The Token System – Chapter 838
मैंने उस आदमी की तरफ़ देखा। “तुम्हारे मुंशी ने आज अदालत में तुम्हारा नाम नहीं लिया। उसने सिर्फ़ ‘एक औरत की आवाज़’ की बात कही।”
वो हँसा। “औरत की आवाज़? मेरे पास कोई औरत नहीं थी। मैं अकेला आया था।”
राजेंद्र ने अचानक तस्वीर मेरे हाथ से ली और उसे उस आदमी के चेहरे के सामने रखकर बोला, “तो ये तस्वीर किसने चुराई?”
“तुमने,” उसने कहा।
“नहीं,” राजेंद्र ने कहा। “ये तस्वीर मेरे पास दो साल पहले आई थी — अब्बा के संदूक से। और उस वक़्त इस पर तीसरा चेहरा जला हुआ नहीं था। ये बाद में जला।”
चुप्पी हुई। मैंने राजेंद्र की तरफ़ देखा। उसका चेहरा अब सफ़ेद नहीं, सख़्त था।
“तो किसने जलाया?” मैंने पूछा।
राजेंद्र ने गोविंद राम की तरफ़ देखा — दोनों गोविंद रामों की तरफ़। “मुझे तब पता चला जब अब्बा ने कहा कि मुझे संदूक में से कुछ नहीं लेना। मैंने तस्वीर निकाली, तो उसमें तीसरा चेहरा जला था। और उसके पीछे एक नई लाइन थी — ‘इसे तीसरे को मत दिखाना।’”
“किसकी लिखाई?” मैंने पूछा।
“अब्बा की नहीं थी,” राजेंद्र ने कहा। “किसी और की थी।”
दूसरे गोविंद राम ने कदम बढ़ाया। “ये बकवास बंद करो। काग़ज़ दो।”
“कौन सा काग़ज़?” मैंने पूछा।
“जो मेरे बाप ने बनाया था। तीन हिस्सों वाला।”
“वो काग़ज़ हवेली की उत्तर वाली दीवार से निकला है,” मैंने कहा। “और उस पर साफ़ लिखा है कि तीसरा हिस्सा उस आदमी का है जो इसे पूरा करेगा। तुमने कोई हिस्सा पूरा नहीं किया। तुमने सिर्फ़ अपना चेहरा बचाया।”
वो मेरी तरफ़ बढ़ा, पर तभी कुएँ के पीछे से एक आवाज़ आई — “काग़ज़ किसी को नहीं मिलेगा।”
हम सब मुड़े। पहरा खड़ा था, हाथ में लाठी। उसके पीछे एक आदमी और था — कमज़ोर, काँपता, सिर पर पट्टी बँधी। मुंशी।
“ये तुमने क्या किया?” दूसरे गोविंद राम ने कहा।
“मैंने इसे बचाया,” पहरे ने कहा। “तुम्हारे आदमी इसे कुएँ में फेंकने वाले थे। इसे मालूम था कि तुम कौन हो। और इसे मालूम था कि तुम्हारे भाई ने अपना नाम क्यों छोड़ा।”
मुंशी काँपते हुए बोला, “मैंने गाड़ी इसलिए दी थी क्योंकि मेरी बेटी का स्कूल तुम्हारे हाथ में था। पर आज अदालत में मैंने सच कह दिया। अब मुझे कुछ नहीं चाहिए।”
दूसरा गोविंद राम गाड़ी की तरफ़ लौटा।
“रुको,” उसका भाई बोला। “जो काग़ज़ तुम ढूँढ रहे हो, वो मेरे पास है। और मैं उसे अदालत में दूँगा।”
“तुम कुछ नहीं दोगे,” उसने गाड़ी का दरवाज़ा खोलते हुए कहा। “क्योंकि जिस दिन ये काग़ज़ खुलेगा, उस दिन सबको पता चलेगा कि तुमने अपने बाप का नाम अपने भाई से छीनने के लिए क्या किया था।”
“मैंने कुछ नहीं छीना,” उसने कहा। “बाप ने ख़ुद दोनों को एक नाम दिया।”
“नहीं,” राजेंद्र ने कहा। “बाप ने एक नाम दिया था, और तुमने उस नाम को अपने हिस्से का बनाने के लिए मेरे अब्बा का चेहरा जलाया। मेरे पास इसका सबूत है।”
“क्या सबूत?”
राजेंद्र ने अपनी जेब से एक मुड़ा काग़ज़ निकाला — पुराना, पीला, किनारे से फटा। “ये वो लाइन है जो तुमने तस्वीर के पीछे लिखी थी। तुम्हें नहीं पता था कि मैंने इसे पढ़ लिया।”
दूसरे गोविंद राम का हाथ गाड़ी के दरवाज़े पर रुक गया।
“तुमने लिखा था — ‘एक नाम, एक हिस्सा, एक चेहरा। आज से।’ और उसके नीचे सिर्फ़ तुम्हारा अँगूठा।”
“तो?” उसने कहा, पर आवाज़ पहले जैसी नहीं थी।
“तो ये साबित करता है कि तुमने जान-बूझकर नाम बदला। और ये,” राजेंद्र ने काग़ज़ पलटा, “तुम्हारी लिखाई में ये लाइन — ‘भाई को कुएँ के पास मत आने देना।’”
मैंने पहरा की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया। “मुझे ये काग़ज़ मिला था,” उसने कहा। “राजेंद्र के संदूक से नहीं, इस आदमी के कपड़ों से — उस रात जब ये कुएँ पर आया था और इसे लगा कि कोई इसे देख रहा है।”
“तुमने मुझे कब देखा?” दूसरे गोविंद राम ने पूछा।
“उस रात,” पहरे ने कहा, “जब तुम अपने भाई का चेहरा लेकर कुएँ पर आए थे और मैंने तुम्हें भवानी का आदमी समझकर छिपकर देखा था।”
मैंने पहरे को देखा। “तुमने ये बात पहले क्यों नहीं बताई?”
