The Token System – Chapter 850
“तो जो भी ये संदेश भेजने वाला है, वो मान रहा है कि डायरी तेरे पास है। या वो जानता है कि तू उसे ढूँढ रहा है। और वो उसे तुझसे पहले पकड़ना चाहता है।”
“या फिर —” मैंने गिलास उठाया, “वो चाहता है कि मैं अकेला आऊँ, ताकि मेरे पास जो भी है, वो सब ले जाए।”
बंसी कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, “हवेली का पिछला दरवाज़ा। वहाँ से क्या रास्ता निकलता है?”
“कुएँ वाला आँगन।”
“और कुआँ?”
“अब खुला है। सब देख चुके हैं।”
“तो वहाँ क्यों?” बंसी ने पूछा। “अगर वो कुछ छिपाना चाहता है, तो वहाँ नहीं बुलाता।”
मैंने चाय पी। सोचा। “वो मुझे वहीं बुला रहा है जहाँ वो सब देख सके। जहाँ वो जानता है कि कौन आता है, कौन जाता है।”
“या फिर,” बंसी ने धीमे से कहा, “वो वहाँ नहीं आएगा। वो किसी और को भेजेगा।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। “तो मैं क्या करूँ?”
“तू आएगा। पर अकेला नहीं।”
“संदेश में अकेले लिखा है।”
“संदेश में ये नहीं लिखा कि तेरे पीछे कौन खड़ा होगा।”
शाम को मैं घर पहुँचा तो आँगन में रीना बैठी थी। हाथ में कटोरी, पर खाना वैसा ही था। माँ पास बैठी थी, कुछ बोल नहीं रही थी।
मैंने पैर पोंछे। “क्या हुआ?”
माँ ने रीना की तरफ़ देखा। रीना ने सिर नीचा कर लिया।
“बोल,” मैंने कहा।
रीना ने कटोरी रखी। “दोपहर में एक आदमी आया था। कह रहा था — अगर तेरे भाई ने कुछ गड़बड़ किया, तो अच्छा नहीं होगा।”
मेरा हाथ मुट्ठी में बंद हो गया। “कैसा आदमी?”
“सफ़ेद कुर्ता। बोलने में बड़ा नरम। पर आँखें —” रीना ने रुककर सोचा — “आँखें ऐसी थीं जैसे वो मुस्कुरा रहा हो, पर बात गुस्से की कर रहा हो।”
माँ ने कहा, “मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया। पर वो जाने से पहले बोला — ‘अपने बेटे से कह देना, हवेली का पिछला दरवाज़ा अब भी खुला है।’”
खून सूख गया। ये संदेश से पहले आया था। यानी वो सिर्फ़ मोबाइल पर भरोसा नहीं कर रहा था। वो घर तक आया था। मेरी बहन से बात की थी। मेरी माँ के सामने।
“तू ठीक है?” मैंने रीना से पूछा।
“मैं ठीक हूँ।” उसने सीधा मुझे देखा। “पर भैया, ये सब कब तक?”
मैं बैठ गया। पास में। “बस कुछ दिन। कल अदालत में सब खत्म हो जाएगा।”
“झूठ मत बोल।”
मैं चुप हो गया।
रीना ने मेरा हाथ पकड़ा। “मुझे रिश्ते की चिंता नहीं है। मुझे तेरी चिंता है।”
माँ उठकर अंदर चली गई। दरवाज़े पर रुककर बोली, बिना पलटे, “खाना रखा है। ठंडा मत करना।”
रात नौ बजे मैंने बंसी को फ़ोन किया। “पीछे के आँगन की तरफ़ जो खिड़की है — वो अब भी खुलती है?”
“क्यों?”
“मुझे अंदर से बाहर देखना है। पहले।”
“तू पहले जाएगा तो वो देख लेगा।”
“तो मैं सीधा नहीं जाऊँगा। मैं पहले आसपास जाऊँगा। ये देखूँगा कि वो कहाँ छिपा है।”
बंसी कुछ देर चुप रहा। “दस बजे। मैं पुराने बरगद के पास मिलूँगा। उसके पीछे से हवेली की पिछली दीवार दिखती है।”
“तू आएगा?”
“मैं कब नहीं आया?”
मैंने फ़ोन रखा। तभी जेब में टोकन गरम हुआ। मैंने निकाला। उस पर एक ही शब्द था, छोटा-सा, धुँधला — “देख।”
मैं दरवाज़े तक गया। बाहर गली में एक साया गया — साइकिल पर। धीमी। मैं बाहर निकला, तो वो मुड़ चुका था। साइकिल की लाल बत्ती दूर जाती दिखी।
मैं वापस अंदर आया। टोकन फिर ठंडा हो गया।
दस बजे मैं बरगद के पास पहुँचा। बंसी पहले से था। पेड़ की जड़ में बैठा, हाथ में लाठी।
“कुछ दिखा?” उसने पूछा।
“नहीं। पर कुछ सुनाई दे रहा है।”
हवेली की पिछली दीवार के पीछे से आवाज़ आ रही थी। कोई बोल रहा था। धीमे। एक आवाज़ नहीं, दो।
बंसी मेरे कान के पास आया। “दो लोग हैं।”
हम दीवार के साथ-साथ बढ़े। पीछे का दरवाज़ा खुला था। अंदर से रोशनी आ रही थी — लालटेन की पीली।
मैंने झाँका।
आँगन में सुखिया खड़ी थी। सामने बैठा था श्यामलाल। उसके हाथ बँधे थे। एक आदमी उसके पीछे खड़ा था, हाथ में डंडा।
“तूने मुझे धोखा दिया,” श्यामलाल बोल रहा था, आवाज़ फटी हुई। “मैंने तुझे पैसे दिए। घर दिया।”
सुखिया ने सिर हिलाया। “और मैंने तुझे क्या नहीं दिया? तेरे बाप ने मेरी माँ को क्या दिया था?” उसकी आवाज़ तेज़ नहीं थी, पर साफ़ थी। “तू अब भी समझता है कि सब कुछ तेरा है?”
