The Token System – Chapter 839
“तो अब क्या?”
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा था — एकदम ठंडा, जैसे कुछ देर के लिए सो गया हो। मैंने उसे बाहर निकाला। उस पर कोई नया अंक नहीं था, कोई नया शब्द नहीं था। बस वही पुरानी लकीरें, वही कोना-चिह्न।
“टोकन कुछ नहीं कह रहा,” मैंने कहा।
“तो?” सुमन ने कहा।
“तो इसका मतलब है कि अगला कदम हमें ख़ुद तय करना है।”
राजेंद्र ने अपनी जेब से वो लाइन वाला काग़ज़ निकाला — जो उसने दूसरे गोविंद राम की लिखाई बताई थी — और उसे लालटेन के नीचे रखा। “ये मैंने अभी नहीं बताया,” उसने कहा। “ये काग़ज़ मुझे अब्बा ने नहीं दिया था। ये मुझे कुएँ के संदूक से मिला था — उस दिन जब मैंने पहली बार संदूक खोली थी।”
“तो तुमने झूठ बोला?” बंसी ने कहा।
“नहीं,” राजेंद्र ने कहा। “मैंने कहा था कि ये काग़ज़ मेरे पास दो साल पहले आया था। मैंने ये नहीं कहा कि अब्बा ने दिया था। तुम लोगों ने ख़ुद मान लिया।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। “तो इसे तुमने छिपाया क्यों?”
“क्योंकि इस पर मेरे अब्बा का नाम था,” उसने कहा। “और मुझे डर था कि अगर ये काग़ज़ सामने आया तो सब कहेंगे कि मेरे अब्बा ने ही अपना चेहरा बदला था।”
“और अब?”
“अब मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता,” उसने कहा। “क्योंकि अब मुझे पता है कि मेरे अब्बा ने क्या किया और क्या नहीं किया।”
सुमन ने काग़ज़ उठाया और लालटेन के नीचे अच्छी तरह देखा। “ये लिखाई किसी और की भी हो सकती है,” उसने कहा। “इस पर अँगूठा नहीं है।”
“नहीं,” राजेंद्र ने कहा। “इस पर अँगूठा नहीं है क्योंकि जिसने लिखा, उसने सोचा था कि कोई इसे नहीं पढ़ेगा।”
मैंने काग़ज़ वापस लिया और उसे मोड़कर अपनी जेब में रखा। “आज रात बहुत हो गया। सुबह अदालत में ये काग़ज़ देंगे।”
“और मुंशी?” बंसी ने पूछा।
“मुंशी हमारे साथ चलेगा,” मैंने कहा। “उसकी बेटी का स्कूल भी हम देखेंगे।”
मुंशी ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखें भर आईं। “मैंने आपको धमकाया था…”
“तुमने धमकाया नहीं, धमकाया गया,” मैंने कहा। “फ़र्क़ है।”
असली गोविंद राम ने मेरा हाथ पकड़ा। “मनोहर, एक बात कहनी है।”
“कहिए।”
“जो काग़ज़ तुमने मुझे दिया — जो तुमने अभी जेब में रखा — उस पर मेरी लिखाई नहीं है।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा। “मतलब?”
“मतलब ये कि वो लिखाई किसी और की है,” उन्होंने कहा। “और मैं उसे पहचानता हूँ। ये लिखाई उस आदमी की है जो मेरे बाप के साथ हवेली में काम करता था — जिसने मेरे बाप की आख़िरी रात में उन्हें कुएँ के पास बुलाया था।”
“कौन?” मैंने पूछा।
“श्यामलाल,” उन्होंने कहा। “सुखदेव का सौतेला भाई। जिसने तुम्हारे दादा से कहा था कि तुम्हारा हिस्सा तुम्हें नहीं मिलेगा।”
मैंने टोकन फिर निकाला। अब वो गरम था — हल्का, पर गरम। और उस पर एक नया शब्द उभरा था।
“क्या लिखा है?” बंसी ने पूछा।
मैंने शब्द पढ़ा। “श्यामलाल।”
“तो अब?”
“अब,” मैंने कहा, “सुबह होने से पहले हमें ये लिफ़ाफ़ा नहीं खोलना है।”
हम कुएँ से लौटने लगे। मैं सबसे पीछे था। पहरे ने मेरा कंधा पकड़ा।
“मन्नू, एक बात,” उसने कहा। “जो तुमने सुमन से नहीं कही।”
“क्या?”
“ये कि टोकन पर जब श्यामलाल का नाम आया, तब तुम्हारे हाथ काँपे थे।”
मैं रुक गया। “तुमने देखा?”
“मैंने तुम्हें पाला है,” उसने कहा। “तुम्हारे हाथ कब काँपते हैं, मुझे पता है।”
“मुझे डर लग रहा है,” मैंने कहा। “क्योंकि अब तक हर नाम जो टोकन पर आया, वो किसी ऐसे आदमी का था जिससे मैं जानता था। श्यामलाल का नाम मैंने पहले कभी नहीं सुना।”
“और?”
“और अगर श्यामलाल ज़िंदा है,” मैंने कहा, “तो वो इस शहर में किसी ऐसी जगह बैठा है जहाँ से वो सब देख रहा है।”
पहरे ने मेरा हाथ थामा। “आज रात वो नहीं आएगा। वो अपना इंतज़ार करवाएगा।”
“कैसे पता?”
