The Token System – Chapter 892
"क्योंकि मैं डरता था। डरता था कि अगर मैंने एक बार सच बोला, तो मेरे बाप का सारा प्यार मुझसे छिन जाएगा। मेरा बाप मेरे लिए एक बार भी बुरा नहीं बना।" उसने रुककर साँस ली। "पर कल रात मुझे सुमन दीदी ने सब बताया — होम में अमर के नाम पर जो काग़ज़ भरा गया था, वो मेरे बाप ने ही भरवाया था। मैंने सुना और मैं ख़ुद को यही कहता रहा कि ये सच नहीं होगा। फिर सुबह मेरे बाप मेरे कमरे में आए। वो मेरे सिरहाने बैठे रोए। और मुझे लगा — ये आदमी भी डरता है। तो आज मैं डरना बंद कर रहा हूँ।"
भवानी की आँखें भर आईं। वो कुर्सी की तरफ़ लौटा और बैठ गया। उसने अपना चेहरा दोनों हाथों में छिपा लिया।
जज ने भवानी की तरफ़ देखा। "ठाकुर भवानी सिंह, तुम कुछ कहना चाहते हो?"
भवानी ने हाथ नीचे किए। उसका चेहरा पहले से बदला हुआ था। वो उठा। हॉल की हर कुर्सी की तरफ़ उसने देखा — ग्यारह परिवार, काकी, शेखर बाबू, सुमन, माँ, रीना, और मेरी तरफ़।
"मैं सब कबूल करता हूँ," भवानी ने कहा। उसकी आवाज़ में कोई ज़ोर नहीं था। "काग़ज़ बदलना। ज़मीनें हड़पना। मरीज़ों को होम में रखकर उनसे भी ज़्यादा कमाना। श्यामलाल के हाथ से काग़ज़ सही करवाना। सब।"
भीड़ में हलचल मच गई। किसी ने ताली बजाई। किसी ने कुछ कहा। जज ने दो बार हथौड़ा मारा।
"प्रक्रिया के मुताबिक़ मैं तुम्हारा ये बयान लिखवाता हूँ," जज ने कहा। "पर पहले मैं एक बात साफ़ करना चाहता हूँ। जज साहब, मैंने जिन कामों का नाम अभी लिया, उनमें से हर एक में एक और आदमी का हाथ है — श्यामलाल।"
भवानी ने मेरी तरफ़ देखा।
"श्यामलाल मेरा बाप नहीं है," भवानी ने कहा। "वो मेरा मालिक है। मैंने बीस साल उसकी परछाईं की तरह काम किया। जो उसने कहा, मैंने किया। और आज वो अदालत में इसीलिए नहीं आया क्योंकि उसके हाथ में वो चीज़ है जो मेरे बेटे की जान ले सकती है।"
हॉल में आँधी आई। सुमन ने अमर की कुर्सी की बाँह पकड़कर उसे अपने पास खींचा। माँ उठ खड़ी हुई। रीना ने मेरा हाथ पकड़ा। काकी की लाठी फिर ज़ोर से पटकी गई — "क्या कहा?"
जज ने तीन बार हथौड़ा मारा। "अदालत में सन्नाटा!"
धीरे-धीरे शोर कम हुआ। जज ने नर्स की तरफ़ देखा। "तुम्हारे थैले में क्या है?"
नर्स ने एक पीली शीशी बाहर निकाली। "ये ज़हर है, जज साहब," सुमन ने आगे बढ़कर कहा। "ये अमर के कमरे की चारपाई के नीचे से मिला था। इसके पीछे भवानी के होम की मुहर और एक तारीख़ है। मैंने इसे दो दिन पहले मन्नू के हाथ से लिया था।"
"मैंने साफ़ कहा था," भवानी ने कहा, "कि वो मेरे बेटे की जान ले सकती है। अब मैं एक बात और कहूँगा जो कोई नहीं जानता — अपने बेटे की जान बचाने के लिए मैंने खुद उसके कमरे की चारपाई के नीचे ये शीशी रखी थी।"
सुमन हक्की बक्की रह गई। "क्या?"
"मैंने सोचा — अगर श्यामलाल कभी ये काम करवाना चाहेगा, तो मेरे ही हाथ से करवाएगा। तो मैंने पहले ही रख दी। ताकि जिस दिन वो कहे, मैं कह सकूँ कि इसमें ज़हर नहीं, पानी है। आज मैंने उसमें पानी डाल दिया। पर श्यामलाल ये जानता है कि मैंने कहाँ रखी थी। इसलिए उसने सुबह अपने आदमी भेजकर वो शीशी उठवा दी और उसकी जगह ये…" उसने नर्स के हाथ में रखी शीशी की तरफ़ इशारा किया, "…और वही उसमें डाल दिया जो मेरे बेटे को मार सकता था।"
राजेंद्र ने फौरन सिपाहियों को इशारा किया। "होम भेजो, पूरा कमरा खाली करवाओ, एक सुई भी न छूटे।"
"इससे पहले कि तुम कुछ करो," भवानी ने कहा, "मेरी एक बात और सुन लो। मैं श्यामलाल के हाथ में ये शीशी छोड़कर नहीं बैठा था। मैंने कुछ और भी किया है।"
जज ने कुर्सी पर झुककर पूछा, "क्या?"
