The Token System – Chapter 837
राजेंद्र ने चाबी संदूक में डाली। ताला एक लंबी चरचराहट के साथ खुला। अंदर ऊपर एक पुरानी मोटी खाता थी, उसके नीचे कुछ कपड़े और एक लकड़ी का डिब्बा। गोविंद राम ने खाता उठाया, पर राजेंद्र ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“पहले ये बताओ,” राजेंद्र ने कहा, “आप मुझे छोड़कर क्यों गए थे? माँ कहती थी कि आप रातों-रात चले गए और कभी नहीं लौटे।”
गोविंद राम ने खाता नीचे रख दिया। “क्योंकि उस रात रामलाल की तीसरी संदूक में जो था, वो मेरी जान ले सकता था। और मैं तुम्हें अपने साथ नहीं ले जा सकता था। नहीं तो वो तुम्हें भी मिटा देते।”
“कौन?”
“वही जिसने तेरी तस्वीर का चेहरा जलाया।” उसने राजेंद्र की तस्वीर की तरफ़ देखा। “मेरा चेहरा जलाने वाला अभी ज़िंदा है। और वो आज रात कुएँ पर आने वाला है।”
बंसी ऊपर से चिल्लाया। “मन्नू! बाहर रोशनी आ रही है!”
हम तीनों ऊपर देखने लगे। मैं दौड़कर रस्सी पकड़कर ऊपर चढ़ा। कुएँ से बाहर आते ही दिखा — दूर सड़क से एक गाड़ी की हेडलाइट आ रही थी। बंसी ने बत्ती बुझा दी।
“कौन?” मैंने पूछा।
“पता नहीं। पर गाड़ी पुलिस की नहीं है।”
गोविंद राम ऊपर आए। “मैं जानता हूँ कौन है।” उन्होंने जेब से एक काग़ज़ निकाला और मेरे हाथ में रखा। “ये तीसरे हिस्से का असली काग़ज़ है। मेरे बाप ने इस पर तीन नाम लिखे थे — और तीसरे के आगे सिर्फ़ एक निशान।”
मैंने काग़ज़ खोला। पुरानी स्याही में तीन नाम थे। तीसरे के आगे एक छोटा सा निशान बना था — एक जली हुई तस्वीर का निशान।
“ये राजेंद्र का नाम नहीं है,” मैंने कहा।
“क्योंकि राजेंद्र का नाम यहाँ नहीं लिखा। यहाँ लिखा है — गोविंद राम। और गोविंद राम नहीं हूँ मैं।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“मैंने कहा था ना,” गोविंद राम ने धीरे से कहा, “कि मैं अपने बाप का बेटा हूँ। पर मैं ख़ुद के नाम का नहीं रहा। जिसने मेरा चेहरा जलाया, उसने मेरा नाम भी जला दिया। आज कुएँ पर जो आ रहा है, उसका नाम वही है जो काग़ज़ में लिखा है — गोविंद राम।”
गाड़ी करीब आई और उसकी लाइट हम पर पड़ी। मैंने राजेंद्र की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद था, हाथ में तस्वीर कसकर पकड़ी थी।
“तो फिर,” राजेंद्र ने धीरे से कहा, “मेरे अब्बा कौन हैं?”
गोविंद राम ने उसका हाथ पकड़ा। “अब्बा वही हैं जो तुम्हें हमेशा से पाल रहे थे। बस उनका नाम किसी और ने चुरा लिया था। और आज रात वो नाम लौटाने आ रहा है।”
गाड़ी का दरवाज़ा खुला। मैंने टोकन जेब में महसूस किया — अचानक ठंडा नहीं, गरम हो गया था, जैसे किसी ने उसे छुआ हो।
“राजेंद्र,” मैंने कहा, “अपनी जेब देख।”
राजेंद्र ने जेब में हाथ डाला और जो निकाला, वो तस्वीर नहीं थी। एक पुरानी चिट्ठी थी, जो धूल भरी थी। उसने उसे खोला। चिट्ठी में सिर्फ़ एक लाइन थी, गोविंद राम के हाथ की लिखाई में — “तीसरे खाने का बेटा, तेरा बाप तेरे सामने खड़ा है। पर जो तेरे सामने खड़ा है, वो तेरा बाप नहीं।”
राजेंद्र ने चिट्ठी गोविंद राम की तरफ़ बढ़ाई। “ये क्या है?”
गोविंद राम ने चिट्ठी पढ़ी और उनका चेहरा पहली बार टूटा। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा — गाड़ी से एक आदमी उतर रहा था, जिसके हाथ में वही जली हुई तस्वीर थी।
“मैं तुम्हें बता नहीं पाया,” गोविंद राम ने धीरे से कहा, “कि जिसने मेरा चेहरा जलाया, वो मेरा भाई था। और वो आज भी मेरा चेहरा पहनकर घूमता है।”
राजेंद्र ने तस्वीर मेरे हाथ से छीन ली और उसे गोविंद राम के चेहरे के सामने रख दिया। “तो बताइए — इस तस्वीर में तीसरा कौन है? आप, या वो?”
