The Token System – Chapter 856
हम पीछे के उस कमरे तक पहुँचे। मैंने फ़र्श देखा। वही पत्थर, वही तीन ईंटें। मैंने ईंटें हटाईं। माँ ने एक पत्थर उठाया और उसके नीचे गड्ढा दिखा। अंदर एक छोटा मिट्टी का बर्तन था, मुँह बंद। मैंने उसे खोला। अंदर एक लिफ़ाफ़ा था, जिस पर उमरान की लिखाई में लिखा था — "भगवान सिंह के बेटे के लिए।"
"ये भवानी के लिए है?" माँ ने पूछा।
"नहीं।" मैंने लिफ़ाफ़ा खोला और दोनों हाथों में फैलाया। "भगवान सिंह के बेटे के लिए है। और भगवान सिंह का बेटा कोई और नहीं — रामदीन था।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "रामदीन?"
"हाँ। भवानी ने रामदीन को ग़लत खाने में गिनवाया, उसकी माँ को उससे अलग किया, और अब रामदीन का बेटा राजेंद्र अपना हिस्सा माँगने अदालत में आया है।"
लिफ़ाफ़े में काग़ज़ था। उस पर उमरान की लिखाई में तीन लाइनें थीं — "रामदीन का हिस्सा हवेली में है। भवानी के पिता ने उसका नाम काटकर अपने बेटे के नाम पर लिखवाया। और असली काग़ज़ — जिस पर भगवान सिंह का अंगूठा है — मेरे पास नहीं, मेरे बेटे के पास था।"
"तो अब कहाँ है?" माँ ने पूछा।
"जहाँ उमरान को ले जाया गया।"
दोनों दो बजे से पहले अदालत लौटे। बंसी गेट पर खड़ा था और हाथ में घड़ी लिए। "जज ने दो बजे की घोषणा कर दी है। हरीश चंद्र ने साज़िश की शिकायत दर्ज करा दी है। पर अभी तक उमरान का कोई पता नहीं।"
"उमरान मिल गया है।" मैंने माँ का हाथ पकड़ा। "पर उससे पहले कुछ संभालना है।"
"क्या?"
"अंदर चल। जज से एक आख़िरी बात कहनी है।"
हरीश चंद्र मिले और उन्होंने मेरी बात सुनी। फिर वो जज के पास गए। दो मिनट की बातचीत हुई। वो लौटे तो उनके चेहरे पर पसीना था। "जज तैयार हैं। पर वो कहते हैं कि उमरान की गवाही के बिना डायरी पर मुहर नहीं लगेगी।"
"मैं उमरान को ले आऊँगा।"
"कहाँ से?"
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। "पता है?"
बंसी ने सिर हिलाया। "हाँ।"
"कैसे?"
"उमरान के पोते ने बताया। दो आदमी, सफ़ेद कुर्ता, लंबी गाड़ी। मैंने आज सुबह रामनगर से आते वक़्त रामदीन के क्वार्टर के पास वही गाड़ी खड़ी देखी थी। मैंने सोचा पुरानी होगी। पर अब जोड़कर देख रहा हूँ, वही थी।"
"तो जगह — तहसील का पीछे वाला क्वार्टर?"
"नहीं।" बंसी ने कहा। "वहाँ से उस रात सब खाली कर दिया था। गाड़ी खड़ी थी, पर उसका मालिक नहीं। उमरान को वहाँ नहीं रखेंगे। उमरान बूढ़ा है, उसकी सेहत भी ख़राब है। उसे ऐसी जगह रखेंगे जहाँ से कोई उसे ढूँढ न सके।"
"ऐसी जगह?"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "हवेली के नीचे वाला कुआँ।"
"कुआँ सूखा है।"
"इसलिए।" बंसी ने गाड़ी की चाबी निकाली। "सूखा कुआँ कोई नहीं ढूँढता।"
अदालत पहुँचे तो घड़ी सवा दो बजा रही थी। बंसी गाड़ी लेकर हवेली की तरफ़ निकल गया था। मैंने हरीश चंद्र से कहा, "पंद्रह मिनट। बस पंद्रह मिनट।"
हरीश चंद्र जज के पास गए और उन्हें कुछ देर और रुकने को कहा। मैं आँगन में खड़ा रहा। राजेंद्र आया और मेरे पास खड़ा हो गया। "कुछ हुआ?"
"उमरान मिल गया है। बंसी लेने गया है।"
"तो फिर भवानी का कोई आदमी?"
"वो भी हवेली के आसपास ही होगा।"
दस मिनट बाद तीन सफ़ेद गाड़ियाँ अदालत के गेट पर रुकीं। उनमें से एक से हरीश चंद्र का सिपाही दौड़कर आया और कहा, "भवानी के आदमी आए हैं। पाँच आदमी हैं। कह रहे हैं कि उनके आदमी का अपहरण हुआ है।"
"किसका?"
