The Token System – Chapter 893
"तो श्यामलाल के पास तीसरे खाने की चाबी है," राजेंद्र ने कहा। "और उसने अपने पास रखी है।"
"हाँ," भवानी ने कहा। "और अगर वो तीसरा खाना खुल गया, तो उसमें जो काग़ज़ हैं, उनमें से एक काग़ज़ मेरे और मेरे बेटे के रिश्ते की सच्चाई बदल देगा।"
"क्या सच्चाई?" जज ने पूछा।
भवानी ने पहली बार मेरी तरफ़ देखा। फिर अमर की तरफ़। "कि अमर मेरा बेटा नहीं है।"
कमरे की हवा रुक गई।
अमर ने अपने बाप की तरफ़ देखा। उसका चेहरा नहीं बदला। स्वर नहीं बदला। बस उसने बहुत धीरे से कहा, "ये मुझे पता है, बाप। मुझे पता है कि मैं तुम्हारा बेटा नहीं हूँ। मैं तुम्हारे भाई का बेटा हूँ।"
भवानी जैसे पत्थर हो गया।
॥
जज ने चश्मा उतारा, मेज़ पर रखा, फिर भवानी की तरफ़ देखा। "श्यामलाल के पास क्या है? साफ़ बताओ।"
भवानी की कलाई हथकड़ी में थी। वो बैठा था, सीधा, बिना हिले। "अमर के इलाज की फ़ाइल। असली फ़ाइल। जो मैंने होम में रखवाई थी, वो नक़ली है — उसमें सब कुछ ठीक दिखाया गया है, जैसे बच्चा धीरे-धीरे ठीक हो रहा हो।"
"और असली में?"
"असली में, जज साहब, पिछले छह महीने से अमर को जो दवा दी जा रही है, उसमें एक चीज़ मिलाई जा रही है। कोई ज़हर नहीं — ऐसी चीज़, जो धीरे-धीरे जिस्म को अंदर से खोखला करती है। बुख़ार बढ़ता है, कमज़ोरी बढ़ती है, और डॉक्टर काग़ज़ पर लिखता रहता है — सुधार हो रहा है।"
मेरे पीछे किसी की साँस रुक गई। माँ ने मेरी कलाई छोड़ दी। रीना की पकड़ और सख़्त हो गई।
"ये काम किसने किया?" जज की आवाज़ सपाट थी, पर उसमें वो ठंडक थी जो पहले नहीं सुनी थी।
"मैंने अमर का इलाज उसी आदमी को सौंपा था जिसे मैं अपना सबसे भरोसेमंद आदमी मानता था। मेरा अपना मुंशी — मोहन लाल।"
हॉल में हलचल मच गई। सुमन की कुर्सी पीछे खिसकी। वो खड़ी हो गई। "जज साहब, ये नाम मुझे अभी बीस मिनट पहले अदालत में मिला — उसी लिफ़ाफ़े से — जो मन्नू को दिया गया था।"
"कौन सा लिफ़ाफ़ा?" जज ने पूछा।
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने जेब से वो पीला लिफ़ाफ़ा निकाला — वो जो मोहन लाल ने ख़ुद मेरे हाथ में दिया था, देवेंद्र सिंह के भेजे हुए काग़ज़ों के साथ। "ये, जज साहब। इसमें हवेली का नक्शा था, और एक पर्ची थी, जिस पर लिखा था — 'पहले बही, फिर खाता, अंत में नाम।' मुझे लगा ये देवेंद्र ने भेजा है। पर अब समझ आ रहा है कि ये लिफ़ाफ़ा मोहन लाल ने ख़ुद भेजा था, ताकि मैं उसी रास्ते चलूँ जिस पर वो चलाना चाहता था।"
"तो मोहन लाल," जज ने कहा, "दोनों तरफ़ खेल रहा है।"
"मोहन लाल नहीं," भवानी ने कहा। उसकी आवाज़ पहली बार हल्की टूटी। "श्यामलाल। मोहन लाल सिर्फ़ हाथ है। श्यामलाल ने उसे बीस साल पहले पाला था, जब मोहन लाल का बाप मरा था। श्यामलाल ने उसे पढ़ाया, और जब वो बड़ा हुआ, तो उसको मेरे होम में बिठा दिया — मेरी मेज़ के पीछे, मेरे काग़ज़ों के बीच, और मुझे कभी नहीं बताया कि वो उसका आदमी है।"
जज ने राजेंद्र की तरफ़ देखा। "मोहन लाल कहाँ है?"
"जज साहब," राजेंद्र ने कहा, "वो अभी अदालत के बाहर गवाहों के कमरे में है। हमने उसे सुबह बुलाया था — देवेंद्र सिंह के काग़ज़ों पर उसका नाम था।"
"उसे हिरासत में लो। अभी।"
राजेंद्र दो सिपाहियों के साथ बाहर निकला। कमरे में एक पल के लिए कोई नहीं बोला।
फिर जज ने सुमन की तरफ़ देखा। "डॉक्टर सुमन, तुमने अभी कहा कि तुम्हें फ़ाइल में गड़बड़ लगी थी। कब?"
