The Token System – Chapter 849
मैंने पन्ना लिया और मुड़कर अदालत की सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा। सीढ़ी पर चढ़ते हुए मैंने सुमन को देखा — वो ऊपर खड़ी थी, हाथ में फ़ाइल, और उसकी आँखों में वो भरोसा था जो पहले नहीं था।
“अंदर आ जाओ,” उसने कहा। “जज साहब का इंतज़ार ख़त्म हो रहा है।”
मैंने जेब में तीनों पन्ने महसूस किए — दादा का, भवानी का और सुखिया का। हिसाब का तीसरा हिस्सा अब खाली नहीं था।
॥
सीढ़ियों की आख़िरी पौड़ी पर पैर रखते ही मैं रुक गया। पीछे मुड़ा। सुखिया अभी भी नीचे खड़ा था, हाथ में लाठी, आँखें मुझ पर। पर मैंने उससे नहीं, रामदीन से कहा — जो मेरे ठीक पीछे चला आ रहा था, हाथ में वो फटा पन्ना दबाए।
“रामदीन, एक बात सुन।”
वो रुका। “अब क्या?”
“ये पन्ना जलाने की सोच भी मत।” मैंने उसके हाथ की तरफ़ इशारा किया। “तेरे बाप छोटे लाल ने रामलाल के यहाँ तीस साल काम किया। ये पन्ना जला, तो तेरे बाप का नाम भी उसी आग में जलेगा। तेरा हिस्सा भी।”
रामदीन के हाथ काँपे। पन्ना हवा में लहराया।
“झूठ मत बोल,” उसने कहा, पर आवाज़ में दम नहीं था।
“झूठ होता तो तेरा हाथ न काँपता।”
तभी पीछे से पहरा आया। उसने चुपचाप रामदीन की कलाई पकड़ी और मरोड़ी। पन्ना छूटकर हवा में उड़ा — और सीधा मेरी तरफ़। मैंने दोनों हाथों से लपका। काग़ज़ मेरी हथेली में चिपक गया, नम था, किनारे जले हुए।
मैंने उसे सीढ़ी की रोशनी में खोला। ऊपर आधा हिस्सा फटा था, पर नीचे का हिस्सा साफ़ पढ़ा जा सकता था। तीसरे हिस्से का पूरा हिसाब — बीघा, रकम, तारीख़ें, गवाहों के नाम। और सबसे नीचे, मोटी स्याही में एक लाइन —
“यह हिस्सा गोविंद राम के बेटे को, जो आज तक अपना हक़ नहीं माँग सका।”
मैंने पढ़कर पहरा की तरफ़ देखा। “तेरे अब्बा का नाम अब काग़ज़ पर है। तेरे हाथ से लिखा हुआ, तेरे बाप की मेहनत का हिसाब।”
पहरा कुछ नहीं बोला। बस रामदीन की कलाई और कस दी।
सुखिया ऊपर आया, धीरे-धीरे, लाठी टेकता। उसने मेरे हाथ का पन्ना देखा और हँसा। “अब समझा? तीन पन्ने — तीन हिस्से। एक भी कम हो तो हिसाब अधूरा।”
“चार हिस्से थे,” मैंने कहा।
“चौथा तेरे पास है। तेरे पापा की लिखाई में। जो उन्होंने तुझे देने के लिए छोड़ा था।”
रामदीन घुटनों पर आ गिरा। “मैंने काग़ज़ नहीं जलाए। भवानी ने कहा था — जला दो, तो तेरे बाप का नाम काग़ज़ से हटा देंगे।”
“हटा क्या देते,” पहरा बोला, पहली बार ऊँची आवाज़ में। “तेरे बाप का नाम कभी काग़ज़ पर था ही नहीं। वो तो बस उन्नीस नामों की सूची में गिना गया था — और उस सूची में भी ग़लत खाने में।”
मैंने रामदीन का कंधा पकड़ा। “उठ। अब अदालत चल। और अंदर जाकर वही बोलना जो अभी बोला। एक शब्द कम, एक शब्द ज़्यादा — तो हिसाब तेरे सिर चढ़ेगा।”
अदालत का आँगन सुबह की धूप में तप रहा था। मैं सीढ़ियाँ चढ़ा, हाथ में काग़ज़ों का बंडल — तिजोरी से निकला बंडल, शेखर बाबू की पीली कॉपी, कुएँ से मिला पन्ना, रामलाल की मुहर, कम्मो की डायरी, और अब सुखिया का तीसरा पन्ना। सब एक साथ, एक ही बंडल में।
कमरे के अंदर भीड़ थी। हरीश चंद्र मेज़ पर झुके कुछ लिख रहे थे। सुमन बेंच के कोने पर बैठी थी, सामने काग़ज़ों का ढेर। श्यामलाल का वकील अपनी कुर्सी पर सीधा बैठा था, सफ़ेद कुर्ता, ब्रीफ़केस गोद में।
जज ने चश्मे से ऊपर देखा। “मनोहर। तुम्हारे पास जो है, मेज़ पर रखो।”
मैंने एक-एक करके रखा। बंडल, कॉपी, पन्ना, मुहर, डायरी।
वकील उठा। “माननीय, ये काग़ज़ कहाँ से आए, इसका कोई हिसाब नहीं।”
