The Token System – Chapter 868
"फिर?"
"फिर तेरी माँ भी नहीं बचेगी।"
मैंने काग़ज़ जेब में रखा और रीना का हाथ पकड़कर बाहर निकला। बंसी गाड़ी के पास खड़ा था। उसने रीना को देखा और गाड़ी का दरवाज़ा खोल दिया।
"घर चलें?" उसने पूछा।
"नहीं। अस्पताल।"
रीना गाड़ी में बैठी। मैं आगे बैठा। बंसी ने गाड़ी दौड़ाई।
"रीना," मैंने पीछे मुड़कर कहा, "माँ को फ़ोन कर दे। बोल दे कि तू मेरे साथ है।"
वो फ़ोन लगाने लगी। बंसी ने धीरे से कहा, "काग़ज़ में क्या था?"
"एक नाम।"
"कौन?"
"देवेंद्र सिंह।"
बंसी ने एक पल सोचा। "ये नाम मैंने कहीं सुना है।"
"कहाँ?"
"पुराने अख़बार में। जब मैं छोटा था, मेरे पिता के पास एक कतरन थी। सीमेंट फैक्टरी के मालिक का नाम था। वो फैक्टरी बंद हो गई थी, पर मालिक का नाम कभी नहीं छपा। सिर्फ़ एक बार छपा था।"
"क्या हुआ था उस आदमी को?"
"कुछ नहीं हुआ। वो चुपचाप गायब हो गया।" बंसी ने गाड़ी का गियर बदला। "और उसके जाने के बाद भवानी सिंह को ठाकुर कहा जाने लगा।"
अस्पताल पहुँचे तो रात के ग्यारह बज चुके थे। बाहर एक पुरानी सी गाड़ी खड़ी थी। वकील के आदमियों की नहीं थी। मैं रीना को लेकर सीढ़ियाँ चढ़ा। भवानी का कमरा बाहर से ही दिख रहा था — दरवाज़ा खुला था, अंदर से रोशनी आ रही थी, और बीप की आवाज़ तेज़ हो गई थी। बीच-बीच में रुकती थी, फिर फिर चलती थी।
डॉक्टर सुमन दरवाज़े के बाहर खड़ी थी। उसके हाथ में एक काग़ज़ था। उसने मुझे देखा और आँखें बंद कर लीं।
"सुमन दीदी —"
"अंदर मत जा।"
"क्यों?"
"क्योंकि अंदर भवानी बैठा है और उसका हाथ अमर के हाथ पर है। और अगर तू अभी गया, तो वो उठकर बाहर आ जाएगा। और अगर वो उठा, तो अमर —" उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "देख ले।"
मैंने काग़ज़ पढ़ा। ऊपर मरीज़ का नाम था, नीचे डॉक्टरों के हस्ताक्षर। बीच में एक लाइन थी — "दिमाग़ में ख़ून का थक्का। तीन दिन में ऑपरेशन ज़रूरी। वरना बच्चा बचेगा भी तो ज़िंदगी भर दिमाग़ से काम नहीं करेगा।"
"तीन दिन?" मैंने कहा।
"तीन दिन।" सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "और ऑपरेशन के लिए जो खर्च है, वो भवानी के पास नहीं है। उसने कल तक का सारा पैसा होम के कामों में लगा दिया है। और अब जो पैसा आएगा, वो अदालत के फ़ैसले से आएगा — जो महीने भर में होगा।"
"मतलब अमर —"
"मतलब अमर तीन दिन में ऑपरेशन नहीं करा सकता। और अगर तीन दिन में नहीं कराया, तो —" उसने काग़ज़ मोड़ा। "तू ख़ुद पढ़ सकता है।"
मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। सुमन ने मेरा हाथ पकड़ा।
"मन्नू, सुन।"
"वो मेरा बाप है, दीदी।"
"मुझे पता है। माँ ने कभी नहीं बताया पर मैं जानती हूँ। भवानी के काग़ज़ों में जो लिखा है, वो मैंने पढ़ लिया है। उसमें तेरा नाम नहीं है, पर तेरी माँ का नाम है — और उसके आगे देवेंद्र सिंह का।"
"तो तू जानती थी?"
"मैं बीस साल से जानती हूँ। पर तुझे नहीं बताया। क्योंकि माँ ने कहा था कि जिस दिन तू ख़ुद पूछेगा, उस दिन बताऊँगी।" उसने मेरा हाथ छोड़ा। "आज तूने पूछा है?"
"अब नहीं पूछूँगा। पहले अमर को देखना है।"
मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। भवानी कुर्सी पर बैठा था, अमर का हाथ पकड़े। अमर की आँखें बंद थीं। बीप धीमी हो रही थी। भवानी ने मेरी तरफ़ देखा।
"तू वापस आ गया?"
"तेरी बहन मिल गई।"
"कहाँ थी?"
"तू उसी से पूछ, जो तेरे पास बैठा है।" मैंने अपनी जेब से मोहन लाल का काग़ज़ निकाला और भवानी के सामने रख दिया।
भवानी ने काग़ज़ देखा। उसका चेहरा एक पल के लिए सफ़ेद पड़ गया। उसने अमर का हाथ छोड़ा और उठा।
"तूने ये कहाँ से लिया?"