सुमन ने गला साफ़ किया। "जज साहब, मैंने अमर को पहली बार तब देखा जब वो बहुत बुरी हालत में था। महीने पहले। उस वक़्त भवानी के होम का डॉक्टर — डॉक्टर मधु — मेरे साथ थी। उसने कहा कि अमर को साँस की बीमारी है और इलाज चल रहा है। मैंने फ़ाइल माँगी तो उसने दो पन्ने दिखाए, बाकी फ़ाइल कहकर टाल दिया। मुझे उस वक़्त शक हुआ था। पर मैंने सोचा — ये भवानी का बेटा है, भवानी का अपना होम है, मैं क्यों दख़ल दूँ।"
"और आज तुम्हें क्यों लगा कि दख़ल देना चाहिए?"
सुमन ने भवानी की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। "क्योंकि आज मुझे पता चला कि जिस आदमी ने छोटू को ज़हर देने की कोशिश की, वो उसी होम का था। और अगर वो एक बच्चे को नहीं बख़्शता, तो भवानी के बेटे को क्यों बख़्शेगा।"
जज ने कलम उठाई। "आदेश। अमर की पूरी मेडिकल फ़ाइल — असली और नक़ली, दोनों — आज शाम से पहले अदालत में पेश हों। होम के हर उस कर्मचारी के बयान लिए जाएँ जो अमर की दवा से जुड़ा था — डॉक्टर, नर्स, दवा बाँटने वाला, सब। और डॉक्टर सुमन —"
सुमन ने सिर उठाया।
"अमर का इलाज आज से तुम्हारे हाथ में है। तुम उसे सरकारी अस्पताल में शिफ़्ट करवाओ, और उसके कमरे के बाहर पुलिस का पहरा लगे। कोई भी दवा, कोई भी सिरप, कोई भी इंजेक्शन — बाहर से नहीं आएगा। जो भी दिया जाएगा, वो तुम्हारी निगरानी में दिया जाएगा, और उसका नाम-तारीख़ लिखा जाएगा।"
सुमन ने सिर हिलाया। "जज साहब, मैं एक बात कहना चाहती हूँ।"
"कहो।"
"अगर अमर को पिछले छह महीने से वो चीज़ दी जा रही है, तो उसके जिस्म में अभी भी है। उसे निकालने में वक़्त लगेगा, और शायद कुछ ऐसा नुक़सान हो चुका है जो पूरा नहीं होगा।" उसने भवानी की तरफ़ देखा। "पर मैं कोशिश पूरी करूँगी।"
"पर भवानी ने जो किया," जज ने कहा, "वो याद रखा जाएगा। उसने जान-बूझकर अपने बेटे को उस आदमी के हाथ में छोड़ा।"
भवानी ने सिर झुकाया। "जज साहब, मैंने उसे श्यामलाल के हाथ में नहीं छोड़ा। मैंने उसे मोहन लाल के हाथ में छोड़ा था, क्योंकि मैं समझता था कि मोहन लाल मेरा है। मुझे नहीं पता था कि मेरा आदमी बीस साल से मेरे पीछे मेरी ही मौत का हिसाब लिख रहा है।"
"और अब पता चला," जज ने कहा। "तो चाबी कहाँ है?"
भवानी ने अपनी कलाई हिलाई। "मेरी जेब में। अंदर वाले कमरे में जहाँ दवाइयाँ रखी हैं — उसकी चाबी। मैं चाहता हूँ कि अदालत का आदमी आज ही उस कमरे को खोले। और उस कमरे में जो रजिस्टर हैं, वो अदालत के सामने रखे जाएँ। मैं चाहता हूँ कि जो किया है, वो सब बाहर आए।"
राजेंद्र ने चाबी ली। उसने दो सिपाहियों को इशारा किया। "जज साहब, एक बात है। अगर वो कमरा खुलेगा, तो उसका काग़ज़ भी खुलेगा — वो जो भवानी ने अभी कहा।"
"तीसरा खाना?"
"हाँ। तिजोरी का तीसरा खाना जो कुएँ से जुड़ा है। श्यामलाल के पास उसकी चाबी है।" राजेंद्र ने मेरी तरफ़ देखा। "पर अगर श्यामलाल फ़रार है, तो चाबी भी उसके साथ गई।"
तभी मैं खड़ा हो गया।
"जज साहब," मैंने कहा। "मेरे पास भी एक चीज़ है।"
जज ने मेरी तरफ़ देखा। "क्या?"
मैंने जेब से दो चीज़ें निकालीं। पहली — कुएँ से निकली ठंडी पीतल की चीज़, जो भवानी के बाप के बक्से से आई थी, और जिस पर कोई अंक नहीं था। दूसरी — दादा का वो काग़ज़ जो संदूक की तह में मिला था, जिस पर असली लिखाई थी — हवेली के बँटवारे की, और जिस पर उन्नीस नाम थे।
"ये ठंडी चीज़ कुएँ के बक्से से आई है," मैंने कहा। "और ये काग़ज़ — ये मेरे दादा की लिखाई है। दोनों को मैं अदालत में पेश करता हूँ।"
जज ने हाथ बढ़ाया। एक सिपाही ने दोनों चीज़ें लेकर उनकी मेज़ पर रखीं। जज ने काग़ज़ को देखा — ध्यान से, धीरे-धीरे पढ़ा। फिर उठकर खड़े हुए।
"ये काग़ज़," उन्होंने कहा, "एक और सुनवाई लिखवाता है। सिपाही — इसे भी जाँच के लिए भेजो। और उस पीतल की चीज़ को भी। दोनों को रसायन विभाग और हस्तलेख विभाग दोनों को। रिपोर्ट आए बिना कोई दावा नहीं माना जाएगा।"
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