"उमरान का। कह रहे हैं कि उमरान उनका गवाह है।"
मैंने हरीश चंद्र की तरफ़ देखा। वो धीरे से बोले, "ये बहाना है। अदालत को उलझाने का।"
बंसी दस मिनट बाद लौटा। उसकी शर्ट पर मिट्टी थी और हाथ में कुछ लाल कपड़े का बंडल था। उसने मुझे दूर बुलाकर कहा, "उमरान मिल गया। कुएँ के नीचे, पीछे की कोठरी में बंद था। हालत ख़राब है — साँस फूल रही है, पानी भी नहीं मिला तो…"
"अस्पताल ले जा।"
"उसने ये भी दिया।" बंसी ने लाल बंडल खोला। अंदर पीतल की छोटी डिबिया थी, ऊपर उलटा कोना-चिह्न। "कह रहा था — ये उसने मेरे बाबा के पास से लिया था, उसकी देखभाल करता आया है। इसे अदालत में देना है।"
मैंने डिबिया खोली। अंदर वही काग़ज़ था जिसकी मुझे तलाश थी — एक तरफ़ भगवान सिंह का अंगूठा और दूसरी तरफ़ भवानी के पिता के दस्तख़त।
"उमरान ने कहा?" मैंने पूछा।
"कहा — अदालत में अब भवानी का नाम नहीं लिखा जाएगा, बल्कि भवानी के बाप का नाम लिखा जाएगा।" बंसी ने उसकी तरफ़ देखा। "और ये भी कहा — उसकी गवाही के लिए उसे दो दिन चाहिए। वो बीमार है।"
"अदालत दो दिन देगी?"
"देगी।" हरीश चंद्र पीछे खड़े थे और सुन रहे थे। "अगर मैं जज को बताऊँ कि गवाह का अपहरण हुआ है और वो बीमार है, तो अदालत दो दिन का वक़्त देगी।"
तभी गेट पर शोर बढ़ा। मैं मुड़ा। पाँच आदमी अंदर आ रहे थे — सफ़ेद कुर्ते, हाथ में लाठी। आगे वही था जो रामनगर में उमरान के पोते ने बताया था। उसने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुरा दिया।
"मनोहर जी," उसने कहा। "हमें उमरान चाचा को लेने आए हैं।"
"उमरान तुम्हारे साथ नहीं जाएगा।"
"वो हमारा गवाह है।"
"वो अब अदालत का गवाह है।"
उसका चेहरा बदला। "अच्छा।" वो पीछे मुड़ा और अपने आदमियों को इशारा किया।
हरीश चंद्र आगे बढ़े और अपनी आवाज़ में कहा, "ये अदालत का परिसर है। पाँच आदमी हथियार लेकर अंदर आए हैं। मैं सीधे जज को सूचित करूँगा।"
पाँचों आदमी रुक गए।
मैंने अपनी आवाज़ में कहा, "उमरान ने चौथे हिस्से का काग़ज़ दे दिया है। वो काग़ज़ अब अदालत में जाने वाला है। और मैं तुम्हें बता दूँ — उस काग़ज़ पर भवानी का नाम नहीं, भवानी के बाप का नाम है। जिसका मतलब है — भवानी ने उस काग़ज़ को छिपाकर हवेली के हिस्से बाँटे थे।"
"भवानी के बाप का नाम?"
"हाँ। और जब अदालत खुलेगी, तो तुम्हारे आका का पूरा कारोबार उसी काग़ज़ पर ख़त्म होगा।"
वो पाँचों आदमी एक-दूसरे की तरफ़ देखने लगे। आगे वाले ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, पर तभी पीछे से एक सिपाही दौड़ता हुआ आया।
"जज साहब जल्दी बाहर आने वाले हैं। फ़ौरन सब अपनी जगह।"
जज ने अदालत खोली और दो मिनट में फ़ैसला सुनाया — "अगली सुनवाई कल सुबह दस बजे। तब तक अस्पताल से उमरान की हैसियत की रिपोर्ट आएगी। गवाह न मिलने की स्थिति में अदालत अपना फ़ैसला सुना देगी।"
बाहर आकर बंसी ने मेरा हाथ पकड़ा। "एक और बात। उमरान ने ये भी कहा था कि जब वो अदालत में बोलेगा, तो कहानी उलटी चलेगी।"
"कैसे?"
"उसने कहा — भवानी का बेटा कोई नहीं है।"
मैं ठिठका। "मतलब?"
"उसने कहा — भवानी के नाम पर जो बेटे हैं, सब काग़ज़ों के बेटे हैं। ख़ून के नहीं।"
अँधेरा जल्दी उतर रहा था। मैंने टोकन जेब से निकाला। इस बार हथेली में भारी गरमाहट थी। सतह पर अक्षर उभर रहे थे — "कल। उमरान।"
मैंने टोकन जेब में रखा और माँ की तरफ़ देखा। वो गाड़ी में बैठी थीं और उनका चेहरा उतरा हुआ था।
"माँ, अब घर चलते हैं।"
"रुक।" माँ ने गाड़ी से उतरते हुए कहा। "एक बात बताती हूँ जो मैंने आज तक नहीं बताई।"
"क्या?"
"तेरे पापा ने उस रात जाते वक़्त जो आख़िरी बात कही थी — वो ये थी, 'अगर मैं न लौटूँ, तो उमरान को मेरे अंगूठे का निशान दिखा देना।'"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "कहाँ है?"
"मेरे पास।" माँ ने अपनी साड़ी के पल्लू से एक छोटा काग़ज़ निकाला। "ये उस रात पापा ने दिया था। मैंने इसे आज तक सहेजकर रखा।"
मैंने काग़ज़ खोला। उस पर सिर्फ़ दो शब्द थे — "उमरान के पास।"
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