The Token System866 / 1154

The Token System – Chapter 866

7 min read November 6, 2026

मैंने तीनों टोकन मुट्ठी में भींचे और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।

॥

लाठी फिर पड़ी और इस बार दरवाज़े का कुंडा हिल गया। भवानी अभी भी मेरी तरफ़ पीठ किए खड़ा था। मैंने कुछ नहीं सोचा — मेरी जेब से बंसी का दिया हुआ वो छोटा चाकू निकला जो उसने लाठी से बचाने के लिए दिया था, और मैं भवानी की कुर्सी के पीछे पहुँचकर एक ही झटके में रस्सी काट दी। मोटी रस्सी थी, दो बार और लगाना पड़ा।

"तेरा दिमाग़ ठीक है?" भवानी ने हाथ मलते हुए कहा।

"गाड़ी पीछे है," मैंने कहा। "खिड़की से। जल्दी।"

राजेंद्र दरवाज़े की तरफ़ भागा तो मैंने उसका बाज़ू पकड़ा। "तू बाहर मत जा। तेरे पास वर्दी है, तेरी गवाही कल है। अगर आज लाठी खाकर बैठ गया तो कल कौन बोलेगा?"

वो रुका। उसने एक बार भवानी को देखा, फिर मुझे।

"तीन मिनट," राजेंद्र ने कहा। "मैं इन्हें गलियारे में रोकता हूँ। तुम पीछे से निकलो।"

अमर की खिड़की पीछे के रास्ते पर खुलती थी। बंसी पहले से वहाँ था — वो सबसे पहले भागकर गाड़ी लाने गया था। मैंने खिड़की खोली, नीचे देखा। दो मंज़िल ऊपर था, पर पीछे की तरफ़ लोहे की एक सीढ़ी थी जिससे सफ़ाई वाले कर्मचारी उतरते थे। मैंने भवानी की तरफ़ हाथ बढ़ाया।

"मुझे नहीं उतरना," भवानी ने कहा।

"तेरे आदमी तेरा हिसाब बंद करने आए हैं। उनका हिसाब तू ख़ुद देगा या कल अदालत में काग़ज़ देगा?"

भवानी ने मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो भाव आया जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था — जैसे कोई आदमी पहली बार अपनी जेब से कुछ निकाल रहा हो जो उसने सालों से छिपाकर रखा था। वो खिड़की से उतरा। उमर से भारी था पर हाथ बढ़ाने में झिझका नहीं।

नीचे बंसी की पुरानी नीली गाड़ी खड़ी थी, इंजन चालू। हम तीनों पिछली सीट पर बैठे। बंसी ने गाड़ी घुमाई और अस्पताल के पीछे के रास्ते से निकल गया। मैंने पीछे देखा — दो सफ़ेद कुर्ते वाले तीसरी मंज़िल की खिड़की से नीचे झाँक रहे थे, पर गाड़ी पहले ही मोड़ पर थी।

"अच्छा है, हवा लगी," भवानी ने कहा और कमीज़ के बटन खोले। उसकी छाती पर पुराने निशान थे।

"कल तेरे ख़िलाफ़ तेरा ही आदमी बोलेगा," मैंने कहा। "तू बता, तेरा असली टोकन कहाँ से आया?"

भवानी ने गाड़ी की खिड़की से बाहर देखा। फिर बोला।

"मेरे दादा के पास दो चीज़ें थीं — एक टोकन, और एक बात। टोकन पुरानी हवेली की दीवार से निकला था, और बात ये थी कि जो इसे हाथ में ले, वो सिर्फ़ हिसाब चलाता है, काम ख़ुद नहीं करता।"

"तो तूने किया क्या?"

"पाँच पीढ़ियाँ, मन्नू। पाँच। मेरे दादा ने पहला काम किसी और से करवाया। उन्होंने उसे पैसा दिया और उसका हिस्सा अपने हाथ में रखा। फिर मेरे बाप ने वही किया। और फिर मैंने।"

"और टोकन चुप रहा?"

"नहीं। बोला।" भवानी ने उसकी तरफ़ देखा। "मेरे बाप को बोला था। उन्होंने मुँह फेर लिया। मुझे बोला — मैंने सुना नहीं। अब बेटे पर बोल रहा है।"

बंसी ने पीछे मुड़कर कहा, "और तू चुपचाप देखता रहा?"

"मैंने सोचा था, जो आदमी हिसाब का सच जान ले, वो ज़िंदा नहीं रह सकता। इसलिए मैंने हर काम बाहर से करवाया — किसी के बेटे का नाम काग़ज़ पर, किसी की ज़मीन हिसाब में, किसी का दस्तख़त दूसरे के हाथ से। मैंने सोचा, हाथ नहीं लगाऊँगा तो हिसाब मुझ पर नहीं चढ़ेगा।"

"पर चढ़ा," मैंने कहा।

"चार लाख छत्तीस हज़ार चढ़ा। और अब मेरे बेटे के नाम पर है।"

गाड़ी अस्पताल के फाटक पर रुकी। मैंने पीछे देखा — भवानी की आँखें भरी हुई थीं, पर वो मुँह दूसरी तरफ़ करके खिड़की से बाहर देख रहा था।

हम सीढ़ियों से चढ़े। ग्यारह नंबर कमरे के बाहर डॉक्टर सुमन खड़ी थी, हाथ में एक पर्ची थी। उसने मुझे देखा, फिर मेरे पीछे खड़े भवानी को।

"तुम ठीक हो?" सुमन ने पूछा।

"हाँ। अमर कैसा है?"

