The Token System – Chapter 848
मैंने वो चाबी अपनी जेब से निकाली। तेल की चमक अब भी थी। और जब मैंने उसे उँगलियों में घुमाया, तो उस पर एक पतला सा निशान दिखा — दो लकीरें, बीच में बिंदु — सीधा कोना-चिह्न।
“ये टोकन का निशान है,” मैंने कहा।
“हाँ,” रामदीन ने कहा। “और इसका मतलब ये है कि टोकन का असली मालिक आज कुएँ पर खड़ा होगा।”
हमने तय किया — मैं और बंसी कुआँ देखकर आएँगे, सुमन और रामदीन काग़ज़ों के साथ अदालत के पिछले दरवाज़े पर इंतज़ार करेंगे, हरिया दोनों के बीच संदेश ढोएगा। पर जब हम निकले, तो सुमन ने मेरा हाथ पकड़ा।
“एक बात,” उसने कहा। “उस आदमी को तेरे दादा का नाम लेना होगा — सुखदेव। अगर नहीं लेता, तो वो भी वही है जो श्यामलाल था।”
“क्यों?”
“क्योंकि असली आदमी हिसाब का नाम पहले बोलता है, अपना बाद में।”
मैंने हामी भरी और हम निकल पड़े। सूरज सिर पर आ गया था। कुएँ की गली में पहुँचते ही पैर रुक गए — वहाँ कोई चारपाई रखी थी, चारपाई पर एक सफ़ेद चादर, और चादर के बीच में कोई अधेड़ उमर का आदमी बैठा था, हाथ में वही पीली डायरी जैसी कोई चीज़ थी।
वो उठा। उसके कुर्ते के बटन खुले थे और गर्दन पर एक पुराना जला निशान था — जैसे आग से नहीं, किसी उपकरण से बना हो। वो मेरी तरफ़ आया और रुका।
“सुखदेव का पोता?” उसने पूछा।
“हाँ।”
उसने अपने हाथ की चीज़ मेरी तरफ़ बढ़ाई। एक पन्ना था — फटा हुआ, पर मेरी जान-पहचान का पन्ना — वो पन्ना जो डायरी से ग़ायब था।
“कम्मो ने इसे जलाते वक़्त बचाया था,” उसने कहा। “बाक़ी डायरी जल गई थी। ये बचा।”
“तू कौन है?” बंसी ने पूछा।
“मैं वही हूँ,” उसने कहा, “जिसका नाम टोकन पर लिखा है — बस उल्टा।”
मैंने उसे ग़ौर से देखा। उसकी आँखों में वो शांति नहीं थी जो बुज़ुर्गों में होती है। वहाँ एक हिसाब था।
“तूने पन्ने फाड़े?”
“नहीं। मैंने पन्ना नहीं फाड़ा।” उसने डायरी की तरफ़ इशारा किया। “जिसने फाड़ा, वो आज जेल में बैठा है — तेरा भवानी। पर उसने सिर्फ़ एक पन्ना फाड़ा था। और वो पन्ना उसने मुझे दिया था, ये कहकर — जब हिसाब माँगा जाए, ये दिखा देना।”
“तो ये पन्ना क्या है?” मैंने पूछा।
“ये पन्ना तेरे दादा का हिसाब है।” उसने चादर पर बैठकर कहा। “और ये पन्ना अगर अदालत पहुँच गया, तो भवानी के बेटे का हिस्सा ख़त्म हो जाएगा।” उसने एक पल रुककर कहा। “पर अगर नहीं पहुँचा, तो हिसाब का चौथा हिस्सा — जो अब तक छिपा है — हमेशा छिपा रहेगा।”
मैंने वो पन्ना लिया और उसे खोला। उस पर लिखा था — “तीसरा हिस्सा: उस आदमी का जिसने टोकन बनाए — नाम: सुखिया का धर्म, काम: हिसाब।”
“सुखिया?” मैंने कहा।
“मेरा पहला नाम।” उसने कहा। “सुखदेव का दोस्त और हिसाब का बनाने वाला।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। “मैंने ये नाम कहीं सुना है।”
“सुना होगा,” वो बुज़ुर्ग उठा। “क्योंकि यही नाम मेरे बेटे ने अपनी कब्र पर लिखवाया था — जब उसने ख़ुद को मरा दिखाया।”
वो मुड़ा और चलने लगा। मैंने आवाज़ दी। “रुक!”
वो रुका, पर मुड़ा नहीं।
“पन्ना तेरे पास क्यों था?”
“क्योंकि ये पन्ना काग़ज़ नहीं है।” वो मुड़ा। “ये हिसाब की शर्त है। जो इसे तेरे हाथ में देगा, वो एक और हिस्सा भी देगा — काग़ज़ों का नहीं, ज़िंदगी का। और रामदीन को बताना कि उसका बाप कभी ग़लत नहीं था। वो बस तीसरे खाने में गिना गया, जहाँ उसे नहीं होना चाहिए था।”
वो गली के मोड़ पर पहुँचा। रुका। हवा चली और चादर उड़कर गिरी। मैंने पन्ना अपनी जेब में रखा और पीछे पलटकर देखा।
बंसी वहीं खड़ा था, मुँह खुला।
“क्या हुआ?”
