The Token System – Chapter 855
बंसी ने गाड़ी स्टार्ट की। "तू सीधा बोल ना।"
"हवेली की पुरानी ज़मीन पर जो कुआँ है — वही।"
हमने गाड़ी घुमाई। उमरान का पोता भागकर आया और खिड़की से मेरा हाथ पकड़ा। "मेरे दादा को ले आओ। अगर उन्हें कुछ हो गया तो…"
"तुम यहीं रहो। किसी को कुछ मत बताना। अगर दादा जी का कोई और भी पता लगाने आए, तो उन्हें वही बताना जो दादा जी ने कहा था।" मैंने उसका हाथ खोला और पीछे मुड़ा। "और ये काग़ज़ मेरे पास है। अब किसी को देने की ज़रूरत नहीं।"
अदालत की तरफ़ जाते वक़्त बंसी ने कहा, "दो बजे तक का वक़्त है। हरीश चंद्र को बताना पड़ेगा।"
"बताऊँगा।"
"और भवानी को?"
"भवानी को नहीं। भवानी से अब कुछ नहीं माँगना है।" मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा था। "जो पूछेगा, उसको कह देंगे — हम गवाह को ढूँढ रहे हैं।"
"और टोकन पर कुछ?"
मैंने टोकन निकाला। सतह पर कुछ नहीं था। सिर्फ़ मेरी हथेली की गरमाहट।
"अभी नहीं," मैंने कहा।
बंसी ने गाड़ी की रफ़्तार बढ़ाई।
अदालत का आँगन अब भर गया था। बाहर खड़े लोगों की भीड़ दरवाज़े तक फैली थी, सफ़ेद कुर्ते वाले सिपाही अब दो नहीं चार थे। मैं हरीश चंद्र के पास पहुँचा और उमरान का काग़ज़ उनके हाथ में दिया।
उन्होंने पढ़ा। पढ़ते हुए उनकी पलकें चौड़ी हुईं। "किशनचंद? ये नाम तुम्हारे पापा का था?"
"हाँ।"
"और जगह — कुआँ?"
"मुझे लगता है।"
हरीश चंद्र ने दो मिनट सोचा, फिर सीधे जज की कुर्सी की तरफ़ देखा। "मैं जज को बताता हूँ कि गवाह को पकड़कर ले जाया गया है। ये सिर्फ़ गुमशुदगी नहीं — ये गवाही रोकने की साज़िश है। अदालत इस पर कार्रवाई का हुक्म दे।"
"दो बजे से पहले?"
"मैं कोशिश करता हूँ।" हरीश चंद्र ने अपना बस्ता उठाया। "तमाशा है — अदालत में गवाह ग़ायब हो जाए और कोई कुछ न करे।"
मैं आँगन के कोने पर खड़ा रहा। कुछ देर में शेखर बाबू आए, हाथ में एक पुरानी पीली फ़ाइल थी। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और दूर खींचकर कहा, "एक बात पूछनी है।"
"पूछिए।"
"भवानी ने कभी तुमसे ये नहीं कहा कि उसके पिता का नाम क्या था?"
"नहीं।"
"तो सुनो।" शेखर बाबू ने फ़ाइल खोली। "मैंने इस फ़ाइल को बीस साल पहले पढ़ा था। भवानी के पिता का नाम — भगवान सिंह।"
मेरे मुँह से आवाज़ नहीं निकली।
"अब समझे? उमरान के काग़ज़ में लिखा है कि वो जगह भगवान सिंह के नाम पर है। मतलब…" शेखर बाबू ने आवाज़ धीमी की, "मतलब वो काग़ज़ भवानी के बाप के नाम का है।"
"तो उमरान ने मुझे ये क्यों दिया?"
"क्योंकि उमरान भवानी के बाप के साथ काम करता था। और अगर वो ये काग़ज़ तुम तक भेज रहा है, तो उसे भवानी से ज़्यादा तुम पर भरोसा है।" शेखर बाबू ने फ़ाइल बंद की। "पर यही तुम्हारी मुसीबत है। जो काग़ज़ भवानी के बाप के नाम पर है, उसे अदालत में पेश करने का मतलब ये कि तुम भवानी की मर्ज़ी से खेल रहे हो।"
"मैं भवानी की मर्ज़ी से कुछ नहीं कर रहा।"
"तो फिर कुछ और है वहाँ। कुएँ में। जो चीज़ उमरान ने छिपाई है, वो सिर्फ़ एक नाम नहीं है।"
"तो क्या है?"
शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा। "मुझे बीस साल पहले भवानी के पिता ने एक बात कही थी। मैंने उसे दबा दिया था। आज तक किसी को नहीं बताया।"
"क्या?"
"उन्होंने कहा था — हवेली में एक काग़ज़ ऐसा है जो कभी किसी के हाथ में नहीं आया। और वो उमरान के पास है।"
मैंने बंसी को इशारा किया। हम दोनों आँगन से बाहर आए। सड़क पर दो बजे की धूप में अदालत की परछाई छोटी हो रही थी। बंसी ने घड़ी देखी।
"डेढ़ घंटा और है।"
"बंसी, कुआँ।"
"पर वो ज़मीन सील है? बीस साल से ढका हुआ है।"
"कुआँ नहीं। मेरा मतलब — उमरान ने जो काग़ज़ छिपाया है वो हवेली के कुएँ में है, ये मुझे पता है। पर वो अभी भवानी के आदमियों की नज़र में होगा। अगर हम सीधे वहाँ पहुँचे, तो उनके हाथ लगेंगे।"
"तो फिर क्या तरीक़ा है?"
