The Token System – Chapter 89
“आज उसी ज़मीन पर भवानी का नया गोदाम बन रहा है। और कल अदालत में वो यही काग़ज़ दिखाएगा। कहेगा — यह ज़मीन मेरी है, इस पर मेरा हक़ है, और ये लोग मेरे ही रास्ते में रोड़े अटका रहे हैं।”
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। “और ये क्या है?” मैंने वो काग़ज़ निकाला जिस पर लकीरें उभरी थीं।
सरोज बुआ ने उसे छुआ। उनका हाथ काँपा। “कहाँ मिला?”
“घर की दीवार में।”
“ये उसी काग़ज़ की दूसरी कॉपी है।” उन्होंने धीरे से कहा। “पहली भवानी के पास है। दूसरी कभी तेरे पापा के पास थी।”
“तो ये मेरे पापा ने छिपाई थी?”
“हाँ।” सरोज बुआ ने उनकी तरफ़ देखा। “और तेरे पापा ने इसे छिपाया ही नहीं — उन्होंने इस पर एक लाइन लिखी थी। उलटी तरफ़ देख।”
मैंने काग़ज़ पलटा। उलटी तरफ़ पेंसिल से कुछ लिखा था। फीका। बहुत फीका। जैसे सालों पहले लिखा गया हो और मिट गया हो।
मैंने आँखें सिकोड़कर देखा। पढ़ा —
“मैंने ये दस्तख़त नहीं किए। मेरा हाथ पकड़ा गया। मेरा बेटा मन्नू — जब बड़ा हो, इसे सच बताना। मैं माली था। मालिक नहीं।”
नीचे तारीख़ थी। उस दिन से दो दिन पहले की जिस दिन पापा की मौत हुई थी। मतलब पापा ने मरने से पहले ये लिखा था। और छिपा दिया था।
मेरे हाथ काँपने लगे।
“बुआ, ये — ये तो सबूत है।”
“सबूत है,” सरोज बुआ ने कहा, “पर अदालत में काम नहीं आएगा। ये लाइन पेंसिल की है, फीकी है। भवानी का वकील कहेगा — बाद में किसी ने मिलाई है।”
“तो क्या फ़ायदा?”
“फ़ायदा यह है,” उन्होंने मेरी तरफ़ झुककर कहा, “कि कल जब भवानी अपना काग़ज़ दिखाएगा, तो मैं गवाही दूँगी। मैं कहूँगी — उस दिन मैं वहाँ थी। मैंने देखा था। मेरी बहन राधा का पति बीमार था, और भवानी उसका हाथ पकड़कर अँगूठा लगवा रहा था।” उन्होंने मेरी आँखों में देखा। “एक बात सुन ले, मन्नू। मैं भवानी की बहन हूँ। मगर मैं उसकी नहीं हूँ। मैं तेरे पापा की तरफ़ हूँ।”
मैं कुछ नहीं बोला।
तभी हवेली के अंदर से आवाज़ आई — किसी के जूतों की। सरोज बुआ ने फौरन चादर सिर पर डाली।
“जा। पीछे के रास्ते से। कल अदालत में मिलेंगे। और मन्नू —” उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा, “तेरे पापा ने जो लिखा, वो तेरे लिए लिखा था।”
मैंने सिर हिलाया और पीछे की दीवार फांदकर बाहर आ गया। नदी के किनारे से घर पहुँचा। साँस फूल रही थी।
घर के दरवाज़े पर रीना खड़ी थी। हाथ में लालटेन।
“तू गई थी?” उसने पूछा।
“तू जाग क्यों रही है?”
“क्योंकि तू बाहर निकलते वक़्त ‘पानी पीने’ बोला था, और पानी का मटका सीढ़ी के नीचे रखा है, ऊपर नहीं।” उसने लालटेन मेरी तरफ़ की। “कहाँ था?”
मैंने सीधा जवाब दिया। “हवेली के पीछे। बुआ से मिलने।”
“कौन बुआ?”
“सरोज। भवानी की बहन।”
रीना की आँखें फैल गईं। “और वो —”
“वो कल अदालत में गवाही देगी। हमारी तरफ़ से।”
रीना ने लालटेन नीचे की। फिर बोली, “अंदर चल। सुबह जल्दी उठना है।”
आधी रात को मैं चारपाई पर लेटा था। काग़ज़ हाथ में पकड़े हुए। पापा की लिखाई उँगली से छू रहा था। बाहर आँगन में झींगुर बोल रहे थे।
सुबह छह बजे मैं दुकान पर पहुँचा। बंसी शटर उठा रहा था। मैंने पर्ची और काग़ज़ उसके सामने रखे। उसने पढ़ा। फिर काग़ज़ पलटकर पापा की लाइन पढ़ी। उसका चेहरा बदल गया।
“तेरे पापा ने ये लिखा था?”