“हिसाब है,” मैंने कहा। “और वो मैं अभी बताता हूँ।” मैंने बंडल खोला। “ये बंदोबस्त और क़र्ज़नामा उस तिजोरी से निकले हैं जो हवेली के कुएँ के नीचे मिली। इसमें साफ़ लिखा है कि कौशल्या ने ज़मीन बेची नहीं थी, गिरवी रखी थी — और गिरवी की रकम चुकाई जा चुकी थी।”
वकील हिला। “लेकिन ये काग़ज़…”
“रुकिए।” मैंने कॉपी खोली। “ये शेखर बाबू की कॉपी है। इसमें भवानी के होम भेजे गए हर मरीज़ का नाम, तारीख़ और रकम दर्ज है। पहला नाम — बीरा देवी।”
कमरे में सन्नाटा। मैंने तीसरा पन्ना उठाया। “और ये — रामलाल के तीसरे बेटे का हिस्सा। जिस पर खुद लिखा है — यह हिस्सा गोविंद राम के बेटे को।”
जज ने चश्मा उतारा। उनकी नज़र राजेंद्र पर पड़ी — जो पीछे की बेंच पर बैठा था।
“तुम कौन हो?” जज ने पूछा।
राजेंद्र खड़ा हुआ। उसने एक बार मेरी तरफ़ देखा, फिर सामने। “मैं गोविंद राम का बेटा हूँ।” उसकी आवाज़ साफ़ थी, बिना काँपे। “और मुझे अपना हिस्सा चाहिए।”
वकील ने कुछ कहना चाहा, पर जज ने हाथ उठाया। “बैठो।”
फिर दरवाज़े की तरफ़ इशारा हुआ और दो सिपाही भवानी को लेकर आए। हथकड़ी में, सफ़ेद कुर्ता, बाल बिखरे। वो आया और बेंच पर बैठ गया — चुपचाप। पहली बार। आँगन में जितने लोग थे, सबने देखा कि वो कुछ नहीं बोला। न कोई धमकी, न कोई तमाशा। बस बैठा रहा।
जज ने सब काग़ज़ देखे। फिर हरीश चंद्र की तरफ़ मुड़े। “कितने गवाह बाक़ी हैं?”
“दो, माननीय। एक वो जिसके पास असली डायरी है, और एक —” हरीश चंद्र ने काग़ज़ देखा — “एक और।”
जज ने घड़ी देखी। कलम उठाई। “सुनवाई कल सुबह दस बजे तक के लिए टाली जाती है। तब तक सारे काग़ज़ इसी अदालत के कब्ज़े में रहेंगे। और —” उन्होंने राजेंद्र की तरफ़ देखा — “तुम्हारी अर्ज़ी दर्ज की जाती है।”
हथौड़ा पड़ा। कमरा उठने लगा।
मैं बाहर आया तो सूरज सिर पर था। बंसी सीढ़ी के नीचे खड़ा था, हाथ में चाय का गिलास, जो अब तक ठंडी हो गई थी।
“क्या हुआ?” उसने पूछा।
“कल। सब कल।”
वो कुछ कहता, तभी मेरी जेब में मोबाइल हिला। हमने एक-दूसरे को देखा। मैंने निकाला। अनजान नंबर। एक संदेश।
“डायरी लेकर आज रात हवेली के पिछले दरवाज़े पर आ — अकेले। वरना रीना का रिश्ता कभी नहीं होगा।”
मैंने बंसी को स्क्रीन दिखाई। उसने गिलास एक किनारे रखा।
“कौन है?”
“पता नहीं।”
तभी जेब में दूसरी चीज़ हिली — टोकन। मैंने उसे मुट्ठी में दबाया। उसकी सतह पर शब्द उभर रहे थे, धीरे-धीरे, जैसे कोई उँगली से लिख रहा हो।
“जा। पर पहले बंसी को बता।”
मैंने मुट्ठी खोली। बंसी ने टोकन की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
“क्या लिखा है?”
“जो मैं करने ही वाला था।”
बंसी हँसा। “तो फिर देर किस बात की? पहले चाय पी। फिर हिसाब।”
वो मुड़कर चला, और मैं उसके पीछे। पीछे मुड़कर मैंने अदालत की सीढ़ियों पर नज़र डाली — राजेंद्र अभी भी वहीं खड़ा था, हाथ में काग़ज़ का कोना, और उसकी आँखें उसी पन्ने पर थीं जिस पर उसका हिस्सा लिखा था।
बंसी चाय की दुकान पर मुझे खींच लाया। बेंच पर बैठे, सामने चाय रखी, पर मेरा हाथ गिलास तक नहीं गया। मैंने मोबाइल फिर निकाला। वही संदेश। मैंने नंबर मिलाया।
घंटी बजती रही। कोई नहीं उठाया। आख़िरी घंटी पर कट गया।
“क्या सोच रहा है?” बंसी ने कहा।
“ये जानता है कि डायरी मेरे पास है। और ये भी जानता है कि रीना की बात मुझे कहाँ लगती है।”
“यानी अंदर का आदमी है। बाहर वाला रीना का नाम नहीं जानता।”
“रामलाल के घर के सारे लोग जानते हैं। भवानी जानता है। श्यामलाल जानता है।”
बंसी ने चाय खत्म की। गिलास ज़ोर से रखा। “और कम्मो की डायरी?”
“क्या?”
“सुखिया ने कहा था — असली डायरी का कुछ पता है?”
मैं सीधा हो गया। “नहीं। पता नहीं।”
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