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The Token System – Chapter 85

6 min read November 6, 2026

रीना ने मेरा हाथ पकड़ा। “कहाँ?”

“अस्पताल। वार्ड तीन।”

“मैं भी चलूँ?”

“तू बच्ची के साथ रह।” मैंने जूते पहने। “मैं सुमन को फ़ोन करता हूँ।”

सुमन का नंबर मेरे पास था, शेखर बाबू ने एक बार दिया था। घर के बाहर निकलकर मैंने मिलाया। तीन बार बजा, फिर आवाज़ आई — “हाँ?”

“सुमन, मन्नू बोल रहा हूँ। वार्ड तीन में एक औरत है, मीना की माँ। उसके काग़ज़ में कुछ गड़बड़ है।”

“क्या गड़बड़?”

“कोई सफ़ेद कोट वाली औरत उसे भवानी के होम भेजने की सलाह दे रही है। उसके कोट पर भवानी होम लिखा है।”

फ़ोन पर दो सेकंड चुप्पी रही।

“मैं पंद्रह मिनट में पहुँच रही हूँ,” सुमन ने कहा। “तू वार्ड के बाहर खड़ा रह। अंदर अकेला मत घुसना।”

“क्यों?”

“क्योंकि अगर वो औरत वहाँ है, तो उसके आदमी भी होंगे।”

मैंने फ़ोन रखा और सीधे अस्पताल की तरफ़ चल पड़ा। रास्ते में बंसी की दुकान पड़ती थी, तो मैंने दो मिनट के लिए रुककर उसे सब बता दिया। बंसी ने एप्रन उतारा और चाय का गिलास वहीं छोड़ दिया।

“तू जा,” उसने कहा। “मैं पीछे से आता हूँ। अगर मेरी ज़रूरत पड़ी तो फ़ोन कर देना।”

अस्पताल के फाटक पर पहुँचते-पहुँचते मेरी कमीज़ पसीने से भीग गई थी। इमरजेंसी के बाहर मरीज़ों के परिवार बैठे थे। मैं सीढ़ी चढ़कर वार्ड तीन के बाहर पहुँचा। दरवाज़े पर एक नर्स खड़ी थी।

“मरीज़ से मिलना है?”

“हाँ। गंगा जी से।”

नर्स ने रजिस्टर देखा। “नाम?”

मैं रुक गया। मुझे औरत का नाम नहीं पता था।

“मीना की माँ,” मैंने कहा। “बच्ची स्कूल में पढ़ती है।”

नर्स ने मुझे ऊपर से नीचे देखा और दरवाज़ा खोल दिया।

वार्ड में आठ बेड थे। छह भरे हुए। मीना की माँ तीसरे बेड पर थीं, खिड़की के पास। चालीस के आसपास की औरत, चेहरा पीला, होंठ सूखे। उनके सिरहाने एक कुर्सी थी जिस पर कोई बैठा था — पीठ मेरी तरफ़ थी, सफ़ेद कोट, बाल बँधे हुए।

मैं दरवाज़े के पास ही रुक गया।

औरत ने मीना की माँ का हाथ थामा हुआ था और धीरे से बोल रही थी — “देखो, यहाँ बेड कल तक खाली नहीं रहेगा। तुम्हारी हालत में इलाज महीने भर चलेगा। सरकारी में दवा के लिए लाइन में लगना पड़ेगा। मेरे होम में सब मिल जाएगा।”

“मेरे पास पैसे नहीं हैं,” मीना की माँ ने कहा। आवाज़ कमज़ोर थी।

“पैसे की बात बाद में। पहले तुम ठीक हो जाओ।”

मैंने दरवाज़ा पूरा खोल दिया। कुर्सी चरमराई। औरत पलटी।

चालीस-पैंतालीस की रही होगी। चेहरा गोरा, आँखें तेज़। कोट की जेब पर नीले धागे से कढ़ा हुआ था — भवानी नर्सिंग होम।

“आप कौन हैं?” उसने पूछा।

“मैं इस अस्पताल में काम करता हूँ,” मैंने कहा। “एक्स-रे टेक्नीशियन।”

“तो मरीज़ के पास क्यों आए हो?”

“इनकी बच्ची स्कूल में अकेली रो रही थी। मैं उसे घर ले गया। अब उसकी माँ से मिलने आया हूँ।”

औरत की आँखें सिकुड़ीं। “बच्ची कहाँ है?”

“मेरे घर पर। मेरी बहन के पास।”

वह उठ खड़ी हुई। कुर्सी पीछे सरकी। “तुमने बच्ची को अपने घर क्यों ले जाया? उसकी मौसी है, पड़ोसन है।”

“स्कूल के गेट पर कोई नहीं था। मैडम ने मुझे बुलाया था।”

उसने मेरी तरफ़ एक कदम बढ़ाया। “तुम मन्नू हो न? वही जो भवानी सिंह के ख़िलाफ़ काग़ज़ जोड़ रहा है?”

मैंने जवाब नहीं दिया।

“सुनो,” उसकी आवाज़ नरम पड़ी, पर आँखें वैसी ही रहीं। “मैं इस औरत को अच्छी जगह ले जा रही हूँ। तुम अपना काम करो, मेरा मत बिगाड़ो।”

“आपका नाम क्या है?”