“मिला दीवार में।”
बंसी ने काग़ज़ मेज़ पर रखा और दोनों हाथ मुँह पर रखकर बैठ गया। फिर बोला — “मैं उस दिन दुकान पर था। तेरे पापा के घर के बाहर भीड़ थी। मैंने सुना — भवानी ने कहा, ये काग़ज़ तेरा ही है, तेरा ही अँगूठा है।” उसने मेरी तरफ़ देखा। “मैं अंदर जाकर उनसे मिल सकता था। मगर मैं डर गया।”
“अब डरो मत,” मैंने कहा। “आज तुम गवाही दोगे। बुआ गवाही देंगी। और ये काग़ज़ दिखाएँगे।”
बंसी ने सिर हिलाया। “तेरे पापा माली थे। मालिक नहीं। याद रखना — जब अदालत में खड़े हो, तो यही बोलना। भवानी को सबसे ज़्यादा इसी बात से डर लगता है।”
दोपहर बारह बजे की तारीख़ थी। अदालत का कमरा भरा हुआ था। भवानी अपने वकील के साथ आया था। एक भी नहीं, दो वकील। मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो मुस्कुराया।
जज आए। कार्रवाई शुरू हुई। भवानी के वकील ने काग़ज़ पेश किया। बोला — “यह ज़मीन के मालिकाना हक़ का दस्तावेज़ है। इनके पिता का अँगूठा है।”
जज ने पूछा, “आपके पास इसकी नक़ल है?”
मैं खड़ा हुआ। “जी।”
“पेश करिए।”
मैंने काग़ज़ आगे बढ़ाया। जज ने देखा। “इस पर कुछ लिखा है — फीका। पढ़ा नहीं जा रहा।”
“जी,” मैंने कहा। “यह मेरे पिता की लिखाई है। यह उन्होंने अपनी मौत से दो दिन पहले लिखी थी। इसमें लिखा है — मैंने ये दस्तख़त नहीं किए। मेरा हाथ पकड़ा गया।”
अदालत में सन्नाटा फैल गया। भवानी के वकील ने आपत्ति जताई — “यह फीका काग़ज़ है, कोई भी लिख सकता है —”
“महोदय,” सरोज बुआ की आवाज़ आई पीछे से। वो खड़ी थीं। “मैं गवाही दूँगी। मैं उस दिन वहाँ थी।”
भवानी ने पलटकर देखा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। “सरोज?” वो फुसफुसाया।
सरोज बुआ ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। उन्होंने जज की तरफ़ देखा और कहा — “मैं इस आदमी की बहन हूँ। और मैं गवाही दूँगी कि मेरे भाई ने मेरे जीजा का हाथ पकड़कर अँगूठा लगवाया था। मैंने अपनी आँखों से देखा है।”
जज ने पूछा, “आप क़सम खाकर यह कह रही हैं?”
“क़सम भगवान की खाती हूँ,” सरोज बुआ ने कहा। “और अपने जीजा की आत्मा की भी।”
उसके बाद बंसी उठा। उसने कहा — “मैं इसी गाँव की दुकान पर तीस साल से हूँ। मैंने देखा है कि ये आदमी कैसे गरीबों को छोटे-छोटे काम में फँसाता है। मैं खुद फँसा था।”
भवानी उठा। “झूठ! सब झूठ!”
“बैठ जाइए,” जज ने कहा।
भवानी बैठ गया। मगर उसकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले नहीं देखा — वो हार नहीं रहा था। वो बस इंतज़ार कर रहा था।
दो बजे का ब्रेक पड़ा। मैं बाहर आया। रीना पास आई और बोली — “तू ठीक है?”
“हाँ। बुआ ने कमाल किया।”
तभी एक चपरासी मेरे पास आया। “आपको कोई मिलने आया है। पीछे वाले कमरे में।”
मैं पीछे गया। कमरे में एक आदमी बैठा था। पचास के आसपास। सफ़ेद कुर्ता। मैंने उसे पहचाना नहीं।
“बैठिए,” उसने कहा। “मैं भवानी जी का मुंशी हूँ।”
मैं खड़ा रहा। “क्या काम है?”
“भवानी जी ने कहा है — बात कीजिए।”
“मैं बात नहीं करना चाहता।”
“तो सुन लीजिए।” उसने एक काग़ज़ मेज़ पर रखा। “यह भवानी जी की ज़मीन की असली काग़ज़ात हैं। जो अदालत में दिखाया गया, वो सिर्फ़ नक़ल थी। असली काग़ज़ बारह साल पहले ही —
“चले जाओ,” मैंने कहा।
“सुन लीजिए पूरा,” वो उठा। “भवानी जी कहते हैं — अगर आप आज गवाही वापस ले लें, तो ये असली काग़ज़ आपको दे देंगे। और साथ में —” उसने एक लिफ़ाफ़ा जेब से निकाला, “— पचास हज़ार रुपये। नक़द।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। फिर उसने कुछ और कहा — मुझे याद है बंसी की बात। कार्ड मेरे ही घर से आएगा। मुझे लगा मतलब कोई चीज़ चोरी हुई है। पर नहीं। कार्ड यह था। सीधा मेरे सामने।
“भवानी जी यह भी कहते हैं,” मुंशी ने आवाज़ धीमी की, “कि आपकी बहन रीना की शादी का जो लिफ़ाफ़ा उनके पास है — वो अगर अदालत में खुला, तो पूरा गाँव हँसेगा।”
मैंने काग़ज़ उठाया।
मैंने लिफ़ाफ़ा उठाया।
मुंशी मुस्कुराया।
मैंने दोनों जेब में रखे। “ठीक है
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