The Token System – Chapter 87
“इस काम का हिस्सा बंटा,” मैंने धीरे से पढ़ा।
“क्या कहा?”
“कुछ नहीं।”
तभी मेरा फ़ोन बजा। अजनबी नंबर। मैंने उठाया।
“मनोहर?” औरत की आवाज़ थी।
“हाँ। कौन?”
“मैं मधु बोल रही हूँ।”
मैं चुप रहा। बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
“कल अदालत में तुम्हारे पास जो काग़ज़ हैं, उनमें एक काग़ज़ ऐसा है जिस पर मेरा नाम है।” उसकी आवाज़ पहले से धीमी थी। “वो काग़ज़ मुझे चाहिए। बदले में जो कहो, दूँगी।”
“क्यों?” मैंने पूछा।
“क्योंकि उस पर मेरे पिता का नाम भी है।”
फ़ोन कट गया।
मैंने फ़ोन जेब में रखा। बंसी ने गिलास धोते हुए पूछा — “क्या बोली?”
“कहा कि उसके पास भी कोई राज़ है।”
बंसी ने गिलास उलटकर रखा। “कल सुबह सब पता चलेगा।”
मैं उठा। घर की तरफ़ चल पड़ा। रास्ते में टूटा कोना जेब में ठंडा ही रहा। पर मुझे लगा — जो आज हुआ, वह किसी हिसाब का हिस्सा था। पाँच हज़ार आए, बँट गए। और टोकन पर अंक ढाई सौ हो गया।
घर पहुँचा तो माँ चूल्हे पर रोटी बना रही थीं।
“कल सुबह जल्दी उठना है,” मैंने कहा।
“कितनी जल्दी?”
“सात बजे हवेली पहुँचना है।”
माँ ने तवा उठाया। “तो अभी सो जा।”
मैं चारपाई पर लेटा। दीवार पर टूटा कोना रखा था। अंधेरे में उस पर कोई लकीर नहीं दिख रही थी। पर जेब में टोकन की जगह जो काग़ज़ था, वह मुझे ठंडा लग रहा था — जैसे कल सुबह से पहले कुछ और आने वाला हो।
॥
चारपाई पर पड़े-पड़े मैंने तीन बार करवट बदली। नींद आने का नाम नहीं ले रही थी। दीवार पर रखा टूटा कोना अंधेरे में भी कुछ कह रहा था, पर मैं सुनना नहीं चाहता था।
दस बजे के करीब मेरा फ़ोन बजा। बंसी का नंबर था।
“दुकान पर आ जा।” उसकी आवाज़ अजीब थी। “अभी।”
“सुबह क्या मैं नहीं आने वाला?”
“अभी आ जा, मन्नू। मैं बंद करके बैठा हूँ। बस एक लालटेन जल रही है। और तुझसे कुछ कहना है जो मैंने आज तक किसी को नहीं कहा।”
मैंने फ़ोन रखा। माँ सो चुकी थीं। मैं चुपचाप चप्पल पहनकर बाहर निकला।
मोहल्ले की गलियाँ इस वक़्त खाली थीं। दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे। बंसी की दुकान का शटर आधा गिरा हुआ था। अंदर से पीली रोशनी की एक झलक बाहर आ रही थी।
मैंने शटर उठाया और अंदर घुसा। बंसी लकड़ी के स्टूल पर बैठा था। सामने मेज़ पर एक लालटेन जल रही थी। पास में दो कटोरी रखी थीं। दुकान में चाय की खुशबू फैली थी, पर पत्ते और शक्कर की महक से अलग, कुछ और भी था आज — जैसे बंद कमरे की बासी हवा।
“बैठ।” उसने कटोरी मेरी तरफ़ सरकाई।
मैं बैठ गया।
“कल सुबह अदालत जाने से पहले,” बंसी ने कटोरी उठाई, “तू एक बात जान ले।”
“क्या?”
“भवानी का न्योता।”
मैंने चाय की चुस्की ली।
“तुझे पता है भवानी हर नए आदमी को पहले क्या देता है?”
“पैसा।”
“नहीं।” बंसी ने कटोरी नीचे रखी। “वो पहले एक छोटा काम देता है। इतना छोटा कि आदमी सोचे — अरे, यह तो कुछ भी नहीं है।”
मैं चुप रहा।
“फिर जब वो काम हो जाता है, तब भवानी उसी काम में एक गड़बड़ डाल देता है। छोटी सी। किसी का नुक़सान। कोई हस्ताक्षर। कोई तारीख़। और वो गड़बड़ उस आदमी के सिर चढ़ा देता है।”
“मतलब?”
“मतलब — अब वो आदमी भवानी का हो गया। वो निकलना चाहे तो नाम निकल जाएगा, शादी टूट जाएगी, बच्चे का स्कूल से नाम कट जाएगा। समझा? वो आदमी ज़िंदगी भर भवानी की शर्ट के बटन जैसा रहता है — दिखता नहीं, पर बिना उसके पहना नहीं जाता।”
मैंने कटोरी रखी।
“तूने भी वही काम किया था?” मैंने पूछा।
बंसी मेरी तरफ़ देखने लगा। लालटेन की लौ उसके चेहरे पर काँप रही थी।
“मैंने तहसील में काम किया था। क्लर्क था। काग़ज़ आते थे, दस्तख़त होते थे। भवानी का पहला न्योता यही था — भाई, एक काग़ज़ पर सिर्फ़ नाम का स्पेलिंग ठीक कर देना। मैंने सोचा, क्या बड़ी बात है। दो मिनट का काम है।”
“और फिर?”