मैंने उमरान का काग़ज़ फिर पढ़ा। "किशनचंद। ये नाम मेरे पापा का है। उमरान ने काग़ज़ पर ये नाम लिखकर मुझे ये बताया है कि जगह पर सिर्फ़ वही जाए जिसका नाम ये है। यानी पापा का हिस्सा उस जगह पर है।"
"तो?"
"तो उस जगह पर जाने का हक़ सिर्फ़ मुझे है।" मैंने काग़ज़ जेब में रखा। "और हाँ, एक और बात। वो जगह कुएँ में नहीं है।"
"कहाँ है?"
"हवेली के पीछे जो पुराना कमरा है, जहाँ से हमें हरि सिंह मिला था — वहाँ के फ़र्श के नीचे। जहाँ तीन ईंटें और अलग रंग का पत्थर था। मेरे दादा ने वहाँ दो बार कुछ छिपाया था। पहली बार अपनी मुहर, दूसरी बार ये काग़ज़।"
बंसी ने गाड़ी की चाबी निकाली। "तो चल।"
"नहीं।" मैंने उसका हाथ रोका। "हम दोनों एक साथ नहीं जाएँगे।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर हम दोनों गए और वो वहाँ पहुँच गए, तो अदालत में कोई गवाह नहीं होगा।" मैंने बंसी के कंधे पर हाथ रखा। "तू यहाँ रुक। हरीश चंद्र को बता दे कि उमरान मिल गया है। पर जगह मत बता। मैं कुएँ के रास्ते से अंदर जाऊँगा।"
"अकेले?"
"अकेले नहीं।" मैंने जेब से टोकन निकाला। हथेली में गरमाहट फैल रही थी। सतह पर शब्द बन रहे थे — "कमला"।
बंसी ने पढ़ा। "कमला?"
"कमला देवी। टोकन ने मुझे कभी ऐसे नाम नहीं दिए जो सीधे जुड़े हों। पर ये नाम माँ का है।"
"माँ?"
"अब समझा। टोकन बता रहा है कि उस जगह पर जाने का हक़ मेरा है, पर मेरे साथ कौशल्या के नाम के बिना मत जाना। माँ का असली नाम कौशल्या है।" मैंने टोकन जेब में रखा। "माँ को लेकर जाऊँगा।"
"अदालत में दो बजे?"
"दो बजे तक आ जाऊँगा। चाहे जो हो।"
घर पहुँचा तो माँ आँगन में बैठी सब्ज़ी काट रही थी। मेरी शर्ट पर मिट्टी देखकर उसने चाकू रख दिया। "अदालत गया था तू?"
"माँ, एक काम है।"
"और भी हैं काम।" वो उठ गई। "बता।"
"कम्मो के बक्स की कुंजी है तेरे पास?"
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही। फिर अंदर गई और एक टिन के डिब्बे से पुरानी काली साड़ी में लिपटी चाबी निकाली। उसने चाबी मेरी हथेली पर रखी।
"ये उस बक्स की चाबी नहीं है," माँ ने कहा। "ये उस बक्स की चाबी है जिसे तेरे दादा ने मेरे ससुर से माँगकर रखा था।"
"माँ, अब सच बता। पापा के बारे में।"
माँ ने आँचल से आँखें पोंछीं। "तेरे पापा ने उस रात जाते वक़्त कहा था — कुआँ सिर्फ़ पानी का नहीं है। वहाँ एक काग़ज़ है जिसमें भवानी के बाप का नाम है। और वो काग़ज़ उस आदमी को देना जो भगवान सिंह का नाम जानता हो।"
"कौन जानता है?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "उमरान। वो जानता है। और तेरे दादा भी जानते थे, पर वो चले गए।"
"तो तू चलेगी मेरे साथ?"
माँ कुछ देर सोचती रही। फिर बोली, "हाँ। पर एक बात माननी पड़ेगी।"
"कह।"
"उस काग़ज़ को हम अदालत में पेश करेंगे। वो हमारे घर में नहीं रहेगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो चीज़ हवेली की है, उसे हवेली में ही रहना चाहिए। हमें सिर्फ़ हक़ मिलना चाहिए — काग़ज़ नहीं।"
मैंने चाबी जेब में रखी और माँ को गाड़ी में बैठाया।
हवेली के पीछे की गली में उस वक़्त सन्नाटा था, जैसा हवेली के बाहर हमेशा होता है — जैसे वो जगह ख़ुद साँस रोके बैठी हो। पीछे का दरवाज़ा खुला था, सांकल टूटी पड़ी थी। हम अंदर घुसे। माँ ने आँगन में चारों तरफ़ देखा और उसकी आँखें भर आईं।
"तूने पहले क्यों नहीं बताया कि हवेली की हालत ऐसी है?" उसने धीरे से कहा।
"अब बता रहा हूँ।"
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