गोविंद राम ने तस्वीर देखी। उनकी आँखों में पानी आ गया।
“दोनों,” उन्होंने कहा। “क्योंकि हम जुड़वाँ थे। और हमारे बाप ने दोनों का नाम एक ही रख दिया था — गोविंद राम।”
॥
राजेंद्र की उँगली तस्वीर पर थी और उसका होंठ काँप रहा था। “दोनों?” उसने गोविंद राम की तरफ़ देखा। “मतलब आप दोनों का नाम एक ही है?”
“हाँ,” गोविंद राम ने कहा। “बाप ने जान-बूझकर ऐसा किया। उसे लगा था कि दो बेटों को एक नाम देगा तो हिसाब में कभी फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। पर फ़र्क़ पड़ गया। एक नाम दो आदमियों के गले में ऐसा फँसा कि कोई ख़ुद को साबित ही नहीं कर पाया।”
“और तुमने मेरा चेहरा जलाया?” राजेंद्र की आवाज़ कड़ी हो गई।
गोविंद राम का चेहरा सख़्त हुआ। “मैंने कहा था कि उसने मेरा चेहरा जलाया। वो मेरी तस्वीर लेकर आया है। वो यहाँ आ रहा है। और अब जो होगा, वो तुम्हारी आँखों के सामने होगा।”
गाड़ी रुकी। दरवाज़ा खुला और उसमें से एक आदमी उतरा — गोविंद राम जैसा ही सफ़ेद कुर्ता, वैसी ही लंबाई, वैसा ही चलने का ढंग। फ़र्क़ बस इतना कि उसके एक तरफ़ का गाल चिकना था और दूसरे पर झुर्रियाँ गहरी थीं, जैसे आधा चेहरा किसी और का लगा हो।
उसने जली तस्वीर हवा में उठाई। “ये तस्वीर मेरे पास से चुराई गई थी। तुमने चुराई थी ना, राजेंद्र?”
राजेंद्र ने कुछ नहीं कहा।
“मैं तुम्हारा बाप हूँ,” उसने कहा। “इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि तुमने किसे अब्बा कहा। संदूक मेरी थी, चाबी मेरी थी, और तुम्हारा नाम भी मेरे हिसाब में लिखा है।”
“तो उस हिसाब में,” मैंने कहा, “क्या ये भी लिखा है कि तुमने अपने भाई का चेहरा क्यों जलाया?”
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी नज़रें टोकन वाली जेब पर नहीं गईं — वो सीधे मेरी आँखों में देख रहा था।
“क्योंकि वो मेरे हिस्से का काग़ज़ माँग रहा था,” उसने कहा। “और उस काग़ज़ पर एक ऐसा नाम लिखा था जो मुझे मिटाना था।”
“कौन सा नाम?”
“गोविंद राम,” उसने कहा। “मेरा नाम। जब दो लोगों का एक ही नाम हो और एक ही हिस्सा, तो हिसाब में तीन हो जाते हैं — भले घर में दो हों। बाप ने यही गड़बड़ की। और गड़बड़ सुधारने का एक ही रास्ता था — एक नाम मिटा दो।”
“तो तुमने भाई का चेहरा जलाया, नाम नहीं मिटाया,” राजेंद्र ने कहा। उसकी आवाज़ पहली बार इतनी ऊँची हुई। “तुमने आसान रास्ता चुना।”
“मैंने तुम्हें पाला!” उस आदमी ने कहा। “बचपन से तुम्हें कुएँ पर लाया, संदूक की चाबी दी, अपना नाम तुम्हारे हाथ में रखा — ताकि जिस दिन हिसाब खुले, तुम मेरे हिस्से की बात कर सको।”
“और उस दिन,” मैंने कहा, “तुम कहाँ छिपे रहे?”
वो मेरी तरफ़ मुड़ा। “तुमने मेरा नाम कई बार सुना, मनोहर। पर तुमने मुझे कभी देखा नहीं। क्योंकि जो नाम दो लोगों का हो, उसे पहचानने के लिए लोगों को एक चेहरा चाहिए। और भवानी ने मेरी तस्वीरें सब जगह से हटवा दी थीं। तुमने जिस ‘तीसरे’ को ढूँढा, वो मैं था — पर तुम्हारी तरह मैं काग़ज़ों में नहीं, चेहरों में छिपा था।”
बंसी ने धीरे से मेरा कंधा पकड़ा। “मन्नू, गाड़ी में एक और आदमी बैठा है।”
मैंने देखा — हाँ, ड्राइवर की सीट पर कोई था। और उसका बायाँ कान पीतल की छोटी अँगूठी से चमक रहा था।
“तुम्हारे साथ कौन है?” मैंने पूछा।
“वो मेरा मुंशी है,” उसने कहा। “जिसे तुम लोगों ने आज अदालत में बुलवाया था। वो बेचारा डर गया था। मैंने उसे समझाया कि जो काग़ज़ उसके पास है, वो मेरा है।”
“मोहम्मद इस्माइल?” राजेंद्र ने कहा।
“हाँ। गाड़ी उसी के नाम पर है। पर मेरी है।”
बंसी ने मेरे कान में कहा, “मन्नू, ये आदमी जो भी कहे, मुंशी ने अदालत में कहा था कि उसे धमकाकर गाड़ी ली गई थी। ये दोनों एक ही रास्ते पर नहीं हैं।”
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