The Token System – Chapter 895
सामने एक आदमी खड़ा था। सफ़ेद बाल, दुबला शरीर, पुरानी मैली कमीज़। आँखें धँसी हुई। पर चेहरा वही था — वही चेहरा जो माँ की पुरानी तस्वीर में था, जो मैंने बचपन में एक बार अलमारी के पीछे छिपी तस्वीर में देखा था।
"मन्नू," उसने कहा।
मैं कुछ नहीं बोल पाया।
"तेरी मूँछें आ गई हैं," उसने कहा। मुस्कुराया — हल्का, थका हुआ।
माँ मेरे पीछे से आगे आई। वो उसे देखकर रुकी। बस देखती रही।
आदमी की आँखें भर आईं। "कौशल्या," उसने कहा।
माँ के होंठ काँपे। "किशन।"
फिर आदमी आगे बढ़ा और माँ के पैरों पर हाथ रखकर बैठ गया। माँ ने उसे उठाने की कोशिश नहीं की। वो भी उसी तरह खड़ी रही।
रीना ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
भवानी सिपाहियों के बीच से आगे आया। पापा ने उसे देखा।
"तू," पापा ने कहा। कोई ग़ुस्सा नहीं था आवाज़ में, बस थकान। "तू आया।"
भवानी ने ज़मीन की तरफ़ देखा।
"मैं तुझे छोड़ने आया हूँ," भवानी ने कहा।
तभी पापा हँसे। पहली बार — ज़ोर से, और उस हँसी में कुछ ऐसा था जो इस कमरे की हवा को हिला दे।
"बीस साल," पापा ने कहा। "बीस साल में ये पहला मौक़ा है जब तूने मेरी आँख में आँख डालकर बात की है।"
भवानी कुछ नहीं बोला।
"पहले तू यहाँ आता था," पापा ने कहा। "दरवाज़े के बाहर से। रोज़ एक गिलास पानी रखता था, पर अंदर नहीं आता। मैं सुनता था तेरे जूतों की आवाज़। आज अंदर आया है।"
भवानी धीरे से आगे बढ़ा और पापा के पैरों की तरफ़ झुका।
"रुक," पापा ने हाथ आगे करके रोक दिया। "पैर छूने की ज़रूरत नहीं। पैर छूने से हिसाब नहीं उतरता। हिसाब सच बोलने से उतरता है।"
"मैंने अदालत में सब कह दिया," भवानी ने कहा। आवाज़ सूखी थी।
"मैंने सुना," पापा ने कहा। "राजेंद्र ने आकर बताया।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "तेरा बेटा बहुत दिन इस कमरे के बाहर खड़ा रहा आज। तेरे जाने के बाद। सुबह। फिर दोपहर। फिर शाम। मुझे कोई कुछ नहीं बोलता था। कोई कुछ बताता नहीं था। पर मुझे सब पता है।"
"कैसे?" रीना ने पूछा।
"यहाँ के ताले बोलते हैं," पापा ने कहा। बंसी की तरफ़ देखा। "तू वही बंसी है न? मोहल्ले के खोखे वाला?"
"हाँ बाबू," बंसी ने कहा। आवाज़ भारी थी।
"तेरे पापा का हिस्सा मैंने ही लिखवाया था," पापा ने कहा। "पर उन्हें बताया नहीं। सोचा, कभी मौक़ा आएगा तो ख़ुद बताऊँगा। मौक़ा अब आया।"
बंसी ने जेब से एक पुरानी लिपटी कॉपी निकाली — वही जो रामकिशन ने छिपाकर रखी थी। "मेरे पास है," उसने कहा। "हर हिस्से का हिसाब।"
पापा ने हाथ बढ़ाया। बंसी ने कॉपी दी। पापा ने उसे खोला, पन्ने उलटे, फिर बंद कर दिया।
"अब आख़िरी काम बाकी है," पापा ने कहा।
"कौन सा?" मैंने पूछा।
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। "वो पीतल की चीज़ — जो कुएँ से निकली। तेरे पास है?"
मैंने जेब से ठंडा टोकन निकाला। पापा ने उसे देखा, फिर बहुत देर तक देखा।
"ये किसी इंसान का नहीं है," पापा ने कहा। "ये हवेली के हिसाब का हिस्सा है। इसे वापस उसी जगह रखना है।"
"कहाँ?" मैंने पूछा।
"कुएँ के अंदर जो बक्सा मिला," पापा ने कहा। "उसके नीचे एक खाँचा है। उसी में।"
"पर अदालत की जाँच है," मैंने कहा। "जज ने कहा है कि सारी चीज़ें जाँच के बाद ही हिलेंगी।"
"जाँच हो जाने के बाद लौटाने में देर मत करना," पापा ने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी। "जो चीज़ अपनी जगह से हटी रहती है, वो अपने साथ हिसाब भी हिला देती है। बीस साल मैंने इसी कमरे में बैठकर वो हिलता हुआ हिसाब देखा है।"
मैंने चारों पीतल टुकड़े निकाले। पापा ने उन्हें देखा।
"चार," उन्होंने कहा। "तो अब हिसाब चार का है।"
"अब क्या होगा?" मैंने पूछा।
पापा ने मेरी तरफ़ देखा, फिर माँ की तरफ़, फिर रीना की तरफ़।
"अब कल होगा," पापा ने कहा। "अभी मुझे थोड़ी हवा चाहिए। बीस साल में पहली बार दरवाज़ा खुला है।"
हम उन्हें नीचे ले आए। होम के बरामदे में पुरानी कुर्सी पर बैठाया। राजेंद्र ने सिपाही खड़े किए।
सुमन भी आ गई। उसने पापा को देखा, फिर मेरी तरफ़ देखा।
"इन्हें डॉक्टर के पास ले जाना होगा," उसने कहा। "पर इतनी जल्दी नहीं जितना डर लग रहा है। बस खून की कमी है। कमज़ोरी। हवा।"
पापा ने सुमन को देखा। "तू सुमन है? डॉक्टर सुमन?"
