट में, साफ़ कटा बाल, चश्मा नाक पर टिका हुआ। उसने काग़ज़ संभाला और बोला — "महोदय, बचाव पक्ष की तरफ़ से एक ज़रूरी बात। जो काग़ज़ अभियोक्ता ने पेश किया — जिस पर उनके कहने से पिता की लिखाई है — वो काग़ज़ बाद में लिखा गया है।"
जज ने चश्मे से ऊपर देखा। "आपके पास क्या आधार है?"
"महोदय, इस काग़ज़ पर कोई तारीख़ नहीं है। कोई गवाह नहीं है। यह सिर्फ़ एक पुराना काग़ज़ है जिस पर कोई भी कुछ भी लिखकर रख सकता है। और यह काग़ज़ उनके पास बारह साल बाद कैसे पहुँचा — इसका कोई हिसाब नहीं।"
जज मेरी तरफ़ देखने लगे।
मैं खड़ा हुआ। जेब में हाथ डाला। उस काग़ज़ को निकालने ही वाला था कि अचानक मेरी जाँघ पर जेब के अंदर कुछ ठंडा हुआ।
टूटा कोना।
बर्फ़ जैसा ठंडा। एक पल को मेरा हाथ रुक गया। मैंने जेब के अंदर उसे महसूस किया — वो कांप रहा था। नहीं, मैं काँप रहा था। पर वो ठंडा था, यह पक्का था। इससे पहले कभी इतना ठंडा नहीं हुआ था।
अचानक पीछे से कुर्सी खिसकने की आवाज़ आई।
सरोज बुआ खड़ी थीं।
"महोदय।"
जज ने उन्हें देखा। "आपको बोला नहीं गया था।"
"मैं जानती हूँ," बुआ ने कहा। "पर मुझे एक बात कहनी है जो मैंने अभी तक नहीं कही। उस काग़ज़ पर तारीख़ का सवाल उठा। मैं तारीख़ बताती हूँ।"
वकील हँसा। "महोदय, यह कोई गवाही नहीं —"
"चुप रहिए," जज ने कहा। फिर बुआ की तरफ़ देखा। "बोलिए।"
बुआ ने कपड़ा मेज़ पर रखा। "जिस दिन इनके पिता का हाथ पकड़कर दस्तख़त लिए गए, वो दिन सावन का था। बारिश आई थी रात को। मैं उस वक़्त हवेली में काम पर थी। मैंने उनका हाथ पकड़ा हुआ देखा था — मेरे भाई का हाथ उनकी कलाई पर और मेरे जीजा का हाथ काँप रहा था। मैंने यह बात अब तक इसलिए नहीं कही थी कि मैं अपने ही भाई के ख़िलाफ़ खड़ी हो रही थी।" उन्होंने साँस ली। "अब कह रही हूँ।"
जज ने लिखने वाले की तरफ़ देखा। "दर्ज कीजिए। तारीख़ — सावन, बारिश वाली रात। बरस दो हज़ार बारह।"
वकील का चेहरा उतर गया। उसने कुछ कहना चाहा, पर जज ने हाथ उठा दिया।
"बैठ जाइए।"
वकील बैठ गया।
मैं धीरे से बैठा। जेब में हाथ डाला — टूटा कोना अब सामान्य था। न गरम, न ठंडा। जैसे कुछ हुआ ही न हो।
बैठक आगे चली। बंसी की गवाही लिखी गई, काग़ज़ पर मुहर लगी, जज ने अगली तारीख़ तय की — चौदह दिन बाद। बोला, "दस्तावेज़ों की जाँच होगी।"
तीन बज कर चालीस पर बैठक टली।
मैं उठकर बाहर जाने लगा कि रीना ने फिर कलाई पकड़ी। "अब बता।"
"रीना —"
"नहीं। अब। बाहर।" वो मुझे खींचकर गलियारे के कोने में ले गई, जहाँ लोग कम थे।
वो मेरे सामने खड़ी हो गई। "वो आदमी तुझे क्या देकर गया था?"
"रीना —"
"जेब फूली हुई है। मैंने देखा।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। भवानी की धमकी सामने रखूँ तो ये घबराएगी। न रखूँ तो मुझ पर भरोसा टूटेगा।
"उसने पैसे दिए," मैंने कहा। "असली काग़ज़ दिए। और कहा — गवाही वापस ले लो।"
रीना का चेहरा सख़्त हो गया। "और तूने ले लिए?"
"मैंने ले लिए।"
"मन्नू!"
