The Token System – Chapter 845
पहरे ने लाठी ज़मीन पर टिका दी। “मैं चलूँगा। मेरी लाठी की धौंकनी ऐसी है कि कोई ज़्यादा हेर-फेर करे, तो मैं उसका मुँह देख लूँगा।”
रामदीन ने पहरे की तरफ़ देखा। “तेरी मर्ज़ी।”
रात नौ बजे का वक़्त था। गाड़ी गोदाम से निकली और शहर से बाहर की सड़क पकड़ ली। श्यामलाल का घर पुराने शहर की उस गली में था जहाँ एक तरफ़ बंद बाज़ार था और दूसरी तरफ़ पुराना मकानों का झुरमुट, जिनमें से एक भी दीया जलता नहीं दिखा।
गाड़ी रुकी। बंसी बाहर उतरा, हरीश चंद्र का आदमी पीछे आकर खड़ा हो गया, और पहरे ने लालटेन जलाकर मेरे हाथ में थमा दी।
“तहखाने का रास्ता पीछे से है,” रामदीन ने कहा। “मैं आगे चलूँगा, तुम लोग पीछे।”
“नहीं,” मैंने कहा। “मैं आगे रहूँगा। तू मेरे पीछे। पहरा सबसे पीछे।”
रामदीन एक पल मेरी तरफ़ देखता रहा, फिर हँसा। “तेरे बाप भी यही बोलते थे।”
मैं रुक गया। “क्या बोलते थे?”
“यही — ‘मैं आगे रहूँगा।’ और बाकी सब पीछे।” उसने लालटेन मेरे हाथ से ले ली और मुझे एक तरफ़ कर दिया। “तेरे बाप मेरे साथ काम करते थे, तुझे पता है?”
“अब पता चला।”
“वो मुझ पर भरोसा करते थे। इसीलिए जब भवानी ने उनके ख़िलाफ़ बात उठाई, तो मैं चुप रहा। यही मेरा सबसे बड़ा पाप था।” उसने मेरी तरफ़ देखा। “आज उसका एक हिस्सा चुकाने का मौक़ा दे रहा हूँ। बस यही काफ़ी है।”
हम पीछे के आँगन में घुसे। दीवारों पर काई थी, और फ़र्श पर जमी धूल में किसी की चप्पलों के निशान थे।
रामदीन ने आँगन के कोने में रखी लकड़ी की भारी अलमारी हटाई। नीचे लोहे का चौकोर ढक्कन दिखा। उसने ढक्कन खींचा। धूल का बादल उठा।
“तहखाना यही है। सात सीढ़ियाँ। कोई अलग कमरा नहीं। जो मिलेगा, सामने मिलेगा।”
सीढ़ियाँ उतरी। तहखाने में हवा बंद थी। मेरी लालटेन की रोशनी में एक संदूक दिखा — लोहे का, लकड़ी से मढ़ा, भारी। बंद।
“श्यामलाल ने कहा था, संदूक का छिपा तल है,” मैंने कहा।
रामदीन ने संदूक के आगे घुटने टेके। “उसका छिपा तल तो है,” उसने कहा, “पर उससे पहले ताले की बात सुन।”
“ताला?”
“ये ताला जानता हूँ, पर बैठा झूठ नहीं बोलूँगा। इसका शिकंजा अंदर से है। बाहर से नहीं खुलेगा।” उसने अपनी जेब से एक पुरानी पीतल की चाबी निकाली और मेरी तरफ़ फेंक दी। “यह चाबी उस तिजोरी की है जो तूने कुएँ से निकाली थी — अब देख, तेरे पास क्या है।”
मैंने चाबी हवा में पकड़ी। वो ठंडी थी, भारी थी। उसका कोना घिसा हुआ था।
“मैं तो ये चाबी आज ही देख रहा हूँ,” मैंने कहा।
“मेरे पास पंद्रह साल से थी,” रामदीन ने कहा। “बाप ने मरने से पहले दी थी, और कहा था — जब वो तिजोरी तेरे हाथ लगे, जो उसकी चाबी माँगे, उसे दे देना। अब तू उसकी चाबी माँग रहा है। मैं दे रहा हूँ।”
बंसी ने मेरे कंधे के ऊपर से झाँका। “ये तिजोरी पहले किसकी थी?”
रामदीन ने बंसी की तरफ़ देखा। “मेरे बाप की। और उनसे पहले उस औरत की, जिसका नाम किसी लिखे में पूरा नहीं आया। कौशल्या।”
मैंने चाबी को जेब में रखा और एक पल सोचा। “अब समझा। तू मुझे संदूक तक लाया, पर असली चीज़ वो तिजोरी है। ये सब दिखावा था।”
रामदीन के चेहरे पर कुछ बदला। “दिखावा नहीं। सीढ़ी।”
“कौन सी?”
“सीढ़ियों के नीचे की ज़मीन में एक और ढक्कन है।” उसने मेरी तरफ़ देखा। “जो कम्मो के काग़ज़ तक ले जाएगा। पर वो ढक्कन मेरे बाप ने दो ईंटों से बंद किया था, और उन ईंटों पर रामलाल की मुहर है। उसे खोलने वाला कोई और हो तो मुहर टूटेगी, हिसाब पर शक पड़ेगा।”
“तो?”