"जी।"
"तेरे पापा को मैं जानता था," पापा ने कहा। "वो भी एक बार भवानी के होम आए थे — काग़ज़ लेकर। पर वो तेरे जैसे नहीं थे। वो काग़ज़ ऊपर रख आए थे। दो पन्ने। झूठे।"
सुमन का चेहरा बदला।
"कौन से पन्ने?" उसने पूछा।
"तीसरी मंज़िल के कमरे में, मेरी चारपाई के नीचे एक लोहे की पेटी है," पापा ने कहा। "उसमें सब है। जो मेरे हाथ से भवानी ने लिखवाया, जो श्यामलाल ने लिखा, और जो मैंने छिपाकर रखा।"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा।
"मैं जाती हूँ," वो कहकर सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ी।
"रुको," पापा ने कहा। "अंधेरे में अकेली मत जाओ। साथ में ले जाओ।"
राजेंद्र ने एक सिपाही सुमन के साथ भेजा।
रात हो गई थी। होम की बत्तियाँ जल रही थीं।
रास्ते में भवानी गाड़ी में बैठा था। सिपाहियों के बीच। मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो खिड़की से बाहर देख रहा था। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा और होंठ हिलाए। मैं समझ गया।
"एक मिनट," मैंने राजेंद्र से कहा।
मैं गाड़ी के पास गया। राजेंद्र ने खिड़की खोल दी।
"मेरे पास एक बात है," भवानी ने कहा। "श्यामलाल के पास तीसरे खाने की चाबी है। पर वो अकेला नहीं है। उसका एक और आदमी है — मोहन लाल के पीछे। उसे मैं नाम से नहीं जानता। मैं उसकी आवाज़ सुनता था, फ़ोन पर। मुझे लगता है, वो सालों से मेरे ही होम में है।"
"कहाँ?"
"पीछे के दफ़्तार में," भवानी ने कहा। "जहाँ मैं कभी नहीं जाता। मुझे लगता था वहाँ कोई नहीं। पर साल में दो बार, चार बजे, कोई मेरी कुर्सी पर बैठा होता है। मैंने कभी पूछा नहीं।"
"आज पूछ लेते हैं," बंसी ने कहा, जो मेरे पीछे आ गया था।
"आज नहीं," भवानी ने कहा। "वो आदमी पीछे के दफ़्तार में नहीं है। वो मेरी हिरासत की ख़बर सुनकर भाग चुका होगा। पर उसका एक काग़ज़ है — जो सिर्फ़ मेरा होम का पुराना आदमी जानता है। मोहन लाल।"
"मोहन लाल हिरासत में है," मैंने कहा।
"तो उससे पूछो," भवानी ने कहा। "अभी।"
गाड़ी चली। मैं बंसी के साथ पीछे बैठा रह गया।
"घर चलते हैं," बंसी ने कहा। "आज बहुत हो गया।"
"हाँ," मैंने कहा।
हम घर लौटे। माँ ने बिना कुछ कहे चूल्हा जलाया। रीना ने पानी रखा। बंसी दुकान से रोटी ले आया।
पहली बार उस घर में सब एक साथ बैठे। पापा की कुर्सी खाली थी — पर वो खाली नहीं थी, उस पर पापा का पुराना शॉल रखा था, जो कोई नहीं जानता था किसने निकाला।
"कल अदालत का फ़ैसला आएगा," रीना ने कहा। "अगर सब ठीक रहा तो मेरी शादी की तारीख़ भी तय होगी।"
"शादी से पहले एक काम बाकी है," माँ ने कहा। उसने मेरी तरफ़ देखा। "तुझे उस लड़की के घर जाकर ख़ुद बात करनी है।"
मैं हँस पड़ा। "माँ, मैं तो पहले से डरा हुआ हूँ।"
"डर उसी को लगता है," बंसी ने कहा, "जिसके पास बचाने को कुछ होता है। तेरे पास बचाने को बहुत है।"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। चारों पीतल टुकड़े थे। टोकन ठंडा था।
रात गहरी थी। माँ और रीना सो गईं। बंसी दुकान के पीछे वाले कमरे में चला गया।
मैं अपने कमरे में गया। दीवार पर पापा की पुरानी घड़ी टिक-टिक कर रही थी। मैंने उसे देखा। सुइयाँ ठीक चल रही थीं।
तभी मेरा मोबाइल बजा।
अनजान नंबर था। संदेश आया।
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