The Token System873 / 1154

The Token System – Chapter 873

7 min read November 6, 2026

चार बजे मैं आँगन में गया। आसमान स्याह था, पर पूरब किनारे पर हल्की सी फीकी लकीर। मैंने पिछला बरामदा चेक किया — दरवाज़ा अंदर से कुंडी लगा था। दीवार पर कोई निशान नहीं। चारों तरफ़ से घर बंद। फिर वह पर्ची रसोई में कैसे आई? और मुहर कैसे पलटी?

या…

मैं रसोई में वापस गया। चूल्हे के पास झुका। ज़मीन पर पुरानी राख थी। राख में एक जगह साफ़ गोल निशान था — जैसे कोई बैठा हो। छोटा सा, बच्चे जितना। मैंने हाथ बढ़ाया। राख ठंडी थी, पर उस गोल निशान के बीच उँगली रखी तो हल्की गरमी मिली।

मेरा हाथ काँपा। मैंने पीछे हटकर खुद को सँभाला।

"मन्नू?"

रीना दरवाज़े पर खड़ी थी, आँखें आधी बंद।

"तू अभी उठा है?" मैंने पूछा।

"तेरे कमरे से आवाज़ आ रही थी। कुर्सी खींचने की।" उसने आँखें मली। "फिर तू यहाँ क्या कर रहा है?"

"पानी पीने आया था।"

वह रसोई में आई, मेरे पास झुकी, और राख वाला गोल निशान देखा। उसका चेहरा बदला।

"ये क्या है?"

"मुझे भी नहीं पता।"

"मन्नू, कल अदालत है। तू डरा हुआ है। ऐसे ही ये सब…" उसने हाथ के इशारे से राख की तरफ़ इशारा किया।

"मैं डरा नहीं हूँ।"

वह मेरी तरफ़ देखने लगी, फिर वहीं चूल्हे के पास बैठ गई, दीवार से टिककर।

"मुझे कुछ बताना है," उसने धीमे से कहा। "जब भवानी के लोग पापा को ले गए थे, मैं सात साल की थी। मुझे याद है — रात थी, और मैंने तेरी मेज़ पर एक चीज़ देखी थी।"

"क्या?"

"एक पर्ची। पीली। तेरे स्कूल के बस्ते के नीचे दबी हुई। मैंने पढ़ी थी।"

मैं उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया।

"उस पर क्या लिखा था?"

"मैं उस वक़्त पूरा नहीं पढ़ पाई थी। बस इतना याद है — 'छत' और 'अकेले'। बस। फिर माँ आई और उसने मेरा हाथ खींचकर मुझे बाहर ले गई।"

"और वो पर्ची?"

"पता नहीं। सुबह मैंने बस्ता उठाया तो पर्ची नहीं थी।"

मैं कुछ देर चुप बैठा रहा। सात साल की बच्ची को जो पर्ची दिखी थी, वही आज मेरे हाथ लगी है। या ऐसी ही कोई।

"रीना, तू अभी सो जा। और सुन — सुबह जब तक मैं न आऊँ, तू माँ को कमरे से बाहर मत आने देना। किसी को भी दरवाज़ा मत खोलना। हरिया आएगा तो उसकी आवाज़ पहले पूछ लेना।"

"तू जा रहा है? कहाँ?"

"कुछ काम है। भोर तक लौट आऊँगा।"

वह उठी और मेरे सामने आकर खड़ी हो गई। उमर से कम थी, पर आँखों में उस वक़्त आँधी थी।

"तू हर बात छिपाता है। पापा के बारे में बीस साल छिपाया। टोकन के बारे में छिपाया। अब ये। मैं डर नहीं रही अब, मन्नू। मैं नाराज़ हो रही हूँ।"

"नाराज़ हो। पर सो जा।"

मैं बाहर आया। पाँच बज चुके थे। आसमान फीका पीला हो रहा था, पक्षी चहचहाने लगे थे। मैंने जेब टटोली — पर्ची वहीं थी। मैंने टोकन निकाला। उस पर 'भोर' लिखा था, पर अब अक्षर हल्के हो रहे थे — जैसे थक गए हों।

हवेली का रास्ता मुझे पता था। गाँव के उस पार, बबूल के पेड़ों के पीछे, जहाँ दो साल से कोई नहीं गया। भवानी मरी नहीं थी — बस कुर्सी पर बैठी रहती थी, सामने होम का फाटक खुला। पर हवेली उसकी पुरानी जगह, खंडहर में।

मैं घर से निकला तो गली में ठंडी हवा लगी। पड़ोस के कुत्ते ने एक बार गरदन उठाई, फिर सिर रख दिया।

रास्ते में बंसी का फ़ोन आया। सुबह के छह बज रहे थे।

"मन्नू, जाग गया?"

"जागा हुआ हूँ।"

"वकील साहब ने एक बात बताई। काग़ज़ पर वह कोना-चिह्न सिर्फ़ तब बनता है जब दस्तख़त की स्याही सूख चुकी हो — यानी असली दस्तावेज़। और आज सुबह उन्हें एक चिट्ठी मिली है, बिना नाम। उसमें लिखा है कि सुनवाई की तारीख़ बदलकर कल दोपहर बजाए आज शाम कर दी गई है।"

मैं रुक गया। गली के कोने पर।

"कब?"