वह ठिठकी।

तभी पीछे से दरवाज़ा खुला और सुमन अंदर आई। सफ़ेद कोट, हाथ में स्टेथोस्कोप। उसने वार्ड में एक नज़र घुमाई और सीधे उस औरत के सामने जाकर खड़ी हो गई।

“तुम यहाँ क्या कर रही हो, मधु?”

औरत का चेहरा बदला। “मरीज़ देखने आई हूँ। मेरा भी तो फ़र्ज़ है।”

“यह मरीज़ मेरे वार्ड का है।” सुमन ने बेड की तरफ़ इशारा किया। “और इसके काग़ज़ पर मेरा दस्तख़त है। तुमने इसे भवानी के होम की सलाह किस हक़ से दी?”

“मैंने सिर्फ़ सलाह दी थी। मजबूरी नहीं।”

“सलाह नहीं, तुमने डराया है इसे।” सुमन ने मीना की माँ की तरफ़ देखा। “दीदी, आपने मुझे क्यों नहीं बताया?”

मीना की माँ ने आँखें नीची कर लीं। “डर लगा था। बच्ची अकेली है।”

सुमन पलटी। “मधु, तुम बाहर चलो। मुझे तुमसे दो शब्द बात करनी है।”

मधु हिली नहीं। “मैं डॉक्टर हूँ, सुमन। तुम मुझे ऐसे नहीं हटा सकती।”

“इस वार्ड में मैं ड्यूटी पर हूँ। और मेरे वार्ड से किसी मरीज़ को बाहर भेजने का हुक्म तुम्हारे पास नहीं है।” सुमन का स्वर सपाट था। “बाहर। अभी।”

मधु ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था — ग़ुस्सा नहीं, हिसाब। जैसे वह मन में कुछ जोड़ रही हो।

वह जाने लगी। दरवाज़े पर रुककर बोली — “सुमन, तुम्हारा तबादला आज डाक में आ रहा है। बाड़मेर। सोच लो।”

और चली गई।

सुमन ने दरवाज़ा बंद किया। फिर मीना की माँ के पास कुर्सी खींचकर बैठी और उनका हाथ पकड़ा।

“अब कोई तुम्हें नहीं ले जाएगा,” उसने कहा। “जब तक मैं इस वार्ड में हूँ, तुम्हारा काग़ज़ मेरी मेज़ पर रहेगा।”

मैं बाहर आया। गलियारे में मधु दूर जा रही थी, उसके साथ दो आदमी चल पड़े थे जो पहले दीवार के पास खड़े थे। मैंने उन्हें पहचाना — भवानी के आदमी, काली शर्ट वाले।

मैंने सुमन का इंतज़ार किया। वह पाँच मिनट में बाहर आई, चेहरा लाल।

“मधु भवानी के होम में ड्यूटी करती है। पर उसके काग़ज़ में लिखा है — सरकारी अस्पताल से मिली छुट्टी पर।” सुमन ने दीवार से पीठ टिकाई। “यानी वह दोनों जगह घूमती है। मरीज़ चुनती है, होम भेजती है, और हर मरीज़ पर उसका हिस्सा बनता है।”

“तुम उसे जानती हो?”

“एमबीबीएस में साथ थीं।” सुमन ने मुँह फेरा। “वह टॉपर थी। अब यह कर रही है।”

“तुम उसे रोक क्यों नहीं सकती?”

“काग़ज़ चाहिए।” सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। “और तुम्हारे पास जो काग़ज़ हैं, वो अभी अदालत में नहीं गए।”

तभी मेरा फ़ोन बजा। रीना का नंबर।

“मन्नू, बच्ची रो रही है। माँ से मिलना है। मैं उसे लेकर अस्पताल आ रही हूँ।”

“लेकिन वार्ड में बच्चों को नहीं…”

“मैं गेट पर रुक जाऊँगी। तू नीचे आ जा।”

मैं नीचे गया। दस मिनट में रीना ऑटो से उतरी, मीना का हाथ पकड़े। बच्ची की आँखें सूजी थीं।

“मम्मी ठीक हैं,” मैंने कहा। “ऊपर हैं। तू मिल सकती है, पर पहले हाथ धो।”

रीना ने मीना को मेरे पास छोड़ा और खुद अस्पताल के पीछे पानी की टोटी पर गई। मीना मेरे पैरों से लिपट गई।

“डर मत,” मैंने कहा। “मैं हूँ ना।”

तभी एंट्रेंस के दरवाज़े से माँ आती दिखीं। हाथ में थर्मस। साड़ी का पल्लू कंधे पर। उन्होंने मुझे और बच्ची को देखा और कुछ नहीं पूछा, बस थर्मस मेरे हाथ में देकर बोलीं — “चाय पी। चेहरा देखकर लग रहा है सुबह से कुछ नहीं पिया।”

“माँ, तुम कैसे आईं?”

“रीना ने फ़ोन किया था।” उन्होंने मीना के सिर पर हाथ रखा। “यह किसकी बच्ची है?”

“एक औरत की। वार्ड तीन में।”

माँ ने ऊपर की तरफ़ देखा। कुछ सोचा। फिर बोलीं — “जिस औरत को भवानी के होम भेज रहे थे?”

मैं चौंका। “तुम्हें कैसे पता?”

“बंसी ने दुकान पर बताया। वह भी आया है, नीचे बैठा है।” माँ ने थर्मस का ढक्कन खोला। “मैं अंदर नहीं जाऊँगी। पर चाय यहीं रख रही हूँ। जब वो औरत ठीक हो जाए, तब उसे पिला देना।”

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