The Token System – Chapter 86
रीना लौटी। हाथ सूखे हुए। उसने मीना को गोद में उठाया और सुमन के साथ ऊपर चली गई।
मैं नीचे बरामदे में बैठ गया। माँ मेरे पास बैठीं। थर्मस खुला रहा।
करीब आधे घंटे बाद रीना उतरी। मीना उसकी गोद में सो रही थी, सिर कंधे पर।
“माँ ठीक हैं,” रीना ने धीरे से कहा। “सुमन दीदी ने कहा — अगले चार दिन वार्ड में रहेगी, फिर छुट्टी।”
“पैसे?”
“सुमन दीदी बोलीं — काग़ज़ मेरे नाम से बन गए हैं। सरकारी।”
मैंने राहत की साँस ली। तभी मेरी जेब भारी लगी। मैंने हाथ डाला।
पाँच हज़ार। नए नोट, गिने हुए, बंडल में। मैंने उन्हें गिना — दस के पाँच सौ के नोट। ठीक पाँच हज़ार।
माँ ने देखा। कुछ नहीं पूछा। बस चाय का ढक्कन वापस थर्मस पर रख दिया।
मैंने जेब में हाथ दोबारा डाला। टूटा कोना गरम था — पहली बार कई दिनों में। मैंने उसे बाहर निकाला। उस पर लकीरें उभरी थीं। पुरानी लकीर मिट चुकी थी, नई आई थी — “इस काम का हिस्सा बंटा।”
और उसके नीचे अंक — तीन सौ, अब ढाई सौ।
मैंने कोना वापस जेब में रखा।
“पाँच हज़ार,” माँ ने कहा। “इसका हिसाब?”
“यह उसी औरत के इलाज का हिस्सा है,” मैंने कहा। “जो बच गया।”
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। फिर बोलीं — “तो इसका कुछ हिस्सा उस औरत को भी देना पड़ेगा।”
मैंने सिर हिलाया। यही तो टोकन का नियम था, जो मैं अब समझ रहा था।
तभी सुमन नीचे आई। उसने मेरे पास आकर धीरे से कहा — “दो मिनट। अकेले।”
मैं उसके पीछे अस्पताल के पीछे वाले बरामदे में गया। वहाँ कोई नहीं था।
सुमन ने दीवार से पीठ टिकाई। “आज तूने जो किया, वही भवानी करता था।”
“मैंने क्या किया?”
“मरीज़ को बचाया। बिना काग़ज़ की परवाह किए।” उसने मेरी तरफ़ देखा। “पर फ़र्क़ यह है — भवानी ने यह काम बीस साल पहले शुरू किया था। मरीज़ चुनता, होम भेजता, हिसाब रखता।”
“और उसका टोकन?”
सुमन ने गहरी साँस ली। “मैं नहीं जानती टोकन क्या है। पर मैं इतना जानती हूँ — भवानी ने जिसको भी बचाया, उसका हिस्सा कभी किसी को नहीं दिया। सब अपनी जेब में रखा।”
“तो?”
“तो उसका हिसाब भारी है।” सुमन ने मेरी आँखों में देखा। “और तेरा आज साफ़ हुआ। तूने पाँच हज़ार कमाए, पर उसमें से अस्पताल का, दवा का, बच्ची के खाने का — सबका हिस्सा निकलेगा। तेरे हाथ में जो बचेगा, वही तेरा।”
मैं चुप रहा।
“मधु को मैं कल मुख्य चिकित्सा अधिकारी के सामने ले जाऊँगी,” सुमन ने कहा। “पर उसके पास भवानी का सहारा है। मेरा तबादला आज डाक में है।”
“रुक जाएगा।”
“कैसे?”
मैंने जेब से टूटा कोना निकाला। सोचा — नहीं, यह नहीं दिखा सकता। मैंने वापस रख लिया।
“काग़ज़ से,” मैंने कहा। “हवेली के काग़ज़, भवानी का हिसाब, और मधु के हस्ताक्षर। कल सुबह आठ बजे हवेली के मैदान में सब जुट रहे हैं। तू भी आ।”
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। “कल मेरी ड्यूटी है।”
“ड्यूटी से पहले। सात बजे।”
वह मुस्कुराई — पहली बार। “देखती हूँ।”
मैं लौटा तो रीना बरामदे में बैठी थी, मीना उसकी गोद में सो रही थी। माँ थर्मस समेट रही थीं।
रीना ने मेरी तरफ़ देखा और होंठ दबाकर हँसी।
“क्या?”
“कुछ नहीं।” उसने मीना के बाल सहलाए। “बस सोच रही हूँ — तू चोरी-चोरी काम करता है, फिर पकड़ा जाता है, फिर मैं सुनती हूँ।”
“मैंने कुछ नहीं छिपाया।”
“अच्छा?” उसने भौंह उठाई। “तो पाँच हज़ार कहाँ से आए?”