“क्योंकि तब तक मुझे पता नहीं था कि कौन सा गोविंद राम कौन है,” उसने कहा। “आज अदालत में जब तुमने दोनों को एक साथ नहीं देखा, तब भी नहीं पता था। पर आज रात — दोनों सामने हैं। अब फ़र्क़ साफ़ है।”
दूसरा गोविंद राम हँसा — छोटी, कड़वी हँसी। “तो तुम सब मिलकर मुझे यहाँ बुलाकर फँसाना चाहते थे।”
“नहीं,” मैंने कहा। “हम तुम्हें बुलाना नहीं चाहते थे। तुम ख़ुद आए हो। और तुमने ख़ुद अपना नाम बताया है — गोविंद राम। अब ये अदालत तय करेगी कि दोनों में से कौन सा गोविंद राम हिसाब का हक़दार है।”
वो गाड़ी में बैठ गया। इंजन चला। बंसी दौड़कर गाड़ी के सामने खड़ा हो गया। “नहीं, आज नहीं।”
“बंसी, हटो,” मैंने कहा।
“नहीं। ये भागेगा तो काग़ज़ कभी नहीं खुलेगा।”
गाड़ी का दरवाज़ा फिर खुला। वो उतरा और बंसी को धक्का देने बढ़ा, पर पहरे ने लाठी आड़ी कर दी।
“बस,” पहरे ने कहा। “तुम्हारी गाड़ी यहाँ से नहीं जाएगी।”
पीछे से पुलिस की गाड़ी की आवाज़ आई। सुमन ने हेडलाइट देखकर फ़ोन कर दिया था — दो सिपाही और राजेंद्र का एक साथी उतरे। दूसरे गोविंद राम ने गाड़ी का दरवाज़ा बंद किया और खिड़की से बोला, “तुम्हारे पास कोई वारंट नहीं है।”
“वारंट की ज़रूरत नहीं,” सिपाही ने कहा। “तुम्हारी गाड़ी का नंबर उस केस में दर्ज है जिसमें आज शाम एक मुंशी को उठाया गया था। तुम्हें थाने चलना होगा।”
वो मेरी तरफ़ देखा। “ये तुम्हारा काम है?”
“नहीं,” मैंने कहा। “ये तुम्हारे काम का नतीजा है।”
वो हँसा। “तुम्हें लगता है कि मुझे रोककर तुम हिसाब जीत जाओगे? हिसाब किसी का नहीं होता, मनोहर। हिसाब तो बस चलता रहता है।”
“फिर चलता रहेगा,” मैंने कहा। “पर अब तुम्हारे हाथ से नहीं।”
सिपाही उसे गाड़ी में बैठाने लगे, तभी असली गोविंद राम आगे आए और अपने भाई के कंधे पर हाथ रखा।
“एक बात पूछनी है,” उन्होंने कहा। “मेरा चेहरा जलाने के बाद तुमने अपना नाम क्यों नहीं बदला? तुम तो अब भी गोविंद राम ही हो।”
“क्योंकि,” उसने धीरे से कहा, “अगर मैं नाम बदलता, तो हिसाब में मेरा हिस्सा भी बदल जाता। और मैं उस हिस्से को छोड़ने को तैयार नहीं था।”
वो गाड़ी में बैठ गया। गाड़ी चली गई। पहरे ने कुएँ की तरफ़ देखा और लाठी ज़मीन पर टिका दी।
“अब?” बंसी ने पूछा।
“अब वो काग़ज़,” मैंने कहा। “जो मुंशी के पास था।”
मुंशी काँपते हाथों से अपनी जेब से एक लिफ़ाफ़ा निकाला। “ये मुझे उसने दिया था — कहा था कि अगर अदालत में कुछ गड़बड़ हो तो ये किसी को नहीं देना। पर अब मैं नहीं रखूँगा।”
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक काग़ज़ था — पुरानी स्याही में तीन लाइनें। पहली लाइन — “गोविंद राम — हिस्सा तीसरा।” दूसरी लाइन — “पर हिस्सा उसका जो इसे पूरा करे।” और तीसरी लाइन, जो सबसे नीचे छोटे अक्षरों में थी — “जो इस काग़ज़ को जलाएगा, उसका हिस्सा भी जल जाएगा।”
राजेंद्र ने काग़ज़ पढ़ा और मेरी तरफ़ देखा। “तो इसका मतलब है कि मेरे अब्बा का हिस्सा अभी भी ज़िंदा है?”
“हाँ,” मैंने कहा। “और वो तुम्हारे हाथ में है।”
हम कुएँ के पास बैठ गए। पहरे ने लालटेन जलाई। सुमन की गाड़ी भी आ गई थी। उसने आते ही पूछा, “काग़ज़ मिला?”
“मिला,” मैंने कहा।
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