भवानी ने जेब से एक मुड़ा काग़ज़ निकाला। "ये वो लिखाई है जो श्यामलाल ने मेरे बेटे की जान लेने के लिए पिछले हफ़्ते लिखवाई थी। उसने अपने आदमी से लिखवाया और उस आदमी ने मुझे बताया। मैंने उस आदमी को पैसे दिए, काग़ज़ की कॉपी ली, और असली काग़ज़ उसी रात जला दिया।"
"तो फिर श्यामलाल के पास क्या है?" जज ने पूछा।
"कुछ भी नहीं," भवानी ने कहा। "श्यामलाल के पास सिर्फ़ एक चीज़ है जो उसने मुझ से ली थी और मैं वो वापस लेने की हिम्मत नहीं कर पाया।"
"क्या चीज़?"
"वो कोड।" भवानी ने धीरे से कहा। "मेरी तिजोरी का दूसरा कोड। जो मेरे बाप ने श्यामलाल को दिया था। बीस साल पहले। और उस कोड से खुलने वाला खाना — उसमें अमर के नाम का एक काग़ज़ है जो मेरी बाप की लिखाई में है। अगर वो काग़ज़ सामने आया, तो सब समझ जाएँगे कि मैंने अमर को नहीं, अपने बाप को बचाया था।"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया — ये वही बात थी। जो मैंने कल रात पढ़ी थी। जो पापा की लिखाई में थी।
जज ने भवानी की तरफ़ देखा। "तुम्हारा बयान अदालत में दर्ज होगा। पर एक शर्त है — तुम अपना टोकन और अपना दूसरा कोड अदालत को सौंप दो।"
भवानी ने अपनी जेब से सपाट पीतल का गोल टुकड़ा निकाला। उसने एक पल उसे देखा, फिर राजेंद्र की तरफ़ बढ़ा दिया।
"टोकन," भवानी ने कहा। "पर कोड मेरे पास नहीं है। जो कोड मेरे बाप ने श्यामलाल को दिया, वो मैंने आज तक नहीं खोला।"
"तो कोड कहाँ है?"
भवानी ने कराह कर कहा, "मेरे दफ़्तार की तिजोरी के अंदरूनी खाने में। जो मेरे बाप ने कभी किसी को नहीं दिखाया। मैंने भी नहीं देखा।"
जज ने फ़ैसला सुनाया। "अदालत आदेश देती है कि भवानी की तिजोरी आज शाम से पहले खोली जाएगी, और उसके अंदरूनी खाने में जो कुछ है, वो अदालत के सामने रखा जाएगा। और ये शीशी — सुमन, इसे सील करके रसायन जाँच में भेजो।"
सुमन ने शीशी संभाली। "जज साहब," सुमन ने कहा, "पर एक बात है। अगर श्यामलाल ने मन्नू के हाथ से शीशी बदलवा दी थी, तो उसके पास कोई और भी है जो मन्नू के आसपास रहता है — हमारे ही घर का कोई।"
ये सुनना था कि हॉल में एक और कंपन आई। मेरे पीछे बैठी माँ की कुर्सी चरमराई।
जज ने रुककर सुमन की तरफ़ देखा। "यही तुम क्यों कह रही हो?"
"क्योंकि कल रात जिस वक़्त मैंने शीशी मन्नू से ली, उस वक़्त मन्नू के घर में सिर्फ़ पाँच लोग थे। मन्नू, उसकी बहन रीना, उसकी माँ, बंसी, और मैं। और मैंने शीशी भवानी के होम से ली थी — तो उसे बदलने वाला कोई अंदर का ही होगा जो उस वक़्त मन्नू के घर में था या जिसने मन्नू के बैग में उसे रख दिया।"
"तो तुम्हारा मतलब है," जज ने कहा, "कि मन्नू के घर में कोई उनके ख़िलाफ़ काम कर रहा है।"
सुमन ने धीरे से सिर हिलाया।
मेरे घुटने काँपे। माँ ने मेरी कलाई पकड़ ली। रीना ने मेरी दूसरी कलाई। बंसी ने मेरी जेब में हाथ डाला और भवानी का गरम टोकन थमा दिया।
"ये गरम है," बंसी ने फुसफुसाया।
मैंने टोकन हाथ में लिया। गरम था — पहले से ज़्यादा। मैंने उसे पलटा। उस पर नई लकीर — चौदहवीं। और उसके नीचे दो शब्द — "अंदर से।"
"जज साहब," मैंने कहा। "अगर अदालत आदेश दे, तो मैं भवानी की तिजोरी खोलने में मदद करूँगा — पर मुझे अपने ही घर से निकला हुआ वो आदमी भी चाहिए जो शीशी बदल लाया।"
जज ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर राजेंद्र की तरफ़। "तीन दिन में मन्नू के घर के हर आदमी का बयान लिया जाएगा।"
"पर एक बात है," भवानी अचानक बीच में बोला। "तिजोरी तक पहुँचने से पहले तुम्हें मेरा दूसरा दरवाज़ा खोलना होगा।"
"क्या मतलब?"
"मेरी तिजोरी छोटी नहीं है। उसमें पहला खाना सब जानते हैं, दूसरा खाना सिर्फ़ मैं जानता था, और तीसरा — जो मेरे बाप का था — वो अब तक किसी ने नहीं देखा। उसे खोलने की चाबी श्यामलाल के पास है। और वो तीसरा खाना — उसका रास्ता उसी कुएँ से जाता है जिसे हमने कल तुम्हारे सामने खोदा।"
हॉल में सन्नाटा छा गया। कल के कुएँ की हड्डियाँ और ठंडा टोकन — सब कुछ फिर मेरी आँखों के सामने आया।
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