मैं चुप रहा।
“देख,” रीना ने धीरे से कहा, “मुझे तेरे टोकन-वोकन से मतलब नहीं। पर जो पैसा आए, उसका हिसाब रख। शादी में जो लिफ़ाफ़ा तू देगा, वो साफ़ होना चाहिए।”
“होगा,” मैंने कहा।
माँ उठीं। “मैं चलती हूँ। रास्ते में सब्ज़ी लेनी है।”
“माँ, मैं छोड़ आता हूँ।”
“नहीं।” उन्होंने थर्मस मेरे हाथ में दिया। “तू बच्ची के पास बैठ। मैं ऑटो से चली जाऊँगी।”
वह चली गईं। मैं बरामदे में बैठा रहा। मीना की साँस धीमी थी, मुँह आधा खुला।
तभी मेरा फ़ोन बजा। बंसी।
“मन्नू, नीचे आ।”
“क्या हुआ?”
“वो औरत — मधु — भवानी के दो आदमियों के साथ अस्पताल के पिछले गेट पर खड़ी है। कुछ काग़ज़ दिखा रही है गार्ड को। लगता है वार्ड का रजिस्टर माँग रही है।”
मैं उठा। रीना ने मीना को संभाला। “क्या हुआ?”
“तू यहीं रह। मैं देखकर आता हूँ।”
मैं नीचे भागा। पिछले गेट पर बंसी खड़ा था, हाथ में चाय का गिलास। सामने मधु थी, उसके पीछे दो आदमी।
“रजिस्टर मेरा है,” मधु गार्ड से कह रही थी। “मैं इस वार्ड की सलाहकार हूँ।”
“सलाहकार नहीं,” मैंने कहा। “आपने काग़ज़ पर हस्ताक्षर किए थे, पर सुमन ने वो काग़ज़ अपनी मेज़ पर रख लिया है।”
मधु पलटी। उसकी आँखें तेज़ थीं।
“तुम बहुत बोलने लगे हो, मन्नू।”
“काम सीख रहा हूँ,” मैंने कहा।
वह मेरे करीब आई। इतनी करीब कि उसकी साँस मेरे चेहरे पर लगी।
“कल सुबह अदालत में तुम्हारे पास क्या है? कुछ काग़ज़, एक बूढ़ी औरत, एक चायवाला।” उसने होंठ सिकोड़े। “भवानी सिंह के पास चार वकील हैं।”
“तो आप क्यों डर रही हैं?”
वह ठिठकी।
बंसी ने बीच में आकर कहा — “मैडम, यहाँ खड़े-खड़े धूप लग रही है। आपकी गाड़ी कहाँ है?”
मधु ने उसे देखा। फिर मुझे। फिर मुड़कर चल पड़ी। दो आदमी पीछे।
बंसी ने गिलास से चाय का घूँट लिया। “यह औरत ख़तरनाक है।”
“पता है।”
“नहीं, तू नहीं समझा।” उसने मेरी तरफ़ देखा। “वो भवानी की गाड़ी में बैठकर आई थी। मैंने नंबर प्लेट देखी — वही सफ़ेद गाड़ी जो कल हवेली के बाहर खड़ी थी।”
मैं कुछ सोचने लगा। तभी ऊपर से रीना की आवाज़ आई — “मन्नू! बच्ची उठ गई है, तुझे ढूँढ रही है।”
मैं ऊपर गया। मीना बरामदे में खड़ी थी, बाल बिखरे, आँखें फुली।
“तुम गए थे?” उसने पूछा।
“गया था, आ गया।” मैंने उसे गोद में उठाया। “अब तू माँ से मिलने चल।”
वार्ड में मीना की माँ जाग रही थीं। बच्ची को देखकर उनकी आँखें भर आईं। मीना बेड पर चढ़ गई, माँ से लिपट गई।
मैं बाहर आया। रीना गलियारे में खड़ी थी।
“पाँच हज़ार,” उसने कहा। “उसमें से कितना अस्पताल का है?”
“मैं सोच रहा हूँ — दो हज़ार इलाज में, एक हज़ार बच्ची के कपड़े और किताब में। दो हज़ार उसकी माँ को, जब वो ठीक हो जाए।”
रीना ने मेरी तरफ़ देखा। “और तेरे पास?”
“कुछ नहीं बचेगा।”
“तो तेरा हिस्सा क्या हुआ?”
मैं चुप रहा।
“यही तो,” रीना ने कहा। “तू कमाता है और बाँट देता है।” वह हँसी। “कम से कम शादी के लिफ़ाफ़े के लिए कुछ बचा।”
“बचाऊँगा।”
“देखते हैं।” उसने मेरी बाँह पकड़ी। “अब चल, मुझे स्कूल जाना है। बच्ची माँ के पास रहेगी।”
वह चली गई। मैं वार्ड में लौटा। मीना की माँ मेरी तरफ़ देखकर बोलीं — “तुमने मुझे बचाया।”
“डॉक्टर ने बचाया,” मैंने कहा।
“डॉक्टर को तुमने बुलाया।” उन्होंने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया। “जो कुछ भी तुम कर रहे हो उस औरत के ख़िलाफ़, मेरी दुआ है।”
मैंने सिर हिलाया और बाहर आ गया।
शाम को मैं बंसी की दुकान पर बैठा था। दुकान बंद होने का वक़्त था, पर बंसी बैठा था, हिसाब मिला रहा था।
“कल सुबह आठ बजे,” उसने कहा। “सब आएँगे।”
“मधु की खबर?”
“वो भी आएगी। भवानी उसे अकेला नहीं छोड़ेगा।”
मैंने जेब से टूटा कोना निकाला। ठंडा था। अंक ढाई सौ पर टिका था।
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