The Token System – Chapter 874
माँ शांत बैठी रहीं। "मन्नू, तुम्हारे दादा कहते थे — टोकन का एक ही नियम है। जो टोकन रखता है, वो अकेला नहीं होता।" उन्होंने पर्ची की तरफ़ देखा। "उन्होंने कभी नहीं बताया कि साथ कौन होता है।"
मैं वहीं बैठा सोचता रहा। सीढ़ी पर वो आवाज़ मेरी थी — पर मेरे मुँह से नहीं आई थी। टोकन के शब्द सच्चे होते थे, पर वो पर्ची टोकन ने नहीं दी थी। फिर किसने दी? किसने मेरी आवाज़ में बोला?
मैंने मुहर उठाई। लकीर ऊपर थी, नोक पर वो छोटा काँटा अब भी जुड़ा था। मैंने उसे मेज़ पर रखकर टोकन के कोने के पास रखा। आधी लकीर मिली, फिर रुकी।
"आधी और," मैंने धीमे से कहा। "कहाँ है वो आधी?"
रीना ने पर्ची उठाई। पलटकर देखी, फिर पलटकर।
"मन्नू," उसने कहा, "इसके पीछे वाला चिह्न तेरे टोकन के चिह्न से उलटा है।"
"हाँ।"
"मतलब ये किसी और ने भेजी है। जो टोकन के उलटा चलता है।"
मैं उसकी तरफ़ देखने लगा। सात साल की रीना वो पर्ची पढ़ चुकी थी — आज वो मेरे सामने बैठी थी, और मुझसे तेज़ सोच रही थी।
"अदालत चार बजे है," मैंने कहा। "छत पर आठ बजे का बुलावा — पर आठ बजे कौन सा? पर्ची पर सिर्फ़ आठ लिखा है। सुबह या रात?"
रीना ने पर्ची पलटी। "सुबह लिखा ही नहीं। बस आठ।" वह मेरी तरफ़ देखने लगी। "अगर रात का आठ है, तो सुनवाई चार बजे ख़त्म हो जाएगी।"
मैं कुर्सी से उठ गया। रसोई से पानी पीने गया। बर्तन रखकर जैसे ही पलटा, चूल्हे के पास ज़मीन पर वही पीली पर्ची दिखी — पर ये अलग थी। इस बार पर्ची पर कोना-चिह्न नहीं था। ऊबड़-खाबड़ लिखाई में दो लाइनें थीं —
"कल आठ बजे, हवेली की छत पर, अकेले।"
मैंने पर्ची उठाई। पीछे देखा — ख़ाली। पलटकर ऊपर देखा — कोई नहीं।
तभी माँ की आवाज़ आई, बैठक से — "मन्नू, तेरे कमरे में कुछ गिरा है।"
मैं दौड़कर कमरे में गया। मेज़ पर तीनों टोकन वैसे ही रखे थे। पर पापा की मुहर फिर पलटी हुई थी — ऊपर की लकीर नीचे। और उसके ठीक बगल में एक और चीज़ रखी थी — पीली, मुड़ी हुई।
मैंने उठाई। वही लिखाई। "आज शाम चार बजे। तारीख़ बदल गई। वकील को बता दो।
॥
पर्ची मेरे हाथ में थी और मैं सीढ़ियों पर। रीना पीछे से बोल रही थी कि अकेले मत जा, पर मैं रुका नहीं। छत का दरवाज़ा खुला था, हवा तेज़ थी, और वो वहीं खड़ा था — सफ़ेद कुर्ता, हाथ में कुछ नहीं, बस खड़ा।
मैं तीन कदम चढ़कर रुक गया। हाथ में टोकन यूँ दबा रखा था कि कोना मुट्ठी में चुभ रहा था।
"तू है," मैंने कहा।
उसने पलटकर देखा। उमर वाला चेहरा, हाँ। पर आँखों में वो चालाकी नहीं थी जो उसके लिफ़ाफ़े लाने वाले आदमियों में थी। थकान थी।
"मैं हूँ," उसने कहा।
"नाम बता।"
"गोविंद।"
मैं हँसा — बिना मतलब। "गोविंद राम के दो बेटे थे। एक राजेंद्र का बाप। दूसरा जो नाम से मुकर गया।"
"दूसरा सामने खड़ा है।"
हवा ने उसका कुर्ता हिलाया। मैंने देखा — उसके बाएँ हाथ में वो जानी-पहचानी अँगूठी नहीं थी।
"तो तूने ही वो सब किया," मैंने कहा। "काग़ज़ बनवाना, गाड़ियाँ भेजना, बच्चों की सूची, फ़तेह को पैसे देना —"
"फ़तेह को पैसे भवानी देता था। मैं सिर्फ़ जानता था कि कहाँ जा रहा है।"
"और जानकर भी चुप?"
वो नीचे देखने लगा। छत के किनारे पर ईंट का टुकड़ा पड़ा था, उसने उसे पैर से हटाया।
"मैं उस घर में पला," उसने कहा। "जिसका नाम तेरे काग़ज़ों में है, उस घर में। भवानी के यहाँ। जब मैं आठ साल का था तब मेरी माँ ने अदालत में कुछ बोलना चाहा था। फिर कभी नहीं बोली। मुझे स्कूल में डाला, कपड़े दिए, कहा — भवानी साहब का लड़का है, तो किसी से तू नीचे नहीं।"
"और तेरा हिस्सा?"
"वही चाहिए।" उसने पहली बार सीधा देखा। "गोविंद राम की ज़मीन में से मेरा हिस्सा आज तक नहीं मिला। भवानी ने कहा था — अदालत में खड़ा हो जा, पीछे देख लेंगे। बीस साल हो गए।"
"तो तू अदालत में गलत गवाही देने आया था।"
"आया था।"
"और अब?"
वो चुप रहा।
मैंने टोकन जेब से निकाला। सुबह की धूप में पीतल चमका। उसकी नज़र उस पर पड़ी और वह एक कदम पीछे हुआ।
"ये देखकर डरता है?" मैंने कहा।
"नहीं डरता।" उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "आज से पहले नहीं देखा। भवानी कहता था — ऐसा होता है, पर दिखाने की चीज़ नहीं। मुझे लगता था बहाना है।"
तभी नीचे से आवाज़ आई।
"गोविंद।"
मैं मुड़ा। सीढ़ियों पर हाथ से रेलिंग पकड़े कोई चढ़ रहा था। सफ़ेद बाल उलझे हुए, कमीज़ की बाँह तनी हुई… भवानी था।
वो सातवीं सीढ़ी पर रुक गया। साँस तेज़ चल रही थी। दो दिन में वो आदमी नहीं लग रहा था जो कुर्सी पर बैठकर लोगों की ज़मीनें लिखता था।
"तू ऊपर क्यों आया," गोविंद ने कहा। "तेरे लिए सीढ़ियाँ मना हैं।"
"आज मना नहीं है।" भवानी ने रेलिंग थामी। "मैंने तेरे बाप का नाम बदला था, तुझे अपना बेटा कहा था। बता, उसका बदला क्या लूँ?"
"ये वक़्त मज़ाक का नहीं है।"
"मज़ाक?" भवानी हँसा, फिर खाँसने लगा। "मैं यहाँ हँसने नहीं आया। मैं यहाँ अपनी आख़िरी बात कहने आया हूँ।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू, जब तेरे पापा उस गाड़ी में थे, मैं भी था। मैंने देखा और मैं चुप रहा। बीस साल मैं चुप रहा। आज सुबह भी चुप रह रहा था।" वो फिर गोविंद की तरफ़ मुड़ा। "आज सच बोल। मैं अदालत में जो बोलेगा, मेरे ही ख़िलाफ़ होगा। जैसे रामदीन ने बोला।"
गोविंद की गर्दन झुकी रही।
"मैंने तुझे ग़लत रास्ते पर भेजा," भवानी ने कहा। "काग़ज़ों पर तेरा नाम लिखा, अंगूठा तेरा लगवाया, और पैसा देखा — किसने? मैंने। आज वो नाम अदालत में पढ़ा जाएगा। तुझे पसंद है या नहीं।"
छत पर सन्नाटा रहा। गोविंद के होंठ काँपे। फिर उसने अपनी आँखें मसलीं और मेरे पास आकर खड़ा हो गया।
"मैं गवाही दूँगा," उसने कहा।
"किसके ख़िलाफ़?" मैंने पूछा।
"भवानी के ख़िलाफ़ नहीं।" उसने सीधा भवानी को देखा। "उस आदमी के ख़िलाफ़ जिसने भवानी का नाम इस्तेमाल किया। श्यामलाल।"
भवानी का हाथ रेलिंग से फिसला।
"श्यामलाल? वो मेरा हिसाब लिखता था —"
"वो तेरे नाम से हिसाब बनाता था," गोविंद ने कहा। "तेरा अंगूठा नक़ल करता था। जो काग़ज़ तुझे साफ़ दिखते थे, उनके नीचे वो अपने बेटे के नाम ज़मीनें डालता था। तूने कभी पूछा, तेरे नाम पर इतनी ज़मीन कैसे आई?"
भवानी कुछ बोलता उससे पहले ही नीचे से बंसी की आवाज़ आई।
"मन्नू! अदालत का वक़्त बदल गया — ग्यारह बजे का हो गया है, चपरासी बोलकर गया!" फिर ज़ोर से, "और वहाँ एक आदमी आया है जो ख़ुद को देवेंद्र सिंह का मुंशी बताता है।"
मैं छत के किनारे पर दौड़ा। नीचे आँगन में एक आदमी खड़ा था — मोटा चश्मा, सफ़ेद दाढ़ी, हाथ में बैग।
"मोहन लाल," मैंने धीरे से कहा।
मैंने टोकन पर नज़र डाली। कोई शब्द नहीं था। कोई अंक नहीं। फिर मैंने ध्यान से देखा — अब तक वहाँ जो आठ हज़ार लिखा था, वो कहीं नहीं था। अब बस दो अक्षर थे — "शेष"।
मैंने गोविंद की तरफ़ देखा। "तू नीचे चल। मोहन लाल के साथ। मैं आता हूँ।"
"और मैं?" भवानी ने कहा।
"आप सीढ़ियाँ धीरे चढ़िए। ये घर आपका था, आपको रास्ता पता है।"
भवानी ने कुछ कहा पर हवा में उड़ गया। मैं तेज़ी से नीचे उतरा। आँगन में बंसी खड़ा था और मोहन लाल अपना चश्मा पोंछ रहे थे।
"मनोहर," मोहन लाल ने कहा। "देवेंद्र सिंह ने आपके लिए एक काग़ज़ भेजा है। पर पहले मैं एक बात कहूँ।"
"कहिए।"
"वो आदमी जिसने मुझे भवानी के हिसाब पर रखा था, वो आदमी आपके घर के नीचे वाले कमरे में पैदा हुआ था। आपके पापा के काग़ज़ों में उसका नाम लिखा है — और वो काग़ज़ आपके पास है।"
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