सुमन ने भवानी की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़।

"साँस की मशीन पर है। सुबह से दो बार उठा। अब बेहोश है। नाड़ी धीमी चल रही है।"

भवानी आगे बढ़ा। दरवाज़े के शीशे से अंदर देखा — अमर चारपाई पर पड़ा था, चेहरा सफ़ेद, नाक में नली, बगल में मशीन की लाल बत्ती जल रही थी। भवानी का हाथ दरवाज़े के हैंडल पर पहुँचा और रुक गया। उसने हाथ खींच लिया।

"अंदर जा," मैंने कहा।

"मैंने इससे आख़िरी बार तीन साल पहले बात की थी," भवानी ने कहा। "उस दिन मैंने कहा था — तू मेरा बेटा नहीं, मेरा हिसाब है।"

"तो आज जाकर कह — मैं तेरा बाप हूँ।"

भवानी ने मेरी तरफ़ देखा। उसके होंठ हिले पर आवाज़ नहीं निकली।

सुमन ने पर्ची मेरी तरफ़ बढ़ाई। "इलाज का खर्च बीस हज़ार, तीन दिन की मोहलत। दवा वाली कंपनी का आदमी कल सुबह आएगा।"

"कल सुबह," मैंने दोहराया।

मेरी जेब में तीन टोकन थे। मैंने हाथ जेब में डाला। मेरा अपना टोकन ठंडा था। भवानी का सपाट टोकन भी। अमर का टोकन — जो उसने कुछ देर पहले मुझे दिया था — मेरी उँगली के नीचे हल्का गरम हुआ। मैंने उसे बाहर निकाला। उस पर नई लकीर उभर रही थी, और उसके नीचे एक शब्द।

"बंसी," मैंने कहा। "तेरे पास कितने पैसे हैं?"

"चार हज़ार। दुकान का किराया देने के लिए रखे थे।"

"दे दे।"

"मन्नू —"

"दे दे। बाकी मैं देखता हूँ।"

बंसी ने जेब से मुड़ा हुआ नोटों का बंडल निकाला और मेरी हथेली पर रख दिया। मैंने सुमन की तरफ़ बढ़ाया।

"चार हज़ार अभी। बाकी सोलह कल दोपहर तक।"

सुमन ने नोट लिए और गिने। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।

"तू जानता है, मैंने इस कमरे में कितने लोगों को इसी हाल में देखा है, और कितनों के लिए ये काग़ज़ पूरे नहीं हुए?"

"मुझे पता है," मैंने कहा।

"तो सुन। अगर कल दोपहर तक पैसा नहीं आया, तो मशीन हटानी पड़ेगी। और मशीन हटने का मतलब —"

"मतलब मुझे पता है," मैंने कहा।

सुमन अंदर चली गई। भवानी अभी भी दरवाज़े के बाहर खड़ा था।

"सोलह हज़ार," उसने धीरे से कहा। "मेरे पास तो अब अपना खाता भी नहीं।"

"तेरे पास एक चीज़ है," मैंने कहा।

"क्या?"

"तेरा नाम। तेरे नाम पर शहर में ज़मीन है, होम है, दुकानें हैं। और कल अदालत में जब तू अपना बयान देगा, तो जज के सामने कह देगा कि तेरी सारी ज़मीन के काग़ज़ ज़ब्त हों और उन परिवारों को दी जाएं जिनसे तूने छीना है।"

भवानी ने मेरी तरफ़ देखा।

"और मेरे बेटे का इलाज?"

"वो रहेगा। क्योंकि वो तेरी कमाई नहीं, तेरा हिसाब है।"

भवानी ने एक लंबी साँस ली। फिर उसने दरवाज़े का हैंडल दबाया और अंदर गया। मैं बाहर खड़ा रहा। अंदर से मशीन की आवाज़ आ रही थी — बीप, बीप, बीप। भवानी चारपाई के पास पहुँचा, कुर्सी खींची और बैठ गया। उसने अमर का हाथ उठाया और अपनी हथेली में लिया।

मैंने मुँह दूसरी तरफ़ कर लिया।

बंसी मेरे पास आया। "अब तू क्या करेगा?"

"तेरे पास कोई काम है? ऐसा काम जिसमें आज सोलह हज़ार मिल जाए?"

बंसी ने सिर खुजाया। "इस वक़्त तो कुछ नहीं सूझ रहा।"

मेरी जेब में टोकन खटका। मैंने उसे जेब के बाहर निकाला। मेरा अपना टोकन — वो जिस पर आठ हज़ार का अंक था — उस पर एक नई लकीर उभर रही थी। और उसके नीचे एक शब्द। मैंने आँखें सिकोड़कर देखा। "राखी।"

"राखी?" बंसी ने कहा। "तेरी बहन का दूसरा नाम तो रीना है।"

"राखी," मैंने दोहराया। "माँ इसे राखी बुलाती थी।"

"तो टोकन क्या कह रहा है?"

"समझ नहीं आ रहा।"

तभी मेरी जेब में मोबाइल बजा। स्क्रीन पर माँ का नंबर था।

"मन्नू," माँ की आवाज़ काँप रही थी। "रीना स्कूल से नहीं आई।"

"क्या मतलब?"

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