The Token System – Chapter 844
“बाद में,” मैंने कहा। “पहले एक काग़ज़ है, जो आज नहीं तो कल, हर हाल में निकलेगा। चाहे श्यामलाल के तहखाने से, चाहे किसी और की जेब से।”
हरीश चंद्र ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर हरीश चंद्र ने पूछा, “कौन सा काग़ज़?”
“वो जिस पर सिर्फ़ एक नाम नहीं, दो नाम जुड़े हैं,” मैंने कहा। “गोविंद राम — बेटा राजेंद्र।”
हरीश चंद्र का चेहरा बदला। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा — राजेंद्र उनके पीछे खड़ा था, हाथ जेब में, आँखें ज़मीन पर।
“क्या ये सच है?” हरीश चंद्र ने पूछा।
राजेंद्र ने धीरे से सिर उठाया। “सच है,” उसने कहा। “पर मैंने कभी झूठ नहीं बोला। मैंने बस वो नहीं बताया जो मुझसे पूछा नहीं गया।”
“मुझसे पूछा गया था,” मैंने कहा। “कुएँ पर। सीढ़ियों पर। उस रात मैंने पूछा था — तुम असल में कौन हो। तुमने कहा था — रामलाल का पोता।”
“तो झूठ नहीं था।”
“आधा सच था,” मैंने कहा। “और आधा सच आधे झूठ से ज़्यादा भारी होता है।”
राजेंद्र कुछ नहीं बोला। शेखर बाबू को गाड़ी में बैठाया गया। चारों तरफ़ हल्की हलचल थी। सुमन ने मेरा हाथ पकड़ा और धीरे से कहा, “तुमने उस काग़ज़ को पढ़कर क्या महसूस किया?”
“कुछ नहीं,” मैंने कहा। “बस ये कि सच का भी एक दाम होता है। और आज उसका दाम चुकाने का दिन है।”
बंसी ने लोहे की छड़ रख दी और मेरे कंधे पर हाथ रखा। “चल,” उसने कहा। “तहखाने में अंधेरा है, लालटेन ले लें।”
मैंने टोकन को एक बार जेब में छुआ। वो ठंडा था — पर अब वो ठंडक मुझे डराती नहीं थी। वो मुझे बता रही थी कि जो शुरू हुआ है, वो अकेले पूरा नहीं होगा। साथ में होंगे — चार लोग, एक रामदीन, एक टोकन — और एक ऐसा काग़ज़ जिस पर दो नाम जुड़े थे।
गोदाम की लालटेन बुझ गई। आँगन में पुलिस की बत्ती चमकती रही।
॥
रामदीन ने लालटेन उठाई और सीधा गोदाम के फाटक की तरफ़ बढ़ गया। पर पहरा उसके रास्ते में आ गया। बूढ़े ने अपनी लाठी आड़ी कर दी।
“रुक,” पहरे ने कहा। “तू पहले अपनी बात साफ़ कर।”
“क्या साफ़ करूँ?” रामदीन ने लालटेन नीचे रख दी। “मैंने कबूल कर लिया न — श्यामलाल के कहे पर शेखर बाबू को उठवाया। अब साथ चलने को भी तैयार हूँ। और क्या चाहिए?”
“ये चाहिए कि तू आगे न चल।” पहरे ने लाठी हिलाई। “जब तक ये न बताए कि तेरे पास क्या है, तू आगे नहीं।”
रामदीन ने पहरे का हाथ पकड़ लिया। “हटा अपनी लाठी।”
“तू हाथ खींच।”
दोनों में धक्का-मुक्की शुरू हो गई। लालटेन ज़मीन पर गिरी और उसका शीशा चटक गया। बंसी आगे बढ़ा, पर मैंने उसका कंधा पकड़ लिया।
मैं बीच में आ गया। “बस!”
दोनों रुक गए। पहरे की साँस तेज़ चल रही थी। रामदीन के हाथ में लालटेन का टूटा हैंडल रह गया।
“लड़ने से कुछ नहीं मिलेगा,” मैंने कहा। “न काग़ज़, न हिसाब, न तेरा हिस्सा।”
रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा।
“मेरे पास एक सीधा सवाल है,” मैंने कहा। “तेरे पास क्या है जो भवानी के पास भी नहीं है?”
रामदीन हँसा। वो हँसी गले से निकली, होंठों से नहीं। “भवानी के पास सब कुछ है,” उसने कहा। “पैसा, आदमी, काग़ज़, डर। पर एक चीज़ नहीं है।”
“क्या?”
