The Token System – Chapter 894
उन्होंने कलम रखी।
"अदालत अगली सुनवाई कल सुबह दस बजे तक स्थगित करती है। तब तक — राजेंद्र, मोहन लाल को उसी कोठरी में रखो जिसमें श्यामलाल को रखना था। और अगर मोहन लाल बोलना चाहे, तो उसका बयान मजिस्ट्रेट के सामने होगा — मेरे सामने नहीं। मुझे उसके बोलने से पहले कुछ नहीं सुनना।"
"जज साहब," राजेंद्र ने कहा, "एक और बात। मोहन लाल आज सुबह अदालत आने से पहले कहीं रुका था — उसका ड्राइवर कह रहा है कि उसे सुबह छह बजे एक गाड़ी से उतारा गया था। वो गाड़ी किसी बंद जगह से आई थी।"
"उस गाड़ी का पता लगाओ।"
"जी।"
अदालत उठने लगी। लोग उठे, कुर्सियाँ खिसकीं। मैंने सुमन को आवाज़ दी — "डॉक्टर सुमन, एक मिनट।"
वो मेरे पास आई। "बोलो।"
"अमर को नई जगह ले जाने वक़्त, एक बात का ध्यान रखना। उसका इलाज सिर्फ़ तुम्हारे हाथ में है — पर उसके आसपास जो भी नर्स रहेगी, वो तुम्हारी अपनी होनी चाहिए। और मैं एक आदमी भेजूँगा जो उसके कमरे के बाहर बैठेगा — मेरा आदमी।"
सुमन ने देखा। "कौन?"
"हरिया। वो बीस साल भवानी के डर में रहा है, पर उसने एक बार भी झूठ नहीं बोला — उसका डर उसका गुनाह नहीं था, और आज उसने सबके सामने सच कह दिया। अगर अमर के बाहर कोई बैठेगा, तो वो हरिया होगा।"
"ठीक है।"
मैं हॉल से बाहर निकला। भवानी को दो सिपाही लेकर दरवाज़े की तरफ़ ले जा रहे थे। वो बीच में रुका — सिपाही ने उसे रोका नहीं, शायद अपने आप रुक गया। हथकड़ी में हाथ जुड़े थे। उसने मेरी तरफ़ देखा।
मैं उसके पास गया।
"भवानी," मैंने कहा। "मैं तुमसे एक बात कहना चाहता हूँ।"
वो बोला नहीं।
"अमर का इलाज अब सुमन के हाथ में है। वो ठीक हो जाएगा। मैं जानता हूँ कि तुमने जो किया, वो माफ़ी के लायक़ नहीं। तुमने उसे छह महीने इस तरह ज़िंदा रखा, जैसे कोई पक्षी कटे पंखों से रखता है। पर आज तुमने ख़ुद कबूला — ये भी कुछ है।"
भवानी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में ग़ुस्सा नहीं था। थकान थी — वो थकान जो किसी आदमी के चेहरे पर तब आ जाती है जब वो बहुत सालों से खुद को थामे रहता है और अब हाथ छोड़ देता है।
"मैंने आज तक किसी से माफ़ी नहीं माँगी," उसने कहा। "और अब माँगूँगा भी नहीं। जो किया, वो मैंने किया। जो कहा, वो कहा। पर एक बात कहना चाहता हूँ।"
"कह।"
भवानी ने एक गहरी साँस ली। "तेरे पापा आज भी उसी होम की तीसरी मंज़िल पर हैं। ज़िंदा।"
मेरा सारा जिस्म जम गया।
"मैंने उन्हें कभी आज़ाद नहीं किया," भवानी ने कहा। "क्योंकि श्यामलाल कहता था कि अगर वो बाहर आए तो सारा हिसाब खुल जाएगा। बीस साल से वो उसी कमरे में है — जहाँ कभी मोहन लाल बैठता था। मैं आज ख़ुद जाकर उन्हें छोड़कर आऊँगा।"
मैंने भवानी को देखा। मेरे होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। मेरी जेब में टोकन था — वो गरम हो रहा था, मैं महसूस कर सकता था — और उस पर कुछ नया उभर रहा था।
"रुको," मैंने कहा। "मुझे तुम्हारे साथ चलना है।"
भवानी ने सिर हिलाया। "अदालत का आदमी पहले।" उसने सिपाहियों की तरफ़ देखा। "मुझे ले चलो। पर श्यामलाल को पहले ढूँढो — अगर वो तीसरे खाने तक पहुँच गया, तो तुम्हारे पापा का हिसाब कभी पूरा नहीं होगा।"
राजेंद्र दौड़ता हुआ बाहर आया। उसके हाथ में एक पीली पर्ची थी। "जज साहब का हुक्म है — होम की तीसरी मंज़िल आज ही खुलेगी। और हमने श्यामलाल की गाड़ी का पता लगाया — वो बसवा रोड से निकली है, पर आगे नहीं बढ़ी। लगता है वो रास्ते में रुकी है।"
"तो चलो," भवानी ने कहा। "होम चलो।"
मैंने जेब से टोकन निकाला। गरम था। उस पर नई लकीर थी — पंद्रहवीं। और उसके नीचे एक शब्द — "ऊपर।"
मेरे पीछे माँ की आवाज़ आई। "मन्नू।"
मैं मुड़ा। माँ दरवाज़े पर खड़ी थी। रीना उसके पास थी। बंसी उनके पीछे।
"मैं चलता हूँ," मैंने कहा। "तुम तीनों घर जाओ।"
"नहीं," माँ ने कहा। कोई ज़ोर नहीं था उसकी आवाज़ में, बस सीधी बात। "मैं उस आदमी को देखने जाऊँगी जो बीस साल से मेरा पति कहलाया। अब जब सच खुल रहा है, तो मैं पीछे नहीं रहूँगी।"
रीना ने माँ का हाथ थामा। "मैं भी चलूँगी।"
बंसी ने कहा, "और मैं तो हूँ ही।"
मैंने उन तीनों को देखा — और मेरे अंदर कुछ ऐसा हुआ जो उस पूरे दिन में पहली बार हुआ था। एक पल के लिए मुझे लगा कि अगर भवानी की हवेली, भवानी का होम, भवानी का हिसाब — सब कुछ टूट भी गया, तो इन तीनों के साथ मैं खड़ा हूँ, इससे बड़ा कुछ नहीं।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर एक शर्त है। जो मैं कहूँ, वो करना।"
"तेरी शर्तें तेरे पास रख," बंसी ने कहा। "मैं तो चल रहा हूँ।"
हम होम की तरफ़ चले। रास्ते में राजेंद्र की गाड़ी आगे थी, भवानी उसमें था। मैं बंसी की गाड़ी में था। माँ और रीना पीछे बैठी थीं।
गाड़ी में बंसी ने धीरे से कहा, "मन्नू, एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"तेरे पापा ज़िंदा हैं — अगर भवानी सच कह रहा है। तो तू क्या करेगा?"
मैंने खिड़की से बाहर देखा। शहर की सड़कें पीछे छूट रही थीं, बसवा रोड का मोड़ आ रहा था।
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "पर पहले ये पक्का करना है कि श्यामलाल तीसरे खाने तक न पहुँचे।"
होम के गेट पर पहुँचते वक़्त शाम होने को थी। सफ़ेद इमारत के सामने पुलिस की गाड़ी खड़ी थी। भवानी को गाड़ी से उतारा जा रहा था।
तभी मेरी जेब में टोकन फिर हिला। मैंने उसे निकाला। पंद्रहवीं लकीर के नीचे वो शब्द अब भी था — "ऊपर" — पर उसके पास एक और शब्द आ गया था।
"जल्दी।"
मैंने भवानी की तरफ़ देखा। वो भी मेरी तरफ़ देख रहा था।
"तेरी मंज़िल पर कोई है," भवानी ने कहा।
हम दरवाज़े की तरफ़ भागे।
॥
हम दरवाज़े की तरफ़ भागे, पर दरवाज़ा खुला था — और अंदर से कोई बाहर नहीं आ रहा था।
होम के अंदर घुसते ही सामने काउंटर पर बैठी औरत मिली, जो घबराकर उठ खड़ी हुई। राजेंद्र ने हुक्मनामा दिखाया। औरत ने काँपते हाथ से तीसरी मंज़िल की चाबी थमाई।
"सुबह से कोई ऊपर नहीं गया," औरत ने कहा। "पर एक बात कहूँ — चार बजे के आसपास एक आदमी सीढ़ियों पर चढ़ता दिखा था। सफ़ेद कुर्ता पहने था। मैंने पूछा तो बोला, ऊपर का मीटर देखने जा रहा हूँ।"
"श्यामलाल," बंसी ने कहा।
मैंने सीढ़ियों की तरफ़ देखा। रोशनी नहीं थी। सिर्फ़ नीचे से आती हुई हल्की धूप की आख़िरी किरण।
"पहले मीटर," मैंने कहा।
हम सीढ़ियों पर चढ़े। माँ मेरे पीछे थी, रीना उसका हाथ थामे। भवानी सिपाहियों के बीच था, पर उसकी आँखें ऊपर की तरफ़ थीं, जैसे वो रास्ता पहले से जानता हो।
दूसरी मंज़िल पार करते वक़्त मेरी जेब में टोकन फिर हिला। बहुत तेज़। मैंने रुककर उसे निकाला तो वो गरम था — वैसा ही गरम जैसा हवेली के आँगन में हुआ था।
उस पर लिखा था — "देर मत कर।"
तीसरी मंज़िल के दरवाज़े पर पहुँचे तो दरवाज़ा अंदर से बंद था। राजेंद्र ने चाबी डाली, पर ताला नहीं घूमा।
"अंदर से कुंडी लगी है," राजेंद्र ने कहा।
"हट जाओ," बंसी ने कहा और कंधा लगाया। दरवाज़ा नहीं टूटा।
तभी अंदर से आवाज़ आई। धीमी, रुकी हुई, पर साफ़।
"कौन है?"
मेरी साँस रुक गई।
माँ ने मेरी बाजू पकड़ी। उसके हाथ ठंडे थे।
"बोलो," आवाज़ फिर आई। "कौन है?"
मैंने गला साफ़ किया। "मैं हूँ," मैंने कहा। "मन्नू।"
अंदर कुछ देर चुप्पी रही। फिर कुंडी खुलने की आवाज़ आई। दरवाज़ा धीरे से खुला।
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