The Token System – Chapter 834
हमने एक-दूसरे को देखा। वो हिला नहीं। फिर उसने धीरे से हाथ उठाया — सलाम की तरह नहीं, बल्कि जैसे कोई कहे — “देख लिया, अब आगे।”
और फिर वो पलटकर अड्डे की पिछली दीवार के पास गया और उसमें बने फाटक से बाहर निकल गया।
बंसी दौड़कर आया। “कौन था?”
“पता नहीं।” मैंने पर्ची उसके हाथ में दी। “पर इसने हमें बुलाया है।”
बंसी ने पर्ची पढ़ी। “बयान? किसका बयान? और कुआँ?”
“हवेली का कुआँ,” मैंने कहा। “या वो जगह जहाँ रामदीन ने कुछ छिपाया है।”
तभी मेरी जेब में टोकन गरम हुआ — इस बार लंबा, जैसे कोई मुझे कुछ कह रहा हो। मैंने निकालकर देखा तो उस पर एक शब्द उभरा।
“रात।”
मैंने पर्ची की तरफ़ देखा। “आज। रात।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। “तो आज रात कुएँ पर क्या होने वाला है?”
“पता नहीं,” मैंने कहा। “पर जो भी हो, उससे पहले शेखर बाबू को अदालत पहुँचाना है।”
बंसी ने मुंशी की कोठरी की तरफ़ देखा। “और ये?”
“ये हमारे साथ चलेगा।” मैंने कहा। “क्योंकि जिसकी आवाज़ भवानी से पुरानी है, वो शायद अदालत में सबसे ज़रूरी गवाह है।”
मुंशी कोठरी के दरवाज़े पर खड़ा था। उसने सब सुना था।
“मैं नहीं जाऊँगा,” उसने कहा।
“आपको जाना पड़ेगा,” मैंने कहा। “आपकी गाड़ी, आपकी चाबी, आपका फ़ोन। ये सब कुछ किसी की नज़र में आपको गवाह बनाता है। और गवाह को छिपकर नहीं, खड़े होकर बोलना पड़ता है।”
मुंशी ने मेरी तरफ़ देखा। फिर बंसी की तरफ़। फिर अपने जूते।
“मेरी बेटी…” उसने धीमे से कहा।
“आपकी बेटी को मैं जानता हूँ,” बंसी ने कहा। “वो सुबह स्कूल के फाटक पर खड़ी रहती है, नीला बस्ता। मैं उसे देखता हूँ। उसे कुछ नहीं होगा। ये मैं वादा करता हूँ।”
मुंशी की आँखें भर आईं।
“तो ठीक है,” उसने कहा। “पर पहले मुझे उन दोनों के लिखे अक्षर दिखाओ।”
“कौन से अक्षर?”
“जो उन्होंने मुझे लिखकर भेजे थे — फ़ोन के बाद।” उसने कमीज़ की जेब से मुड़ा काग़ज़ निकाला।
मैंने खोला। ऊपर कोना-चिह्न था — उलटा। और नीचे एक लाइन — “बयान देने वाले की तरह बोलना नहीं, गवाह की तरह।”
मैंने काग़ज़ बंसी को दिया।
“ये तो हमें भी मिला है,” बंसी ने धीमे से कहा।
“कब?”
“आज सुबह। मेरी दुकान के शटर के नीचे।” उसने अपनी जेब से एक और मुड़ा काग़ज़ निकाला।
दोनों काग़ज़ मैंने पास-पास रखे। कोना-चिह्न एक जैसा। लिखाई एक जैसी। और दोनों पर तारीख़ — आज।
मेरी जेब में टोकन फिर गरम हुआ। इस बार मैंने नहीं निकाला। बस महसूस किया।
मैंने मुंशी की तरफ़ देखा।
“चलिए,” मैंने कहा। “आपका बयान अदालत में दर्ज होगा। और फिर हम कुएँ जाएँगे।”
“कुएँ?” मुंशी ने पूछा। “कौन सा कुआँ?”
“जो आज रात कोई खोलने वाला है।”
बंसी ने गाड़ी स्टार्ट की। मैंने पर्ची को जेब में रखा और पीछे मुड़कर अड्डे को देखा। धूल में वो आदमी अब नहीं था, पर फाटक के पास कोई चीज़ बहुत धीरे-धीरे हिल रही थी — एक लटका हुआ लोहे का बोर्ड, हवा में।
जैसे कोई कहे — रास्ता खुला है।
गाड़ी सड़क पर पलटी और शहर की तरफ़ चली। अंधेरा होने लगा था और सामने अदालत की इमारत की बत्तियाँ दिखाई दे रही थीं।
शेखर बाबू ने धीमे से कहा, “मन्नू, आज रात अगर कुछ होता है तो याद रखना — जो कुएँ पर बुला रहा है, वो शायद अब तक किसी से नहीं मिला। वो पहली बार किसी से मिलेगा।”
“क्यों?”
“क्योंकि उसने अपनी आवाज़ किसी को नहीं सुनाई। वो सिर्फ़ काग़ज़ों से बोलता आया है।”
मैंने गाड़ी की खिड़की से बाहर देखा। अदालत के गेट पर भीड़ थी, अख़बार वाले थे, और बंसी के भतीजे की सफ़ेद कमीज़ दिख रही थी।
मैंने जेब में पर्ची दबाई और मुंशी की तरफ़ देखा। वो खिड़की से बाहर देख रहा था, होंठ हिल रहे थे — कुछ गिन रहा था, या कुछ याद कर रहा था।
“मुंशी जी,” मैंने कहा। “वो फ़ोन पर किसने कहा था — ‘गाड़ी दे दो’?”