“तो मुहर तू खोलेगा,” रामदीन ने कहा। “तेरे पास रामलाल की मुहर है।”
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया — हाँ।
“मुहर मेरे पास है,” मैंने कहा। “पर मैं इसे अपने फ़ैसले से नहीं खोलूँगा। चल, सबके सामने खुलेगी।”
रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था — जैसे कोई पुराना लिखा हुआ वाक्य पूरा हो रहा हो।
“चल,” उसने कहा। “पर एक बात।”
“क्या?”
“जो मिलेगा, उसे सबके सामने रखेगा। यहाँ मेरे और तेरे बीच नहीं। अदालत तक ले जाएगा।”
“मंज़ूर।”
पहरे ने लाठी संभाली और सीढ़ियों की तरफ़ देखा। “मैं सबसे ऊपर रहूँगा। कोई और आए, तो मेरी लाठी बोलेगी।”
बंसी मेरे पास आया और धीरे से कहा, “मन्नू।”
“हाँ?”
“ये रामदीन हमें तहखाने में ले आया। अब देखना, तहखाना हमें कहीं बाहर न ले जाए।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। “अगर ले जाएगा,” मैंने कहा, “तो मुहर साथ जाएगी। और मुहर जहाँ जाएगी, हिसाब वहीं जाएगा।”
बंसी ने एक गहरी साँस ली और अपना फटा कुर्ता ठीक किया।
हम सीढ़ियों के नीचे से उतरने लगे। मेरी जेब में तिजोरी की पुरानी चाबी ठंडी थी, पर उससे चिपकी एक चीज़ गरम थी — टोकन। और उस गरमी में एक शब्द उभर रहा था, जो सिर्फ़ मैं महसूस कर सकता था।
“सुन।”
सीढ़ियों के नीचे वाला ढक्कन दो ईंटों से ढका था। ईंटों पर मुहर लगी थी — रामलाल की मुहर। मैंने जेब से मुहर निकाली और ईंटों पर रख दी। मुहर और ईंट का निशान एक दूसरे से मिल गए।
“मिल गया,” मैंने कहा। “ठीक बैठ रहा है।”
रामदीन ने ईंटें हटाईं। नीचे लोहे का ढक्कन दिखा, जिस पर जंग थी। ढक्कन खींचा, तो चरमराया। नीचे एक और कमरा था — छोटा, गोल, सीमेंट से बना। दीवार से पानी रिस रहा था।
कमरे के बीचों-बीच तिजोरी रखी थी। हरी, भारी, ऊपर पीतल का पहिया जड़ा हुआ। मैंने जेब से चाबी निकाली और ताले में डाली। ताला खुला।
तिजोरी के अंदर सिर्फ़ एक रखी थी — लाल कपड़े में लिपटी किसी बड़ी चीज़ पर टेका हुआ एक काग़ज़ और उसके नीचे कुछ और काग़ज़। मैंने सब बाहर निकाले। रोशनी में देखा, तो साँस रुक गई।
असली बंदोबस्त। तीन पन्ने। रामलाल का पूरा दस्तख़त और मुहर — और नीचे कम्मो का अँगूठा। उसके अलावा एक और काग़ज़ — क़र्ज़नामा। और सबसे नीचे एक छोटी लिखी हुई पर्ची, जिस पर रामदीन के बाप का नाम था और उनका हिस्सा लिखा था।
बंसी ने काग़ज़ हाथ में लिया और भर आई आँखों से पढ़ने लगा। “ये तो… यहाँ तो कम्मो का नाम साफ़ लिखा है। और ये ज़मीन का हिस्सा — वो जो भवानी ने कहा था कि कम्मो ने सब बेच दिया — झूठ है।”
“क्या?” रामदीन ने काग़ज़ छीना और अपनी उँगली से एक लाइन पर रखी। उसकी आँखें भर आईं। “ये… ये तो मेरे बाप का हिस्सा है। बारह बीघा। कम्मो ने अलग रखा था, रामलाल के दबाव में। और मेरे बाप मर गए बिना जाने।”
पहरे ने ऊपर से आवाज़ दी। “कोई आ रहा है! दो आदमी! लाठी लेकर!”
रामदीन ने काग़ज़ों को जल्दी से उठाया और मेरी तरफ़ बढ़ाया। “ले। तेरे हाथ में रहेंगे, तो कोई कुछ नहीं कर सकेगा।”
मैंने काग़ज़ लिए और अपने कुर्ते के अंदर बाँध लिए। “ऊपर चलो। जल्दी।”
हम सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। पहरा ऊपर वाले दरवाज़े पर खड़ा था, लाठी ताने। सामने भवानी का आदमी था — लंबा, मूँछों वाला — और साथ में एक और, जो हाथ में लालटेन लिए था।
“रामदीन,” लंबे ने कहा। “भवानी जी ने कहा है, जो कुछ भी मिले, निकाल कर दे दो। बदले में तेरे बाप का हिस्सा वो वापस दिलवा देंगे।”
रामदीन हँसा। वो हँसी कमरे में गूँजी। “भवानी मेरे बाप का हिस्सा दिलवाएगा? जो हिस्सा उसने ही तो छीना था?”
“तेरी बात भवानी जी तक पहुँचेगी, तो अच्छा नहीं होगा।”
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