"आज शाम चार बजे। मन्नू, किसी को नहीं पता ये चिट्ठी कहाँ से आई। पर अदालत के चपरासी ने पुष्टि की है। तारीख़ बदल चुकी है।"

भवानी का वकील तो चाहता था कि मैं काग़ज़ पेश न करूँ। आज सुबह आठ बजे छत पर मिलने का बुलावा, और शाम चार बजे सुनवाई — दोनों में फ़ुर्सत नहीं। कोई जल्दी में है।

"बंसी, तू जज के सामने काग़ज़ दे देना। वकील साहब को साथ रख।"

"पर तू?"

"मैं वक़्त पर पहुँचूँगा। या काग़ज़ पहुँच जाएगा। बस एक काम कर — मेरी मेज़ पर तीन टोकन हैं। एक पर सपाट निशान, एक पर तेरा, एक गोल। जो तीसरा है, उसे उठाकर रखना। चाहे कुछ भी हो, उसे अदालत ले जाना।"

"मन्नू, ये सब —"

फ़ोन कट गया।

मैं हवेली की तरफ़ चला। सूरज आधा निकला था, पर बबूल के पेड़ों के बीच अँधेरा टिका हुआ था। हवेली का फाटक खुला था, जंज़ीर ज़मीन पर पड़ी थी।

मैं अंदर आया। आँगन में घास उगी थी। सीढ़ियाँ टूटी हुई, एक जगह पत्थर हटा था। मैं चढ़ने लगा। छत पर जाने का रास्ता पीछे के बरामदे से था, जहाँ से पहले पानी का टैंक दिखता था — अब खाली, जंग लगा।

सीढ़ी के आख़िरी मोड़ पर मैंने पर्ची जेब से निकाली। पीछे वाला उलटा कोना-चिह्न मुझे देख रहा था।

छत पर पहुँचा। सिर्फ़ खाली परकोटा, टूटी मुंडेर, और बीच में एक पुरानी चारपाई। चारपाई पर कोई नहीं था। पर उसके ऊपर, पीली पर्ची की तरह, हवा में एक चीज़ घूम रही थी — शायद कुछ सूखा पत्ता। मैंने आस-पास देखा। कोई नहीं।

मैं चारपाई के पास गया। उस पर एक कोना-चिह्न बना था — बिल्कुल मेरी मुहर जैसा, पर उलटा।

और तभी नीचे से आवाज़ आई — मेरी ही आवाज़, जैसे किसी ने मेरी नक़ल की हो।

"मन्नू। घर जा। कल फिर सुबह आना।"

मैं हवा में ही रुक गया। रोंगटे खड़े हो गए। मैंने नीचे झाँका। आँगन में कोई नहीं था। जंज़ीर वैसी ही पड़ी थी।

मैं छत से उतरा और भागकर घर की तरफ़ चला।

घर पहुँचा तो सात बज चुके थे। दरवाज़ा बंद था। मैंने खटखटाया — रीना ने अंदर से पूछा, "कौन?"

"मैं। मन्नू।"

दरवाज़ा खुला। रीना ने मुझे देखा और सीधे गले लग गई।

"तू ठीक है? मैंने सपना देखा था — तू छत से गिर रहा था।"

"मैं ठीक हूँ।"

माँ बैठक में बैठी थीं, हाथ में रोटी का टुकड़ा, पर खाया नहीं। मैंने उनके सामने बैठकर सब कह सुनाया — पर्ची, छत, आवाज़, चिट्ठी, सुनवाई की तारीख़ बदलना।

माँ ने रोटी रख दी। उनकी आँखें सूखी थीं, पर हाथ गोद में काँप रहे थे।

"मन्नू," उन्होंने धीमे से कहा, "जिस दिन तुम्हारे दादा ने टोकन छिपाया था, उसी दिन से मैं डर में जी रही हूँ। हर आवाज़ पर लगता था — भवानी के आदमी हैं। हर पर्ची पर लगता था — कोई भेजी है। अब वो डर ख़त्म करो।"

"माँ, मैं —"

"मैं कुछ नहीं कह रही। बस इतना — काग़ज़ हाथ में है, वकील तैयार है, तुम्हारे पापा ज़िंदा हैं। भवानी की होम में बंद हैं।" उन्होंने मेरा हाथ थामा। "आज हम डरेंगे नहीं। जो पर्ची छत पर बुला रही है, उससे मिलो। पर पहले नाश्ता करो। भूखे आदमी की अक़्ल भी भूखी रहती है।"

रीना रसोई से चाय लेकर आई। मेरे हाथ में गिलास रखा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।

"मैं कल अदालत ख़ुद आऊँगी," उसने कहा। "माँ भी आएँगी। अगर भवानी का वकील सोचता है कि हम घर में बैठे डरेंगे, तो उसको दिखा देंगे।"

माँ ने हल्का सिर हिलाया। "आऊँगी। बीस साल से इंतज़ार किया है।"

मैं चाय पीने लगा। गिलास गरम था, हाथ में जान आई। रीना के सामने ही मैंने जेब से पर्ची निकाली और मेज़ पर रखी।

"ये मुझे पहले नहीं मिली थी। रसोई में मिली थी, आधी रात।"

"तो?" रीना ने कहा।

"तो ये घर के अंदर से आई है। दरवाज़े बंद थे। या तो कोई अंदर था, या कोई ऐसा है जिसे हम नहीं देख सकते।"

रीना की चाय हाथ में थम गई।

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