"सुन तो।"
"क्या सुनूँ? तूने रिश्वत ले ली।"
"हाँ। ले ली।" मैंने आवाज़ धीमी रखी। "क्योंकि अगर मैंने न ली होती, तो वो अंदर जाकर ये बात कह देता कि मैंने काग़ज़ चुराए हैं। और वो काग़ज़ जो उसने दिया — वो नक़ली है। मैं जानता हूँ।"
"कैसे जानता है?"
"पता नहीं कैसे। बस जानता हूँ।" मैंने उसकी आँखों में देखा। "ये काग़ज़ जो उसने दिया, इस पर मुहर का रंग ताज़ा है। बारह साल पुराना काग़ज़ ऐसा नहीं दिखता।"
रीना ने मेरा हाथ छोड़ दिया। वो दीवार से टिक गई।
"तीसरी बात," मैंने कहा। "उसने कहा — तेरी शादी का लिफ़ाफ़ा उनके पास है। अगर अदालत में खुला तो पूरा गाँव हँसेगा।"
रीना सीधी खड़ी हो गई। "क्या?"
"मैं नहीं जानता उसका मतलब क्या है।"
"मैं भी नहीं जानती," रीना ने कहा। फिर उसकी आवाज़ धीमी हुई। "पर मुझे पता है कि वो झूठ बोल सकता है। इसलिए वो पैसे तेरे पास रहेंगे तो उसका डर भी तेरे पास रहेगा।"
"तो क्या करूँ?"
"जज के सामने सब रख दे।"
मैं रुक गया। यह सोचने वाली बात थी। पर मैंने कुछ नहीं कहा।
उसी वक़्त मेरी नज़र गलियारे के आख़िरी कोने पर पड़ी।
मुंशी खड़ा था।
हाथ जोड़े, सफ़ेद कुर्ता, वही चेहरा जो पीछे के कमरे में मुस्कुराया था। उसने आँख से इशारा किया — नीचे। फिर हाथ आगे बढ़ाया, हथेली खोली — लौटा दो।
मैंने उसकी तरफ़ देखा और फिर पलटकर रीना से कहा, "तू अंदर जा। बसी को बोल दे मैं पाँच मिनट में आता हूँ।"
"कहाँ जा रहा है?"
"उससे बात करने।"
मैं सीढ़ियों से नीचे उतरा। मुंशी ने मुझे छज्जे के नीचे आते देखा और वहीं रुक गया, जहाँ लोग नहीं थे।
"लिफ़ाफ़ा लौटा दीजिए," उसने बिना भूमिका के कहा।
"इतनी जल्दी क्यों?"
"भवानी जी ने कहा है — देर नहीं।"
"क्यों?"
उसने कुछ नहीं कहा। बस हाथ बढ़ाया हुआ रखा।
मैंने उसका हाथ कुछ देर देखा। फिर कहा, "काग़ज़ भी लौटा दूँ?"
"काग़ज़ आप रख सकते हैं।"
"क्यों?"
"क्योंकि वो किसी काम का नहीं है।"
यह मुझे पहले से पता था। पर उसके मुँह से सुनकर पक्का हो गया।
"तो काग़ज़ झूठा है," मैंने कहा।
मुंशी ने कोई जवाब नहीं दिया। "लिफ़ाफ़ा दीजिए।"
"नहीं।"
"इसका मतलब आपने फ़ैसला कर लिया?"
"मैंने कुछ नहीं किया। पचास हज़ार में से एक नोट भी ख़र्च नहीं किया। आप जाकर भवानी जी से कह दीजिए — लिफ़ाफ़ा मेरे पास है और रहेगा। जब अदालत में सब कुछ साफ़ हो जाएगा, तब लौटाऊँगा। हिसाब से।"
मुंशी ने हाथ नीचे किया। उसकी आँखों में कुछ बदला। "आप नहीं जानते आप क्या कर रहे हैं।"
"मुझे भी यही लगता है।" मैंने कहा। "पर आप जो करवाने आए हो, वो भी कम नहीं।"
मुंशी पलटा और चला गया। मैं उसकी पीठ देखता रहा जब तक वो गली के मोड़ से गायब नहीं हुआ।
वापस अंदर आया तो सरोज बुआ हॉल के बाहर बरामदे में अकेली खड़ी थीं, छज्जे के खंभे से टिकी। हाथ में वही कपड़ा। उन्होंने मुझे देखा और कुछ नहीं कहा, बस बगल में खड़े होने की जगह दी।
मैं उनके साथ खड़ा हो गया। दो मिनट चुप रहे।
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