"मोहन लाल के पास से।"
"मोहन —" भवानी के होंठ काँपे। "वो बूढ़ा अब तक ज़िंदा है?"
"ज़िंदा है। और उसने मुझे सब बता दिया। पाँच पीढ़ियों का हिसाब। तेरा होम। तेरा ठाकुर होना। और —" मैंने उसकी आँखों में देखा, "— तेरा बेटा जिस बीमारी से मर रहा है, वो तेरे पास देवेंद्र सिंह के कामों की वजह से आई है।"
भवानी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ बदला — जैसे कोई पुरानी दीवार अंदर से गिर रही हो।
"देवेंद्र सिंह," उसने धीरे से दोहराया। "तू उसका नाम ले रहा है?"
"क्यों? डर लगा?"
"मन्नू, वो आदमी —"
"वो मेरा बाप है।"
भवानी पीछे हटा। कुर्सी का पाया फ़र्श पर खिसका। अमर की मशीन तेज़ बजने लगी। बीप, बीप, बीप। भवानी ने पलटकर देखा, फिर मेरी तरफ़।
"तू — तू झूठ बोल रहा है।"
"मोहन लाल के काग़ज़ पर उसका हस्ताक्षर है। और मेरी माँ का नाम उसके नीचे लिखा है।"
भवानी ने काग़ज़ फिर पढ़ा। उसके हाथ काँप रहे थे।
"अगर ये सच है," उसने धीरे से कहा, "तो पिछले बीस साल में वो आदमी मेरे पास बैठा है, मेरे साथ खाना खाया है, मुझे ठाकुर बनाया है, और मैंने एक बार भी नहीं पूछा कि वो कौन है।"
"तूने नहीं पूछा क्योंकि तू पूछना नहीं चाहता था।"
भवानी ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे पहली बार देख रहा हो।
डॉक्टर सुमन अंदर आई। उसने मशीन की तरफ़ देखा और मुँह बदल गया। उसने फ़ौरन नर्स को बुलाया।
"ऑक्सीजन!" वो चिल्लाई। "जल्दी!"
दो नर्स दौड़कर आईं। भवानी ने अमर की तरफ़ देखा। अमर का सीना ऊपर-नीचे हो रहा था, जैसे साँस फँस रही हो।
"अमर!" भवानी दौड़कर अमर के पास पहुँचा। "अमर, बेटा —"
सुमन ने उसे पीछे खींचा। "हट जाओ, ठाकुर साहब।"
"मेरा बेटा —"
"मैं जानती हूँ!" सुमन ने उसकी तरफ़ देखा। "मैं जानती हूँ वो तुम्हारा बेटा है। पर अगर तुम यहाँ खड़े रहे, तो मैं उसे बचा नहीं पाऊँगी।"
भवानी एक कदम पीछे हटा। दरवाज़े के पास पहुँचा और ठिठक गया। अंदर जाने की हिम्मत उसके पैरों में नहीं थी। वो दरवाज़े के बाहर खड़ा था, एक हाथ दरवाज़े की चौखट पर, आँखें अंदर, पर शरीर बाहर।
मैं उसके पास पहुँचा।
"अंदर जा," मैंने कहा।
"मैं — मैंने इसे कभी नहीं देखा ऐसे।"
"तो अब दे
॥
भवानी अंदर गया। दरवाज़े की चौखट पर उसका हाथ रुक गया, जैसे किसी ने उसे पीछे से पकड़ लिया हो। फिर उसने हिम्मत की और कमरे के अंदर कदम रखा। सुमन ने एक नज़र उसे देखा और चुपचाप नर्सों को इशारा करके जगह बना दी।
भवानी अमर के बिस्तर के पास पहुँचा और कुर्सी खींचकर बैठ गया। मशीन की बीप अभी भी तेज़ थी, पर सुमन की दवा से अमर के सीने की हलचल धीमी हो रही थी। भवानी ने अपना हाथ बढ़ाया और अमर की उँगली पकड़ ली।
अमर की पलकें काँपीं। उसने आँखें खोलीं। धुँधलाहट में उसने भवानी का चेहरा देखा और होंठ हिलाए।
"तुम आए?"
भवानी ने कोई जवाब नहीं दिया। उसका गला भर आया था।
अमर ने धीरे-धीरे साँस लेकर कहा, "मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूँ। बस थक गया हूँ।"
भवानी का सिर नीचे झुक गया। उसकी कंधे हिलने लगे। पहली बार मैंने देखा कि ठाकुर भवानी सिंह रो रहा है — बिना आवाज़, बिना शोर, बस कपड़े की आस्तीन में मुँह छिपाकर, जैसे कोई बच्चा स्कूल के कोने में रोता है।
मैं दरवाज़े पर खड़ा था। भीतर जाने की हिम्मत मेरे पैरों में भी नहीं थी।
भवानी ने अमर का हाथ कसकर पकड़ा और कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली। अमर ने उसकी तरफ़ देखा और हल्की सी मुस्कान उभरी।
"डरो मत," अमर ने कहा। "मैंने सब काग़ज़ पढ़ लिए थे। मुझे पता था, तुम कौन हो। पर जब तक तुमने ख़ुद नहीं बताया, मैंने पूछा नहीं।"
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