The Token System – Chapter 872
मोहित ने कुछ कहना चाहा, पर हरिया ने उसके कंधे पर हाथ रखा और वो रुक गया।
"मन्नू," माँ ने पीछे से कहा। मैं पलटा। वो रसोई के दरवाज़े पर खड़ी थी।
"आ जाओ। दो मिनट।"
मैं रसोई में गया। माँ ने चूल्हे की आँच धीमी की और मेरी तरफ़ पलटी।
"आज से पहले मैं डरती थी," उसने कहा। "तेरे दादा जिस दिन टोकन छिपाकर लाए थे, उस दिन से। मैं सोचती थी — कभी कोई आएगा और सब उजाड़ देगा।"
"माँ —"
"सुन ले।" उसने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी हथेली सूखी थी, गरम नहीं। "मैं साठ साल से इस घर में डर के साथ जी रही हूँ। आज वो डर ख़त्म हो गया।"
"कैसे?"
"क्योंकि आज तेरे बाप का नाम मेरी ज़बान पर आ गया, और आज दो कुत्ते हमारे दरवाज़े पर आए, तो मैंने डंडा उठा लिया।" उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "अब तू जो भी करे, मैं तेरे साथ हूँ। मरना हो तो साथ मरेंगे, पर झुककर नहीं।"
मैंने कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली। मैंने बस सिर हिलाया।
रसोई से निकला तो रीना दरवाज़े पर खड़ी थी।
"भैया," उसने कहा, "कल मैं भी अदालत चलूँगी।"
"रीना —"
"ना।" उसने हाथ उठाया। "आज उन्होंने माँ को उठाने की धमकी दी और मैं अंदर बैठी रही। अब मैं ये नहीं सह सकती। कल जो भी होगा, मैं वहाँ रहूँगी।"
"ठीक है," मैंने कहा।
वो हैरान हुई। "इतनी जल्दी हाँ?"
"तू ही तो कहती है — मैं तेरी बात नहीं मानता। आज मान ली।"
वो हँसी, फिर रोने लगी, फिर फिर हँसी। माँ ने रसोई से आवाज़ दी — "चाय ठंडी हो रही है।"
बैठक में हरिया और बंसी का भतीजा करन और मोहित को खड़ा कर चुके थे।
"कल तुम दोनों अदालत के बाहर खड़े मिलोगे," मैंने कहा। "अंदर जाकर वकील साहब को मेरी तरफ़ से ये बात देना — मन्नू के पास वो सारे काग़ज़ हैं जो ठाकुर भवानी की पाँच पीढ़ियों ने छिपाए थे। और वो कल दिखाएगा। चाहे जो हो जाए।"
"भैया, हम —"
"जाओ।" मैंने दरवाज़ा खोला। "और अगली बार इस घर के दरवाज़े पर लात मारी, तो पुलिस सीधा तुम्हारे घर जाएगी। ठाकुर साहब बचाने नहीं आएँगे — वो ख़ुद कल कटघरे में होंगे।"
दोनों भागे। गली के मोड़ पर वो सफ़ेद गाड़ी अब भी खड़ी थी, और जैसे ही करन-मोहित निकले, गाड़ी की बत्ती जली और वो दोनों की तरफ़ बढ़ी। फिर गाड़ी में से कोई उतरा नहीं, बस पिछली खिड़की खुली, कुछ दिखाया गया, और दोनों उसमें बैठ गए। गाड़ी चल दी।
हरिया गली के मोड़ तक गया और वापस आया।
"नंबर नहीं था," उसने कहा। "पीछे की प्लेट पर धूल थी। पर इतना देखा — अंदर एक बूढ़ा बैठा था, सफ़ेद दाढ़ी, हाथ में लाठी।"
"लाठी पर कुछ निशान?"
"पता नहीं। दूर था।"
बंसी का भतीजा बोला — "भैया, मैं इनके पीछे जाऊँ?"
"नहीं।" मैंने सिर हिलाया। "कल सुबह से पहले हमें अदालत में काग़ज़ जमा करने हैं। उससे ज़्यादा ज़रूरी है कि मुहर की बाकी लकीर कहाँ है।"
हरिया मेरी तरफ़ देखने लगा।
"मुहर की लकीर?"
"बाद में समझाता हूँ।"
माँ बैठक में आई और हरिया को देखकर रुक गई।
"तू वो ही है?" उसने पूछा। "जो पहरा बनकर अदालत में खड़ा था?"
हरिया ने सिर झुकाया।
"खाना खा ले," माँ ने कहा। "बहुत दुबला हो गया है।"
हरिया हँसा। "काकी, मैं पच्चीस साल से ठाकुर के डर में जी रहा था। खाना तो आज ही स्वाद लगा।"
मैं अपने कमरे में गया। मेज़ पर तीनों टोकन रखे थे — अपना, भवानी का सपाट, और अमर का। तीनों ठंडे थे। मैंने पापा की मुहर उठाई और उसे अपने टोकन के कोने के पास रखा। मुहर की आधी लकीर टोकन के कोना-चिह्न से मिलने लगी, पर पूरी नहीं हुई।
"बस आधी और," मैंने खुद से कहा। "आधी और, और मुहर बोलेगी।"
मैं बाहर आया तो आँगन में रीना खड़ी थी, हाथ में मेरी चप्पल। उसने मेरी तरफ़ फेंकी।
"कम से कम चप्पल तो पहन ले। सारा मोहल्ला तेरे नंगे पैरों पर हँस रहा था।"
मैंने चप्पल पहनी और सिर खुजाया।
"अब अंदर चल। माँ ने खाना रखा है।"
हम अंदर गए। खाना खाया। हरिया ने दो रोटी खाई और फिर कहा — "कल सुबह मैं अदालत के बाहर रहूँगा। अंदर बंसी और पापा रहेंगे।"
"पापा?" रीना ने काँटा रख दिया। "पापा आए हैं?"
