The Token System – Chapter 835
“नहीं।” उन्होंने उँगली उठाई। “मतलब ये कि भवानी अंदर है और उसे इसकी ज़रूरत नहीं पड़ रही। जो बाहर चला रहा है, वो भवानी नहीं है।”
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
“फिर कौन?”
“यही तो मैं पूछने वाला था।” उन्होंने पर्ची उठाई और मेरी तरफ़ बढ़ा दी। “ये मामला अब जज के सामने जाएगा। आज रात कुएँ पर मत जाओ। पहले मैं राजेंद्र से बात करता हूँ।”
“रात का वक़्त तय है। पर्ची में लिखा है।”
“पर्ची में लिखा है — ‘बयान। कुआँ। आज। रात।’” हरीश चंद्र ने मेरी आँखों में देखा। “इसमें ये नहीं लिखा कि तुम जाओगे।”
मैं कुछ कहता, उससे पहले बाहर से बंसी की आवाज़ आई।
“मन्नू! फ़ोन!”
मैं बाहर निकला। बंसी ने अपना मोबाइल मेरी तरफ़ बढ़ाया, स्क्रीन पर सुमन का नाम था।
“मन्नू,” सुमन की आवाज़ तेज़ थी, जैसे वो भागते-भागते बोल रही हो। “मैं अस्पताल के रिकॉर्ड कमरे में हूँ। पुरानी तहसील की फ़ाइलें मिलीं — रामलाल की ज़मीन का मुकदमा, पुराना रजिस्टर उसमें सिला हुआ था।”
“क्या मिला?”
“रामलाल के तीन बेटों के नाम।” वो रुकी, काग़ज़ पलटने की आवाज़ आई। “पहला भगवान सिंह, दूसरा रामदीन — और तीसरा…”
“तीसरा?”
“गोविंद राम।”
नाम सुनकर मेरे हाथ में मोबाइल भारी हो गया।
“फ़ाइल में आगे क्या लिखा है?”
“लिखा है कि गोविंद राम का बेटा शहर छोड़कर चला गया था और उसका पता आज तक नहीं मिला। और मन्नू…” उसकी आवाज़ धीमी हुई। “फ़ाइल के कोने पर एक निशान है। वही उल्टा कोना-चिह्न।”
फ़ोन रखकर मैं वापस हरीश चंद्र के कमरे में गया। उन्होंने मेरा चेहरा देखकर काग़ज़ रख दिया।
“कुछ मिला?”
“रामलाल के तीसरे बेटे का नाम — गोविंद राम।”
हरीश चंद्र ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस अपनी कुर्सी की पीठ से टेक लगाई।
“राजेंद्र कहाँ है?” मैंने पूछा।
“अंदर, जज के सामने।”
मैं वहीं से मुड़ा और अंदर के हॉल में चला गया। राजेंद्र पहली बेंच पर बैठा था, हाथ जोड़े, सामने जज साहब अपना चश्मा ठीक कर रहे थे। मुंशी एक तरफ़ खड़ा था, हाथ में पुराना रजिस्टर।
मैं धीरे से राजेंद्र के पास बैठ गया।
“गोविंद राम,” मैंने फुसफुसाकर कहा।
राजेंद्र का हाथ जोड़े हुए ही रुक गया। उसकी गर्दन मेरी तरफ़ मुड़ी और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
“क्या कहा?”
“रामलाल का तीसरा बेटा। गोविंद राम।”
राजेंद्र ने होंठ हिलाए, पर आवाज़ नहीं निकली। उसने आँखें बंद कीं और फिर खोलीं।
“ये नाम मैंने कभी नहीं सुना,” उसने कहा।
“कैसे नहीं सुना? तुम ख़ुद रामलाल के पोते हो।”
“मैं रामलाल के पोते का काग़ज़ रखता हूँ,” राजेंद्र ने धीमे से कहा। “पर वो मेरा बाप नाम से कभी नहीं आया। मेरे बाप का नाम गोविंद था।”
हम दोनों ख़ामोश बैठे रहे। जज साहब ने मुंशी से पहला सवाल पूछा — “अपना नाम बताइए” — और मुंशी की आवाज़ गूँजी।
“मोहम्मद इस्माइल। उम्र पचास। पेशा — ट्रांसपोर्ट अड्डे पर मुंशी का काम।”
राजेंद्र ने मेरी तरफ़ मुड़कर, बहुत धीमे से कहा, “मेरे बाप गोविंद कहलाते थे, पर घर में कोई उन्हें पूरा नाम लेकर नहीं बुलाता था। बस ‘गोविंदू’। और मेरे पास उनकी कोई तस्वीर भी नहीं।”
“कभी पूछा नहीं कि वो कहाँ से आए?”
“पूछा था।” राजेंद्र ने अपने हाथों की तरफ़ देखा। “एक बार। तब मैं छोटा था। उन्होंने कहा — ‘जब हिसाब का वक़्त आएगा, तब नाम आएगा।’ और फिर कभी नहीं बोले।”
मुंशी का बयान चल रहा था — गाड़ी, धमकी, औरत की आवाज़, बेटी का स्कूल। जज साहब कभी-कभी सवाल करते थे, मुंशी हर बार एक ही बात दोहरा देता था — “मैंने गाड़ी इसलिए दी क्योंकि डर था।”
मैं उठा और बाहर बंसी के पास आया। बंसी ने मुझे देखकर सिगरेट जलाई — पर धुआँ नहीं खींचा, सिर्फ़ बुझाया।
“कुछ गड़बड़ है?” उसने पूछा।
“राजेंद्र का बाप गोविंद। और रामलाल के तीसरे बेटे का नाम भी गोविंद।”
बंसी ने सिगरेट ज़मीन पर पटकी और पैर से मसल दी।
“और राजेंद्र क्या कहता है?”
