The Token System – Chapter 865
लिफ़ाफ़े पर लिखा था— "खोलने से पहले सोच लेना।"
मैंने खोला। अंदर एक ही पंक्ति थी।
"अमर का इलाज टोकन से होगा या हाथ से— तय तू कर।"
बंसी ने मेरा हाथ पकड़ा। "क्या हुआ?"
मैंने उसे काग़ज़ दिया। वो पढ़कर रुक गया।
"मन्नू, ये तो… ये तो तेरे ही टोकन का सवाल है।"
"हाँ," मैंने कहा। "और जवाब में मेरा बाकी हिसाब दाँव पर है।"
हम अंदर गए। लिफ़्ट की तरफ़ नहीं, सीढ़ियों की तरफ़। क्योंकि मेरी जेब में दो टोकन थे और अमर की साँस एक मशीन पर चल रही थी।
और मुझे पता था कि आज रात जो भी फ़ैसला होगा, वो अदालत में नहीं, अस्पताल के एक कमरे में होगा।
दो तीन मंज़िल चढ़कर हम रुके। सीढ़ियों की रोशनी पीली और कम थी। मेरी साँस फूल रही थी, पर बंसी मुझसे आगे निकल गया। उसने दरवाज़े पर पहले से लगी पर्ची पढ़ी— "ग्यारह नंबर कक्ष, ज़्यादा लोग नहीं।"
"भीड़ मत करना," बंसी ने कहा। "मैं बाहर रुकता हूँ। अंदर जाकर कुछ ऐसा मत बोलना जिससे उसकी मशीन पर असर पड़े।"
मैंने कमरा खोला।
अमर बिस्तर पर था। उसका चेहरा उतना ही था जितना आख़िरी बार दिखा था— सफ़ेद, पतला, आँखों के नीचे काला। नाक में नलियाँ, हाथ में सुई। पास की मशीन धीरे-धीरे सीटी जैसी आवाज़ निकाल रही थी।
डॉक्टर मधु सिरहाने खड़ी थीं। उन्होंने मुझे देखा और उँगली से चुप रहने का इशारा किया। फिर बाहर आकर बोलीं— "तुम मन्नू हो?"
"हाँ।"
"इसने तुम्हारा नाम दो बार लिया। होश में नहीं था, पर नाम साफ़ बोला।"
मेरा गला सूख गया। "अब कैसा है?"
मधु ने दरवाज़े की तरफ़ देखा। "दवा शुरू कर दी है। असर हो रहा है, पर ज़रूरत का इलाज बहुत महँगा है। तीन दिन में हमें पूरा पैसा चाहिए, वरना जो चल रहा है, वो भी रुक जाएगा।"
"कितना?"
"बीस हज़ार।"
मैंने जेब में हाथ डाला। भवानी का टोकन मेरी हथेली में ठंडा बैठा था। मेरा अपना टोकन उसके ऊपर था, और उस पर अब भी वही आख़िरी लकीर थी।
"तीन दिन," मैंने कहा। "मैं इंतज़ाम करूँगा।"
मधु ने मेरे चेहरे को देखा। "तुम्हारी उम्र क्या है?"
"सोलह साल, लगभग।"
"और ये पैसा?"
"जुगाड़ है," मैंने कहा। "डॉक्टर साहब, आप बस इलाज रोकिए मत।"
वो हँसी नहीं। बस सिर हिलाया और कमरे के अंदर चली गई।
मैं उसके पीछे गया। अमर की उँगली हिली। उसने आँखें खोलीं और मुझे देखा। पहचानने में उसे दो पल लगे। फिर उसके होंठ हिले।
"तू आया।"
"आया तो हूँ। पर तू ऐसे लेटा है कि जैसे किसी और का ही काम कर रहा हो।"
उसके होंठों पर हल्की हँसी आई। "मेरे पास… और कुछ नहीं था।"
"चुप रह। साँस ले।"
वो साँस लेने लगा। मशीन की आवाज़ बदली। मधु ने मेरी तरफ़ देखा— "बस दो मिनट।"
"अमर," मैंने धीरे कहा। "तेरे बाप कल अदालत में होंगे। उन्होंने कहा कि मैं तुझे ये बता दूँ।"
अमर की आँखें भर आईं। उसने कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली। फिर उसने मेरा हाथ पकड़ा और उँगली से मेरी हथेली पर कुछ लिखा।
तीन अक्षर। "टोकन।"
"तेरे पास है?" मैंने पूछा।
उसने सिर हिलाया और तकिये के नीचे से कोई चीज़ निकाली। एक पीतल की गोली— मेरे वाले जैसी, पर इस पर निशान अलग थे। उसने उसे मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"ले जा। मेरे हिसाब में ये रहा तो… मैं मर जाऊँगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि इस पर चढ़ा हुआ है… मेरे बाप का कर्ज़। और कर्ज़ मैं उतार नहीं सकता।"
मैंने वो टोकन लिया। तीन टोकन अब मेरी जेब में थे।
तभी पीछे से आवाज़ आई— "तो अब तीन हो गए।"
मैं पलटा। दरवाज़े पर भवानी खड़ा था। पीछे राजेंद्र और दो सिपाही।
"तू यहाँ?" मैंने कहा।
"मुझे यहाँ आने से कोई रोक नहीं सकता," भवानी ने कहा। "मेरा बेटा यहाँ है।"
वो अंदर आया। मधु ने रोकना चाहा, पर भवानी ने हाथ उठाया— "डॉक्टर साहब, मैं कुछ नहीं करूँगा। बस देखने आया हूँ।"
वो अमर के पास खड़ा हुआ। उसने अपना हाथ बेटे के सिर पर रखा। अमर ने उसकी तरफ़ देखा भी नहीं। बस आँखें बंद कर लीं।
"देख," भवानी ने मेरी तरफ़ मुड़कर कहा। "तेरे हाथ में तीन टोकन हैं। एक मेरा, एक अमर का, एक तेरा। जोड़ ले— तीनों पर जो अंक हैं, वो मेरे किए हुए कामों का हिसाब है। और उसका आख़िरी हिसाब मैं नहीं उतार सकता।"
"क्यों?"