उसने मेरी तरफ़ देखा। “एक औरत थी।”
बंसी ने ब्रेक नहीं मारा, पर गाड़ी धीमी हुई।
“औरत?”
“आवाज़ औरत की थी। पर…” वो रुक गया। “पर बोलने का ढंग भवानी जैसा था।”
“कभी भवानी ने औरत की आवाज़ में बात की है?”
“नहीं।” मुंशी ने खिड़की से बाहर देखा। “कभी नहीं।”
गाड़ी अदालत के गेट पर रुकी। राजेंद्र बाहर आया और खिड़की पर झुका।
“सुनवाई दो टोकर शुरू हुई है। हरीश चंद्र ने मोहलत ले ली है।” उसने मेरी तरफ़ देखा। “और तुम्हारे पास जो पर्ची है — ‘बयान, कुआँ, आज, रात’ — वो मुझे भी मिली है। हूबहू।”
“कब?”
“अभी। अदालत के पीछे, ईंटों के नीचे से।”
हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा।
राजेंद्र ने धीमे से कहा, “मन्नू, इसका मतलब जो हमें बुला रहा है, वो हम दोनों को एक साथ बुला रहा है।”
“और शेखर बाबू को?”
“शायद उन्हें भी।”
मैंने पीछे मुड़कर देखा। शेखर बाबू गाड़ी से उतर रहे थे, एक हाथ से गाड़ी का दरवाज़ा पकड़े, नंगे पैर — एक जूता अड्डे पर छूट गया था।
“राजेंद्र,” मैंने कहा, “ये मुंशी जी हैं। इनका बयान पहले दर्ज कराओ। फिर चाहे जो हो।”
राजेंद्र ने मुंशी को देखा। मुंशी ने अपना मुँह पोंछा और सीधा खड़ा हो गया।
“चलिए,” राजेंद्र ने कहा।
मैं गाड़ी से उतरा। उसी वक़्त जेब में टोकन फिर गरम हुआ — एक बार, तेज़ — और उस पर शब्द उभरा।
“हिसाब।”
मैंने आसमान की तरफ़ देखा। अंधेरा घिर रहा था। और अदालत के पीछे, जहाँ राजेंद्र को पर्ची मिली थी, वहाँ से कोई परछाईं तेज़ी से आगे बढ़ी और पेड़ों की तरफ़ ग़ायब हो गई।
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
“कुएँ पर मिलेंगे,” मैंने कहा। “रात को।”
॥
राजेंद्र ने मेरी तरफ़ देखा और मेरी जेब की तरफ़ भी — जैसे उसे पता हो कि टोकन अभी भी वहीं है।
“तुम अंदर चलो,” मैंने कहा। “मुंशी जी का बयान दर्ज कराओ। मैं हरीश चंद्र से मिलकर आता हूँ।”
राजेंद्र कुछ कहने ही वाला था कि बंसी ने गाड़ी का दरवाज़ा खोल दिया और शेखर बाबू को उतारने लगा। शेखर बाबू ने एक हाथ से बंसी का कंधा पकड़ा और दूसरे हाथ से अपना नंगा पैर ज़मीन पर रखा।
“मेरी चप्पल किसी को मिले तो रख लेना,” उन्होंने कहा, और इस बात पर मुझे हँसी आ गई — ऐसे वक़्त पर ऐसी बात।
अदालत का बरामदा खाली था। बेंच पर सिर्फ़ दो लोग बैठे थे — एक बूढ़ा आदमी जिसकी गोद में फटा बैग था, और एक औरत जिसने अपने सिर पर काला दुपट्टा डाल रखा था। दोनों मेरी तरफ़ नहीं देखा।
हरीश चंद्र पिछले कमरे में थे, मेज़ पर फ़ाइलें फैली हुई थीं। वो चश्मा उतारकर पोंछ रहे थे।
“अंदर आओ,” उन्होंने कहा, बिना मेरी तरफ़ देखा।
मैंने दरवाज़ा बंद किया और सीधे उनकी मेज़ के सामने खड़ा हो गया।
“भवानी हथकड़ी में है,” मैंने कहा। “पर उसके आदमी आज सुबह शेखर बाबू को उठाकर ले गए। मुंशी की गाड़ी में। काकी के घर से।”
हरीश चंद्र ने चश्मा पहना। “शेखर बाबू अभी कहाँ हैं?”
“बाहर बेंच पर। नंगे पैर। एक जूता गाड़ी में छूट गया।” मैंने जेब से पर्ची निकाली। “और ये — आज सुबह मुझे मिली। हूबहू यही राजेंद्र को भी मिली। अदालत के पीछे ईंटों के नीचे से।”
हरीश चंद्र ने पर्ची पढ़ी। उनके चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी। उन्होंने पर्ची मेज़ पर रखी और उस पर उँगली रख दी।
“मन्नू, तुम समझ रहे हो कि इसका मतलब क्या है?”
“मतलब ये कि भवानी अंदर है, पर उसका हाथ बाहर भी चल रहा है।”
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