हरिया मेरी तरफ़ देखने लगा। मैंने सिर हिलाया।
"हाँ, रीना। पापा ज़िंदा हैं। बीस साल से भवानी के होम में बंद थे। कल अदालत में गवाही देंगे।"
रीना की आँखों से आँसू बहे। उसने कुछ नहीं कहा, पर खाना छोड़कर उठ गई और माँ के पास जाकर बैठ गई। माँ ने उसका सिर सहलाया।
रात दस बजे हरिया और बंसी का भतीजा चले गए। बंसी ने फ़ोन किया — "मैं अदालत के पीछे वाले कमरे में रात रुकूँगा। पापा और वकील साहब वहीं हैं। सुबह सीधे अदालत।"
"ठीक है।"
"मन्नू, एक बात — उमरान ने कहा था, मुहर की लकीर कोरे काग़ज़ पर सीधी होती है। उसका मतलब?"
"मतलब — जिस पन्ने पर मुहर रखी जाएगी, उस पर लकीर पूरी उभरेगी। यानी असली पन्ना अभी मेरे पास नहीं है।"
"तो कल क्या करेगा?"
"कल मैं सुबह आठ बजे हवेली की छत पर जाऊँगा।"
"क्यों?"
मैं चुप रहा। मुझे खुद नहीं पता था। टोकन ने जो कहा था, वो सच हुआ करता था — पर ये पर्ची टोकन ने नहीं दी थी।
"बंसी," मैंने कहा, "कल सुबह सात बजे मुझे फ़ोन कर। अगर मैं न उठाऊँ, तो अदालत चला जाना और सारा काग़ज़ जज को देना।"
"मन्नू —"
मैंने फ़ोन काट दिया।
माँ और रीना सो गईं थीं। मैं आँगन में निकला। रात ठंडी थी। मोड़ पर सफ़ेद गाड़ी अब नहीं थी।
मैंने टोकन जेब से निकाला। उस पर कोई नया शब्द नहीं था। फिर भी उँगली से पकड़ते ही उसमें हल्की गरमी आई — इतनी हल्की कि शायद मुझे भ्रम हुआ।
मैं वापस अंदर आया। रसोई में पानी पीने गया। बर्तन रखकर जैसे ही पलटा, चूल्हे के पास ज़मीन पर एक पीली पर्ची दिखी। मैंने उठाई। कोना-चिह्न नहीं था। बस दो लाइनें, उबड़-खाबड़ लिखाई में —
"कल आठ बजे, हवेली की छत पर, अकेले। साथ कुछ मत लाना। पन्ना तेरे पास है, मुहर मेरे पास।"
मैंने पर्ची को दो बार पलटी। पीछे के तरफ़ एक छोटा सा निशान था — उलटा कोना-चिह्न।
मैं रसोई की खिड़की से बाहर देखने लगा। आँगन ख़ाली था। दरवाज़ा अंदर से बंद था। पीछे के कमरे का रास्ता पिछले बरामदे से जाता था, और वहाँ माँ की खिड़की थी। कोई अंदर कैसे आया?
तभी मेरे कमरे से हल्की आवाज़ आई — जैसे कोई कुर्सी सरकी हो।
मैं लपककर गया। कमरा ख़ाली था। मेज़ पर तीनों टोकन वैसे ही रखे थे। पर पापा की मुहर पलटी हुई थी — ऊपर की तरफ़ लकीर नहीं, नीचे की तरफ़।
मैंने मुहर उठाई और पलटकर रखी। लकीर फिर ऊपर आई, पर कुछ बदला हुआ था — लकीर की नोक पर एक छोटा सा काँटा जुड़ गया था। पहले नहीं था।
मैं सीधा आँगन में आया और देर तक खड़ा रहा। तीन बजे रात, हवा चल रही थी, बबूल की पत्तियाँ खड़खड़ा रही थीं।
अंदर आकर पर्ची को जेब में रखा और अपने टोकन को मेज़ पर रखा। टोकन पर उभरा — "भोर।"
टोकन पर वही एक शब्द था — भोर। मैंने उसे उलटा किया, झाड़ा, मेज़ पर थपथपाया। कोई नया शब्द नहीं आया। जैसे टोकन ने अपनी बात कह दी और मुँह बंद कर लिया।
मैं बिस्तर पर लेटा, पर नींद कहाँ। छत पर मकड़ी का जाला हवा से हिल रहा था। भोर। यानी सुबह। यानी वह पर्ची सच कह रही थी — छत पर किसी से मिलना है। पर कौन? और पन्ना मेरे पास कहाँ है?
मैं उठा, फिर बैठा, फिर उठा। दो बजे मैंने माँ की खिड़की से झाँका। वह करवट ले रही थी — ज़िंदा, साँस लेती हुई। रीना उसके पैरों के पास सोई थी, दुपट्टा मुँह पर।
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