“क्योंकि मैं उससे पहले मिल चुका हूँ,” पहरे ने कहा। “बीस साल पहले। और उस दिन उसने मुझसे यही कहा था — ‘मैं अपना समय ख़ुद चुनूँगा।’”
मैंने पहरे की तरफ़ देखा। “तुमने मुझे ये कब बताना था?”
“आज,” उसने कहा। “क्योंकि आज पहली बार टोकन ने उसका नाम लिया।”
हम लौटकर गाड़ी में बैठे। सुबह की पहली किरण आसमान पर दिख रही थी। मेरी जेब में टोकन फिर ठंडा हो गया — बस एक बार, धीरे से, जैसे कह रहा हो — अभी नहीं।
बंसी ने गाड़ी चालू की। “कहाँ चलें?”
“अदालत,” मैंने कहा। “शेखर बाबू की बेटी की शादी है। उससे पहले एक काग़ज़ पूरा करना है।”
गाड़ी चली। सड़क सुनसान थी। और मेरी जेब में टोकन के साथ जो लिफ़ाफ़ा था — जिस पर शेखर बाबू की लिखाई में एक लाइन थी — “मुझे बचाने की कोशिश मत करना, वरना असली काग़ज़ हमेशा के लिए जल जाएगा” — वो मुझे हर मोड़ पर भारी लग रहा था।
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। “शेखर बाबू से आज मिलना है।”
“क्यों?”
“क्योंकि ये लिफ़ाफ़ा कुएँ के पास मिला था,” मैंने कहा। “और शेखर बाबू जानते हैं कि कुएँ पर कौन आता है।”
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। “तुम्हें लगता है कि शेखर बाबू ने ये लिफ़ाफ़ा ख़ुद रखा था?”
“नहीं,” मैंने कहा। “मुझे लगता है कि शेखर बाबू ने ये लिफ़ाफ़ा ख़ुद लिखा था — पर किसी और के कहने पर।”
गाड़ी अदालत की गली में घुसी। सामने, गली के मोड़ पर, एक सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी खड़ा था। उसके हाथ में एक छोटी लालटेन थी और वो बुझी हुई थी।
“रुको,” मैंने बंसी से कहा।
गाड़ी रुकी। वो आदमी आगे आया और खिड़की पर झुककर बोला, “मनोहर बाबू?”
“हाँ।”
“शेखर बाबू ने भेजा है। कह रहे हैं कि जो लिफ़ाफ़ा आपको मिला, उसे अदालत में मत खोलिए। पहले उनसे मिलिए।”
मैंने उसकी लालटेन देखी। “वो बुझी क्यों है?”
वो मुस्कुराया। “क्योंकि आज रात हिसाब में जो जला, वो मोमबत्ती नहीं थी।”
वो मुड़कर चला गया। बंसी ने गाड़ी आगे बढ़ाई।
“ये आदमी कौन था?” सुमन ने पूछा।
“नहीं पता,” मैंने कहा। “पर शेखर बाबू का आदमी नहीं लगा।”
“तो?”
“तो अब हमें शेखर बाबू से मिलना और भी ज़रूरी हो गया है।”
गाड़ी अदालत के गेट पर रुकी। मैंने गाड़ी से उतरकर गेट की तरफ़ देखा। सामने सीढ़ियों पर एक लिफ़ाफ़ा पड़ा था — वही पीला, वही मुड़ा हुआ। मैंने उसे उठाया और खोला। अंदर शेखर बाबू की लिखाई में एक लाइन थी — “मुझे बचाने की कोशिश मत करना, वरना असली काग़ज़ हमेशा के लिए जल जाएगा।”
मैंने लिफ़ाफ़ा सुमन को दिया। उसने पढ़ा और मेरी तरफ़ देखा।
“तो अब?” उसने पूछा।
“अब,” मैंने कहा, “हम शेखर बाबू को उनके हिसाब से बचाएँगे — अपने हिसाब से नहीं।”
और तभी मेरी जेब में टोकन फिर गरम हुआ — इस बार ज़ोर से। मैंने उसे निकाला।
उस पर एक नया शब्द उभरा था।
“जल्दी।”
॥
लिफ़ाफ़ा मेरे हाथ में था और मेरा दिल कुएँ में गिर रहा था। “मुझे बचाने की कोशिश मत करना, वरना असली काग़ज़ हमेशा के लिए जल जाएगा” — ये लाइन मैं तीसरी बार पढ़ रहा था और हर बार लग रहा था कि शेखर बाबू मुझसे नहीं, अपनी किस्मत से बात कर रहे हैं।
मैंने लिफ़ाफ़ा मुट्ठी में दबाकर कुएँ की मुंडेर पर हाथ मार दिया। पत्थर चटका नहीं, मेरी हथेली चटक गई।
और तभी जेब में टोकन ठंडा हुआ। एकदम बर्फ़ जैसा। मैंने निकाला तो उस पर एक ही शब्द खुदा था — “नीचे।”
“अब ये क्या?” बंसी ने गाड़ी का दरवाज़ा खोलते हुए कहा।
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