“डायरी कहाँ है?” श्यामलाल ने कहा। “बता।”
सुखिया हँसी। “डायरी तेरे पास नहीं। न मेरे पास। जिसके पास है, वो अब इसे छिपा नहीं रहा। सबको पता है।”
“किसको?”
“कल अदालत में पता चल जाएगा।”
श्यामलाल ने पीछे खड़े आदमी को इशारा किया। आदमी ने डंडा उठाया।
मैं आगे बढ़ा। बंसी ने मेरा हाथ पकड़ा। “रुक।”
“देख नहीं रहा?”
“देख रहा हूँ। पर वो पहले से यहीं है। वो हमें जानता है।”
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। “क्या मतलब?”
“ये सब — बँधा हुआ श्यामलाल, सुखिया, ये डंडा — ये तमाशा है। वो जानता है कि तू यहाँ है।”
मैंने फिर अंदर झाँका। सुखिया की नज़र ठीक उसी जगह थी जहाँ मैं छिपा था। उसने एक बार आँख झपकाई। धीरे। जैसे कह रही हो — जाओ।
मैंने बंसी को खींचा। “पीछे।”
“कहाँ?”
“पुलिस।”
हम दीवार के पीछे से हटे, तभी पीछे से एक आवाज़ आई। “मनोहर।”
दोनों रुके।
सामने से कोई आ रहा था — साइकिल पर। वही लाल बत्ती। वो रुका। साइकिल से उतरा। सफ़ेद कुर्ता। चेहरा छाया में था।
“तू अकेला आया था,” उसने कहा। आवाज़ नरम थी, पर उसमें वो खिंचाव था जो रस्सी में होता है जब वो खींची जा रही हो। “फिर ये कौन है?”
“मेरा दोस्त,” मैंने कहा।
“दोस्त ठीक है।” वो आगे आया। “डायरी लाए?”
“डायरी तेरे पास नहीं है,” मैंने कहा। “तुझे पता है। तू बस मुझे डराना चाहता है।”
वो रुका। कुछ देर चुप रहा। फिर हँसा — छोटी-सी हँसी, कंठ से। “तू समझदार है। इसीलिए तुझे बुलाया।”
“तू कौन है?”
“जिसका नाम किसी काग़ज़ में नहीं है।” वो दीवार के सहारे खड़ा हो गया। “तूने आज अदालत में जो किया, वो अच्छा नहीं किया।”
“अच्छा-बुरा अदालत तय करेगी।”
“अदालत आज नहीं तय करती। अदालत में लोग तय करते हैं। और जिन लोगों को तूने आज ज़मीन पर ला खड़ा किया है — वो अब तुझे ज़मीन पर लाएँगे।”
“धमकी?”
“पेशकश।” उसने जेब से कुछ निकाला। एक लिफ़ाफ़ा। “इसमें जो है, उसे देख। कल सुबह अदालत में मत आना। और ये ले।”
उसने लिफ़ाफ़ा आगे बढ़ाया।
बंसी ने लिया। खोला। अंदर काग़ज़ था — असली डायरी का फोटो नहीं, बल्कि एक लिखा हुआ पन्ना। मैंने पढ़ा।
“सुखिया की माँ की गवाही। लिखित। मुहर लगी। इसमें लिखा है कि रामलाल ने ज़मीन का तीसरा हिस्सा गोविंद राम को नहीं दिया, बल्कि उससे छीन लिया। और कम्मो देवी ने इसे देखा था।”
मैंने नीचे देखा। नीचे हस्ताक्षर थे — सुखिया के।
“ये तो मेरे पक्ष में है,” मैंने कहा। “ये मुझे क्यों दे रहा है?”
“क्योंकि असली डायरी में इसके उलट लिखा है। असली डायरी कहती है कि गोविंद राम ने अपना हिस्सा खुद बेच दिया था। और सुखिया की माँ ने उसके होते देखा था।”
मेरा हाथ ठंडा हो गया।
“अब तू सोच,” वो बोला। “अगर कल असली डायरी आई, तो तेरा गवाह सुखिया झूठी निकलेगी। तेरा पूरा केस ढह जाएगा। पर अगर तू ये काग़ज़ पेश कर दे — तो असली डायरी कभी नहीं आएगी।”
“क्यों?”
“क्योंकि जिसके पास असली डायरी है, वो इसे इन काग़ज़ों से मिलाने पर ही आएगा। और मिलाने पर फ़र्क़ साफ़ दिखेगा।”
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