“फिर वो स्पेलिंग दो ज़मीनों का रास्ता बदल गया।” बंसी ने कटोरी खत्म की। “दस साल बाद जब उसका हिसाब मेरे सिर आया, तब समझा। मेरे पिता का दो हज़ार का कर्ज़ था भवानी पर। उसने उसी दिन माफ़ कर दिया — जिस दिन मैंने कन्हैया माली का काग़ज़ बदला।”
मैंने कुछ कहना चाहा, पर वो बोलता रहा।
“तू सोचता है मैंने दुकान क्यों खोली? क्योंकि यहाँ आकर मैं खुद को यह कह सकता था कि अब मैं भवानी का आदमी नहीं हूँ। चाय बेचता हूँ, अपना हिसाब रखता हूँ। पर कल जब अदालत में खड़ा होऊँगा, तब पता चलेगा कि मैं किस हिसाब से निकला।”
“तो क्या करना चाहिए?” मैंने पूछा।
“भवानी के न्योते को हाँ मत कहना।” बंसी ने मेरी तरफ़ उँगली उठाई। “एक बार हाँ कह दिया, तो हिसाब तेरे सिर बैठेगा, चाहे तू कुछ भी कर ले। मैंने तुझे यह बात इसलिए बताई कि कल अदालत में भवानी तुझे आख़िरी बार न्योता देगा। सबके सामने। और वो न्योता सुनने में इतना मीठा होगा कि तेरी बहन भी कहेगी — ले ले, भाई।”
“रीना ऐसा नहीं कहेगी।”
“तेरी बहन अच्छी है।” बंसी मुस्कुराया। “पर भवानी का न्योता अच्छे-अच्छों को हिला देता है।”
लालटेन की लौ एक बार फिर काँपी। बाहर से हवा आई और शटर के पीछे किसी का साया गुज़रा। बंसी ने सिर उठाया। हम दोनों चुप हो गए।
साया चला गया। बंसी ने लंबी साँस ली।
“दूसरी बात,” उसने कहा। “कल अदालत में सबसे पहले मैं गवाही दूँगा।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“तूने कहा था — वो वकील तेरे काग़ज़ों पर रोक लगवा देगा। तो मैं पहला गवाह बनूँगा। मेरे पास वो पुराना रजिस्टर है जो बद्री लाया था। उस रजिस्टर में भवानी के पिता के दस्तख़त हैं। मैंने वो दस्तख़त अपनी आँखों से देखे थे, तीस साल पहले, तहसील के उसी कमरे में।”
“तू गवाही देगा?” मैंने पूछा। “तेरे ख़िलाफ़ भी तो केस बन सकता है।”
“बने।” बंसी ने कंधे उचकाए। “मैंने अपना हिसाब देख लिया। अब भवानी का देखना है।”
वो उठा और पीछे से एक पुरानी रबर की चप्पल लेकर आया। फिर बाहर जाकर दुकान के सामने रखे पुराने बोर्ड को देखने लगा। बोर्ड पर आज भी चाक से लिखा था — बंसी की दुकान। हवा और बारिश से अक्षर घिस गए थे, पर पढ़े जा सकते थे।
“यह बोर्ड मेरे पिता ने लगवाया था,” बंसी ने कहा। “भवानी के न्योते से पहले।”
मैं उसके पास खड़ा हो गया।
“कल तेरे साथ अदालत चलूँगा,” मैंने कहा। “गवाही दे। मैं तेरे पीछे खड़ा रहूँगा।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था।
“तेरे पीछे मैं खड़ा रहूँगा,” उसने कहा। “तू अदालत में पहले जाएगा।”
फिर उसने लालटेन उठाई और उसे बुझाने लगा।
“एक बात और,” उसने कहा। उसकी आवाज़ लालटेन की लौ से भी धीमी थी। “कल अदालत में भवानी एक आख़िरी कार्ड खेलेगा।”
“कौन सा?”
“वो कार्ड तेरे अपने घर से आएगा।”
मेरे हाथ से कटोरी छूट गई। मिट्टी का टुकड़ा फ़र्श पर गिरकर टूट गया। आवाज़ हुई — टक। बंसी ने लालटेन बुझा दी और अंधेरा हो गया।
“क्या मतलब?” मैंने अंधेरे में पूछा।
“मतलब मैं नहीं जानता।” उसकी आवाज़ आई। “यह बात भवानी के एक आदमी ने आज शाम मुझे चाय पिलाकर कही थी। उसने कहा — बंसी, कल तुझे अदालत में अच्छा तमाशा देखने को मिलेगा। भवानी आख़िरी कार्ड घर से निकालेगा।”
“कौन था वो आदमी?”
“नाम नहीं बताया। काले कुर्ते में था। जाते-जाते यह भी कहा कि तेरी बहन की शादी का लिफ़ाफ़ा तैयार है, बस तेरे हाथ में है।”
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