The Token System – Chapter 833
छोटू ने ज़मीन पर उँगली से खींचा — दो आड़ी लकीरें, नीचे बिंदु। उलटा कोना-चिह्न।
“ये तो सफ़ेद कुर्ते वाले की गाड़ी पर था।” बंसी ने कहा।
“और उन आदमियों ने कुछ कहा?” मैंने काकी से पूछा।
“एक बोला — ‘साहब ने बुलाया है। ज़्यादा बोलोगे तो तेरा भी बंदोबस्त हो जाएगा।’” काकी ने रोते हुए कहा।
शेखर बाबू पिछली सीट पर बैठे थे। जब उन्होंने काकी की बात सुनी तो वो आगे झुके।
“काकी, आपने उन्हें मेरी बाँह पकड़ते देखा? पक्का ये मैं ही था?”
काकी एक पल रुकीं।
“अरे बाबा, तुम हो या नहीं हो, ये मुझे क्या पता। मैंने तो आवाज़ सुनी। साहब साहब कर रहे थे।”
मैंने शेखर बाबू की तरफ़ देखा। वो मेरे ही गाड़ी में बैठे थे। तो फिर काकी के घर से किसे उठाया?
“काकी, आपने मुझे फ़ोन किया था?”
“फ़ोन? मैंने तो पड़ोसन को भेजा था।” काकी ने छोटू का सिर सहलाया। “मैंने कहा था, कहीं जाकर मन्नू को बुला।”
मेरी जेब में टोकन गरम हुआ — एक झटका। मैंने चुपके से जेब में हाथ डाला। ठंडा हो गया था। बस एक बार। मुझे लगा जैसे उसने मुझे पीछे धकेला हो।
“छोटू,” मैंने कहा, “वो गाड़ी किस तरफ़ गई थी?”
“शहर के बाहर। मैं साइकिल पर दौड़ा, पर वो तेज़ थी। मैंने देखा, वो सीधी ट्रांसपोर्ट अड्डे की तरफ़ मुड़ी।”
बंसी ने गाड़ी स्टार्ट की।
“बैठो, काकी,” मैंने कहा। “आप और छोटू भी चलो। एक तुम्हें घर नहीं छोड़ूँगा।”
बंसी ने गाड़ी पलटी। अदालत की इमारत दाईं तरफ़ रह गई।
पीछे से राजेंद्र का फ़ोन आया। मैंने स्पीकर पर लिया।
“मन्नू, कहाँ हो? सुनवाई शुरू होने वाली है।”
“राजेंद्र, एक बात है। शेखर बाबू मेरे पास हैं।”
“क्या मतलब?”
“काकी के घर से दो आदमी एक आदमी को उठा ले गए। वो शेखर बाबू थे या नहीं, पता नहीं। पर शेखर बाबू असली मेरे पास बैठे हैं। तो फिर काकी को कौन दिखा?”
लाइन पर सन्नाटा।
“तो कोई और था,” राजेंद्र ने धीमे से कहा। “शेखर बाबू जैसा दिखने वाला।”
“या फिर शेखर बाबू ही दो थे।”
“चलते रहो,” राजेंद्र ने कहा। “मैं हरीश चंद्र को बताकर तुम्हें फ़ोन करता हूँ। और मन्नू — अड्डे पर अकेले मत घुसना।”
फ़ोन कट गया।
ट्रांसपोर्ट अड्डा शहर से बाहर था — पुरानी सड़क के किनारे, पीली दीवार वाला बड़ा आँगन, जहाँ खड़ी गाड़ियाँ धूल में लिपटी रहती थीं। दिन ढलने लगा था और आँगन में बस दो-तीन गाड़ियाँ बची थीं।
बंसी बाहर ही गाड़ी रोककर उतरा।
“मैं देखता हूँ।”
“अकेले नहीं,” मैंने कहा।
“तू आगे, मैं पीछे,” बंसी ने कहा और अपनी टूटी कलाई ऊँची उठा दी। “देख तो, मैं किसी को मार भी नहीं सकता।”
हम आँगन में घुसे। छत वाला पुराना फाटक खुला था। पीछे ओर धूल में गाड़ी के टायरों के ताज़े निशान थे।
“वो रही,” छोटू ने इशारा किया।
कोने में एक सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी। बोनट पर धूल थी, पीछे का दरवाज़ा खुला। मैंने दौड़कर देखा। पिछली सीट पर पिछले दरवाज़े तक एक खिंचाव था — किसी को खींचकर उतारा गया था। और फ़र्श पर एक जूता पड़ा था। भूरे चमड़े का, घिसा हुआ, बाएँ पैर का।
शेखर बाबू ने जब वो जूता देखा तो वो गाड़ी से ही बाहर झुक गए।
“ये मेरा है,” उन्होंने कहा। “मेरे बाएँ पैर का। मैं अदालत में इसे पहनकर आया था।”
“तो आपका जूता यहाँ कैसे?”