“वो काग़ज़ जो मैंने उससे पहले उठाया था।”
बंसी ने आगे बढ़कर कहा, “ये झूठ बोल रहा है।”
“बंसी।” मैंने उसकी तरफ़ देखा। “सुनने दे।”
रामदीन ने टूटी लालटेन ज़मीन पर रखी और अपनी कमीज़ के नीचे से एक पुरानी मैली पोटली निकाली। पर खोली नहीं।
“पंद्रह साल पहले,” उसने कहा, “जब भवानी ने हवेली के काग़ज़ समेटने शुरू किए थे, तब मैं उसके यहाँ मुंशी था। एक रात मैंने तीन पन्ने अलग कर लिए। वो पन्ने जिन पर असली हिस्सों के नाम थे। भवानी को पता चलता तो मेरी खाल उतरवा देता। मैंने वो पन्ने अपने बाप के पास छिपाए।”
“तेरे बाप ने भी रामलाल के यहाँ नौकरी की थी?” मैंने पूछा।
रामदीन का चेहरा सख़्त हुआ। “मेरे बाप ने रामलाल के यहाँ तीस साल नौकरी की। तीस साल। और जब बाँटने की बात आई, तो उसका नाम किसी काग़ज़ पर नहीं था। रामलाल के तीन बेटे थे, पर जो चौथा आदमी दिन-रात उसके साथ खड़ा था, उसे भूल गए।” उसने पोटली को सीने से लगाया। “ये काग़ज़ मैंने अपने लिए नहीं उठाए थे। अपने बाप के लिए उठाए थे।”
बंसी ने मुँह बनाया। “बड़ी गज़ब की कहानी है। अब बताएगा, काग़ज़ कहाँ हैं?”
“काग़ज़ मेरे पास नहीं हैं।”
पहरे ने फिर लाठी उठा दी। “तो फिर कहानी क्यों सुना रहा है?”
“सुन।” रामदीन ने पहरे की तरफ़ देखा। “काग़ज़ मेरे पास नहीं, मेरी बहन के पास हैं। वो शहर से बाहर रहती है। एक छोटे गाँव में, बसवा से आगे। उसके पास ही रामलाल के तीनों बेटों के हिस्सों की असली नकल है, जिसे मैंने पंद्रह साल पहले लिखा था।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। “मन्नू, ये आदमी हमें खींच रहा है। पहले कहता है संदूक के छिपे तल में काग़ज़ है, अब कहता है बहन के पास है। झूठ बोल रहा है।”
रामदीन ने बंसी की तरफ़ देखा। “तू मुझे झूठा कहेगा?” उसकी आवाज़ धीमी हो गई। “तू? जिसके बाप ने भी अपना हिस्सा भवानी के कहे पर हार दिया था?”
बंसी का चेहरा लाल हो गया। वो कुछ कहने ही वाला था कि सुमन बीच में बोली, “बस।”
सब रुक गए। सुमन ने आगे आकर कहा, “दोनों की बात सुन ली। अब मेरी एक बात सुनो।”
रामदीन ने उसकी तरफ़ देखा।
“तू काग़ज़ अपने पास रखेगा,” सुमन ने कहा। “पर हमें अपनी बहन तक ले चल। हम काग़ज़ नहीं देखेंगे, तू अपने हाथ से उठाएगा, अपने हाथ से अदालत में रखेगा। हम सिर्फ़ ये देखेंगे कि वो काग़ज़ है या नहीं। ये शर्त मानेगा?”
रामदीन ने सुमन को घूरा। “तू कौन है?”
“मैं डॉक्टर हूँ,” सुमन ने कहा। “काग़ज़ों की नहीं, आदमियों की। और मुझे ये मंज़ूर नहीं कि रात भर कोई हमें कहानी सुनाता रहे।”
रामदीन एक पल चुप रहा। फिर उसने पोटली वापस कमीज़ के नीचे की और बोला, “मान ली शर्त।”
“पर एक बात पहले बता,” मैंने कहा। “असली काग़ज़ जो तहखाने के संदूक में है, वो क्या है?”
रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा। “वो औरत का है जिसे भवानी ने सबसे ज़्यादा छला।”
“कौन?”
“बहन जो काग़ज़ संभाले बैठी है। कम्मो देवी।”
मैंने टोकन को जेब में छुआ। ज़रा-सी गरमी। फिर ठंडा। कुछ भी नहीं उभरा।
“तो श्यामलाल के तहखाने में क्या है?” बंसी ने पूछा। “झूठी कहानियाँ?”
रामदीन ने बंसी की तरफ़ देखा और पहली बार उसकी आवाज़ में कुछ ठंडा-ठंडा तमतमाया हुआ आया। “मैंने तहखाने की बात श्यामलाल से सुनी थी। उसके कहे पर तुम लोगों को भेजना मेरा अपना फ़ैसला था। और वो फ़ैसला ग़लत था।”
“यानी तहखाने में सिर्फ़ खाली संदूक है,” मैंने कहा।
“नहीं।” रामदीन ने सीधा मेरी तरफ़ देखा। “तहखाने में वो काग़ज़ है जो कम्मो के हाथ से निकला था। श्यामलाल ने उसे उठाया, आधा जला दिया, और जो बचा, वो अपने संदूक में रख दिया। उस आधे जले काग़ज़ पर सिर्फ़ एक लाइन पढ़ी जा सकती है।”
“कौन सी लाइन?” सुमन ने पूछा।
“जो हिसाब का दरवाज़ा अंदर से खोलती है।”
सब चुप हो गए। सुमन ने रामदीन को घूरा, फिर मेरी तरफ़ देखा। “मन्नू, इस पर भरोसा करना ख़तरे से खाली नहीं है।”
“पता है,” मैंने कहा। “पर आज रात हमारे पास और रास्ता भी नहीं है। या तो तहखाने का आधा जला काग़ज़ लेकर बहन तक जाएँ, या यहीं खड़े होकर सोचते रहें कि किसने झूठ बोला।”
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