“कहता है कि नाम कभी नहीं सुना। पर उसका चेहरा बता रहा था कि वो झूठ नहीं बोल रहा — वो ख़ुद उलझ गया है।”
बंसी ने होंठ काटे। “मन्नू, अगर राजेंद्र का बाप ही रामलाल का तीसरा बेटा निकला, तो जो काग़ज़ उसने लिफ़ाफ़े से निकाला था — वो उसका अपना हिसाब है।”
मैं वहीं खड़ा रह गया। बरामदे की छत से एक पंखा चल रहा था, जिसकी आवाज़ बीच-बीच में आती थी।
“और शेखर बाबू?” मैंने पूछा।
“अंदर। हरीश चंद्र के साथ।”
मैं अंदर गया। शेखर बाबू कुर्सी पर बैठे थे — किसी ने उन्हें चप्पल पहना दी थी, जो पैर में बड़ी लग रही थी। हरीश चंद्र उनके सामने खड़े थे।
“मन्नू,” हरीश चंद्र ने कहा, “शेखर बाबू कह रहे हैं कि उन्हें उठाने वाले दो लोगों में से एक के हाथ में पीतल की मोटी अंगूठी थी।”
शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा। “वो बात करते वक़्त ‘साहब’ कह रहा था। पर साहब से नहीं, किसी और से। फ़ोन पर। और फ़ोन वाले की आवाज़ औरत की थी, पर शब्द भवानी के थे।”
“आपने पहले भी यही कहा था,” मैंने कहा। “मुंशी जी ने भी।”
“पर एक बात मैंने अब तक नहीं बताई।” शेखर बाबू ने अपनी जेब में हाथ डाला और कुछ निकालने की कोशिश की, फिर रुक गए। “जब वो मुझे गाड़ी में बैठा रहे थे, तब एक काग़ज़ फ़ोन वाले ने पढ़कर सुनाया था। उसमें लिखा था — ‘शेखर बाबू बोलेंगे तो बेटी का नाम मिट जाएगा।’ मैंने कहा — ‘मेरी बेटी का नाम किसी काग़ज़ में नहीं।’ और वो हँसा।”
“क्या कहा उसने?”
“उसने कहा — ‘अभी नहीं है। कल होगा।’” शेखर बाबू की आवाज़ भर्रा गई। “मन्नू, कल मेरी बेटी की शादी है।”
हरीश चंद्र ने बीच में कहा, “मैं जज साहब से बात करता हूँ। शादी की सुरक्षा के लिए पुलिस बढ़ेगी। और आज रात के कुएँ वाले मामले पर भी हुक्म चाहिए — राजेंद्र को साथ भेजने का।”
“मैं जाऊँगा,” मैंने कहा।
हरीश चंद्र ने मेरी तरफ़ देखा, फिर मुड़कर जज साहब के पास चले गए।
मैं बाहर आया। शाम हो चुकी थी। अदालत के गेट पर भीड़ कम हो गई थी। बंसी गाड़ी के पास खड़ा था और उसके पास एक पतला आदमी खड़ा था — सफ़ेद कुर्ता, हाथ में लिफ़ाफ़ा।
“मन्नू,” बंसी ने कहा, “ये कह रहा है कि इसका नाम गोविंद है।”
मैं रुक गया।
“गोविंद?”
आदमी ने अपना लिफ़ाफ़ा आगे किया। “मैं रामलाल का बेटा हूँ। तीसरे नंबर का। मेरा पूरा नाम गोविंद राम है।”
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी के हाथ की उँगलियाँ मुड़ गईं, पर वो कुछ नहीं बोला।
“अंदर चलिए,” मैंने कहा।
आदमी वहीं खड़ा रहा। “मैं अंदर नहीं जाऊँगा।” उसने लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ाया। “ये काग़ज़ मेरे पास सालों से है। इसमें लिखा है कि तीसरा हिस्सा किसका। पर मैं उसे उस आदमी को देने आया हूँ जो आज अंदर बैठा है।”
“राजेंद्र को?”
“अपने बेटे को।”
मेरे हाथ ठंडे हो गए। “राजेंद्र तुम्हारा बेटा है?”
“उसे ये नहीं पता।” आदमी ने लिफ़ाफ़ा मेरे हाथ में रख दिया। “और आज रात कुएँ पर जो मिलेगा, वो भी नहीं जानता कि वो किसका है।”
वो मुड़ा और चल दिया। दस कदम जाकर वो रुका और बिना पलटे बोला, “बता देना — तीसरे खाने का नाम किसी काग़ज़ में नहीं लिखा गया, क्योंकि वो ख़ुद किसी काग़ज़ का नहीं रहा।”
मैं लिफ़ाफ़ा लेकर अंदर भागा। मुंशी का बयान ख़त्म हो चुका था, सुनवाई टल गई थी। राजेंद्र बेंच से उठ रहा था। मैंने उसका हाथ पकड़ा।
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