"क्योंकि हिसाब उतारने का मतलब होता है— ख़ुद करना। मैंने हर काम करवाया। आदमी से, वकील से, अपने बेटे से भी। अब जब उतारने की बारी आई, तो मेरे हाथ खाली हैं।"
उसने अपनी कलाई दिखाई। रस्सी के निशान अब भी लाल थे।
"तूने देखा, आज मेरे ही आदमियों ने मुझे बाँधा। मेरी अपनी सेना ने मुझे बेच दिया। पता है क्यों? क्योंकि सेना पैसे से चलती है, बात से नहीं। और मैंने पैसा ही दिया, बात कभी नहीं।"
मन्नू बंधन खोलने के लिए आगे बढ़ा था— नहीं, ये तो पहले हुआ। मैं ठीक यहीं रुका और बोला— "फिर तू भाग क्यों नहीं रहा?"
"क्योंकि भागने से मेरे बेटे का हिसाब और बढ़ेगा। मैंने सोचा था, मरकर उतार दूँगा। पर मरने से भी हिसाब बढ़ता है, मन्नू। ये बात मुझे आज पता चली।"
अमर ने करवट बदली और धीरे से बोला— "बापू।"
भवानी रुक गया।
"मुझे तेरा पैसा नहीं चाहिए। मुझे तू चाहिए।"
भवानी कुछ नहीं बोला। उसकी आँखें भर आईं। उसने मुँह दूसरी तरफ़ कर लिया।
"मेरा बेटा मर रहा है," उसने कमज़ोर आवाज़ में कहा, "और मैं जानता हूँ क्यों। मैंने उसकी माँ के इलाज के लिए पैसा दिया— पर वो पैसा किसी और के हिसाब से आया था। और जब हिसाब का वक़्त आया, तो मैंने अपने बेटे का नाम आगे कर दिया।"
मधु ने मेरी तरफ़ देखा। राजेंद्र ने भी। कमरे में कोई नहीं बोला।
"तेरा टोकन," भवानी ने मेरी तरफ़ देखकर कहा। "उस पर अब आठ हज़ार का अंक बचा है। आठ हज़ार। इतना तो मैं किसी काम से कमा नहीं सकता। और यही आख़िरी हिसाब है जो मैं ख़ुद नहीं चुका सकता।"
"तो क्या मैं चुका दूँ?" मैंने पूछा।
"तू चुका देगा तो तेरा हिसाब बढ़ेगा। पर तू अमर से मिलने आया है, इसलिए तुझे फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।"
मैंने तीनों टोकन निकाले और हथेली पर रखे। ठंडे, भारी, जैसे कोई पत्थर मेरी जेब से मेरी हथेली तक आ गया हो।
"मैं अमर से मिलने जा रहा हूँ," मैंने कहा। "डॉक्टर मधु से बात करूँगा। और तेरी सेना से नहीं, तेरे काम से बात करूँगा।"
भवानी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें भरी हुई थीं।
"इसीलिए मैं तुझे बुलाया," उसने कहा। "तू अकेला है जो उसे गिराए बिना ऊपर उठा सकता है।"
वो मुड़ा और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। राजेंद्र उसके पीछे चला। मैं अमर के पास बैठ गया और उसने मेरी तरफ़ देखा।
"तू क्यों आया?"
"क्योंकि तेरे बाप ने कहा था तेरा हिसाब बाकी है। मैं वो हिसाब उतारने आया हूँ।"
अमर हँसा। पहली बार। छोटी हँसी— जैसे कोई बंद कमरे में खिड़की खुल गई हो।
तभी बाहर से आवाज़ आई।
लाठी की। ज़ोरदार। दरवाज़े पर नहीं— गलियारे के दरवाज़े पर।
मैं उठ खड़ा हुआ। बंसी अंदर घुसा, चेहरा लाल।
"मन्नू, वो वकील है। नीचे से आ रहा है। कह रहा है— भवानी को ज़िंदा नहीं छोड़ेगा।"
राजेंद्र भागकर बाहर गया। मैंने भवानी को देखा— वो दरवाज़े पर खड़ा था, पीठ मेरी तरफ़।
"तू रुक," मैंने कहा। "तू अंदर रह।"
भवानी मुड़ा। उसके चेहरे पर डर नहीं था।
"मन्नू," उसने कहा, "अगर वो मुझे नहीं छोड़ेगा, तो उसका हिसाब भी यहीं बंद होगा। और मैं चाहता हूँ कि वो हिसाब तेरे हाथ से बंद हो।"
लाठी फिर पड़ी। इस बार दीवार पर। प्लास्टर टूटकर गिरा।
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