“मतलब वो…” उन्होंने गला साफ़ किया। “वो मुझे यहाँ तक ले आया। और फिर किसी ने उसे यहाँ उतारकर…” वो पूरा वाक्य नहीं बोल पाए।
बंसी गाड़ी के दरवाज़े पर झुका। अंदर डैशबोर्ड के पास काग़ज़ का एक टुकड़ा फँसा था। उसने खींचकर निकाला।
“काग़ज़ देख,” उसने मुझे दिया।
पुराना हरा कार्ड था — गाड़ी के रजिस्ट्रेशन का।
“मालिक का नाम?” मैंने पढ़ा। “मोहम्मद इस्माइल।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
“फ़तेह का चचेरा भाई। वही जिसे कल हिरासत में लिया था।”
“तो गाड़ी उसके नाम पर है, और वो हिरासत में है। इसका मतलब गाड़ी किसी और की है।”
“ये गाड़ी अड्डे के मुंशी के नाम पर चलती है,” बंसी ने कहा। “असल में उसके भतीजे के नाम पर। पर मालिक वो है। और वो मुंशी भवानी का पुराना आदमी है। पंद्रह साल से इसी अड्डे पर बैठा है।”
“अच्छा।” मैंने चारों तरफ़ देखा। “तो मुंशी कहाँ है?”
“वो दफ़्तर में बैठता है।” बंसी ने आँगन के कोने की तरफ़ इशारा किया, जहाँ एक छोटी कोठरी थी। उसके ऊपर टिन का शेड था।
कोठरी का दरवाज़ा खुला था और अंदर अंधेरा था। बंसी ने दरवाज़े पर दस्तक दी। कोई जवाब नहीं।
“मुंशी जी!” बंसी ने आवाज़ दी।
अंदर से किसी के हिलने की आवाज़ आई। मैंने दरवाज़ा खोला। अंदर लकड़ी की मेज़ थी, ऊपर काग़ज़ों का ढेर, और एक कोने में टूटी कुर्सी। मेज़ पर चाय का कप रखा था, आधा भरा, ऊपर तकिया। और कुर्सी पर बैठा था एक आदमी — पचास के आसपास, दुबला, धोती-कुर्ता, चश्मा।
“मुंशी जी?”
उसने सिर उठाया। आँखें लाल थीं, जैसे रो रहा हो।
“कौन?”
“मन्नू।”
“मन्नू…” उसने उँगली से मुँह पोंछा। “तुम वो हो जो हवेली में रहता है?”
“नहीं। मैं वो हूँ जो हवेली का हिसाब ढूँढ रहा है।”
उसने मेरी तरफ़ देखा और फिर बंसी की तरफ़।
“बंसी, तू इसे लेकर आया? तुझे पता नहीं, अड्डे पर आज रात क्या होने वाला है?”
“क्या होने वाला है?” मैंने पूछा।
वो उठा और दरवाज़ा बंद करने लगा। “जाओ। मुझे कुछ नहीं पता।”
मैंने दरवाज़ा रोका।
“मुंशी जी, वो गाड़ी बाहर खड़ी है। उस पर उलटा कोना-चिह्न है। उसी गाड़ी से एक आदमी को उठाकर लाया गया। अगर आपको पता है कि कौन लाया, तो बताइए। मैं उसे पुलिस तक पहुँचा दूँगा।”
वो काँपने लगा। उसने चश्मा उतारा, साफ़ किया, फिर लगाया।
“गाड़ी मेरी है, पर उससे मेरा वास्ता नहीं।” उसकी आवाज़ टूट गई। “कल रात से कोई मुझे फ़ोन कर रहा है — ‘गाड़ी दे दो, वरना तेरी बेटी का दाख़िला रद्द।’”
“आपने गाड़ी दी?”
“मैंने क्या करना था?” वो फूट-फूटकर रोने लगा। “मेरी बेटी पाँच साल से उसी स्कूल में है। उसकी माँ नहीं है। मैं ही हूँ। मैंने गाड़ी की चाबी मेज़ पर रख दी और कह दिया — ले जाओ।”
“कौन ले गया?”
“काले कुर्ते वाले दो आदमी। एक ने मुँह पर कपड़ा बाँधा था।”
“और आज?”
“आज सुबह फिर फ़ोन आया। कहा — बस आज रात आख़िरी बार गाड़ी चाहिए। कुआँ वाली जगह।”
मेरे कान खड़े हो गए।
“कुआँ वाली जगह?”
“मुझे नहीं पता। मैंने कहा, मुझे कुछ नहीं पता।”
“फ़ोन पर किसकी आवाज़ थी?”
मुंशी ने मेरी तरफ़ देखा और फिर धीमे से बोला, “आवाज़ पहचानी-सी थी। पर मैं कुछ नहीं कहूँगा।”
“क्यों?”
“क्योंकि वो आवाज़ भवानी की नहीं है। वो आवाज़ उससे भी पुरानी है।”
बाहर आकर मैंने काकी और छोटू को गाड़ी में बैठा दिया और बंसी से कहा, “तू मुंशी को लेकर यहीं रुक। मैं अंदर जाकर देखता हूँ।”
“क्या देखेगा?”
“वो गाड़ी। मैं उसकी पिछली सीट के नीचे देखना चाहता हूँ।”
मैं गाड़ी के पास लौटा। पिछला दरवाज़ा अब भी खुला था। मैं अंदर झुका और सीट के नीचे हाथ डाला। उँगलियों को कुछ लगा — काग़ज़। मैंने निकाला। एक फटी पर्ची थी, किनारे जले हुए। जैसे किसी ने जलाने की कोशिश की हो और आधी बच गई हो।
उस पर चार शब्द बचे थे — “बयान। कुआँ। आज। रात।”
मैंने पलटकर देखा। पीछे, दूर आँगन के कोने में, धूल में कोई खड़ा था। मुँह पर काला कपड़ा। हाथ में लाठी नहीं।
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