“वो चादर पर कोई चीज़ खुदी है।” बंसी कुएँ की मुंडेर पर गया और चादर उठाई। उसके नीचे सीमेंट पर तीन लकीरें थीं और उनके नीचे एक शब्द — “तैयार।”
“ये उसने लिखा है?”
“नहीं।” बंसी ने धूल में पैर रखा। “ये पहले से था। देखो — धूल सूखी है। मतलब किसी ने रात में लिखा था।”
मैंने चादर उलटकर देखी। दूसरी तरफ़ एक पुरानी स्याही से लिखी लाइन थी — “जो हिसाब बाँटकर चलाएगा, वही बचेगा।” और उसके नीचे एक हल्की पेंसिल से मेरा नाम।
मैंने टोकन निकाला। वो गरम था — इतना नहीं जितना पहले, पर कुछ कह रहा था। मैंने उसे हथेली में रखा और उस पर उभरते शब्द देखे — “अब तू नंबर एक है।”
“बंसी,” मैंने धीरे से कहा। “अदालत चल। और रामदीन को बता — उसका बाप कभी ग़लत नहीं था।”
“तू कहाँ जा रहा है?”
“वो बुज़ुर्ग जो रास्ते में मिला था — उसका हिसाब का पन्ना मेरे पास है। और मुझे अब बाक़ी का हिसाब भी चाहिए। ये सिर्फ़ चार पन्नों का मामला नहीं है। ये चार पीढ़ियों का है।”
“अंदर जाने वाले सवाल हम भी करेंगे,” बंसी ने कहा। “आधे तो मैं पूछूँगा।”
“ठीक है,” मैंने कहा। “पर एक शर्त है। उसे पहले मेरा नाम बताना पड़ेगा — और वो नाम सिर्फ़ दादा का नहीं, मेरे पापा का भी होगा।”
हम मुड़े। रास्ते में सुमन का फ़ोन आया। “अदालत पहुँच गए हैं। हरीश चंद्र कह रहे हैं कि श्यामलाल का वकील काग़ज़ों की सूची माँग रहा है। और भवानी का आदमी — वो सफ़ेद कुर्ते वाला — अदालत के बाहर खड़ा है। कह रहा है कि उसे काग़ज़ देना है, पर सिर्फ़ तेरे हाथ में।”
“कौन सा काग़ज़?”
“नहीं बता रहा। बस यही कह रहा है — ‘वो जो मन्नू ने रामदीन से लिया था।'”
मैंने आँखें बंद कीं। तब मुझे एहसास हुआ — रामदीन ने जो पन्ना तहखाने में फाड़ने से बचाया था, वो उसने मेरे हाथ में दिया था। पर उसने जो दो ईंटों के नीचे से तिजोरी निकाली थी — वो आधी खुली थी। आधा हिसाब मेरे पास था, आधा किसी और के पास।
“बंसी,” मैंने कहा। “तेरे पास अभी भी वो चाबी है जो सीढ़ी के नीचे मिली थी?”
“हाँ।”
“उसे मुझे दे, और तू अदालत जा। सुमन से कह — जो काग़ज़ भवानी का आदमी माँग रहा है, वो नहीं देना। मैं ख़ुद पहुँचता हूँ।”
“तू तो अभी कुएँ पर ही है।”
“हाँ, इसलिए कि जो रामदीन ने फाड़ा था, वो पन्ना अब मेरे पास है।” मैंने जेब से चाबी निकाली। “और जो पन्ना भवानी ने फाड़ा था, वो इस चाबी के साथ उसी तिजोरी में था जो अभी खुली है। अब दोनों पन्ने मेरे पास हैं। और अगर उसे तीसरा पन्ना भी चाहिए, तो उसे ख़ुद आना होगा।”
बंसी हँसा — पहली बार उस दिन में। “कमाल है। तू हिसाब में अच्छा हो गया है।”
“नहीं,” मैंने कहा। “मैं हिसाब में अब भी कच्चा हूँ। बस अब मुझे पता है कि हिसाब का मतलब सिर्फ़ जोड़ना नहीं, बाँटना भी है।”
हम अदालत के पिछले फाटक की तरफ़ चले। रास्ते में मैंने टोकन फिर जेब में रखा। उसकी गरमी अब अलग थी — पहले डराती थी, अब याद दिलाती थी कि अभी शुरुआत ही है।
अदालत के गेट पर पहुँचते ही लोगों की भीड़ दिखी — अख़बार वाले, कुछ सफ़ेद कुर्ते वाले, और सबसे आगे काकी, जो मुझे देखकर अपनी लाठी उठाकर हिलाने लगी।
“तेरे पास जो है,” काकी ने आवाज़ दी, “वो अंदर ले जा। और देख — वो आदमी जो तेरे पीछे खड़ा है, उससे डरना मत।”
मैं मुड़ा। चार क़दम पीछे वही बुज़ुर्ग खड़ा था — सुखिया। उसके हाथ में कोई चीज़ थी, जो वो आगे बढ़ाकर मेरी तरफ़ कर रहा था।
“ये तीसरा पन्ना है,” उसने कहा। “पहले वाले दो तेरे पास हैं। ये भी रख ले।”
“क्यों दे रहा है?”
वो हँसा। “क्योंकि मैं जानता हूँ कि तू इसे नहीं बेचेगा।”
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno