The Token System – Chapter 832
"किस तरफ़ गया?"
"पीछे वाली गली की तरफ़।"
मैंने बंसी को देखा। "पीछे वाली गली — वो तहसील का छोटा रास्ता है ना?"
बंसी का चेहरा कड़ा हो गया। "हाँ।"
"तो वो तहसील ही गया है।"
हम गाड़ी की तरफ़ भागे। बंसी ने गाड़ी स्टार्ट की और मैं बैठते-बैठते फ़ोन निकाला।
"राजेंद्र?"
"हाँ?"
"अदालत में जो शेखर बाबू बैठे हैं — उनके पास जाकर उनसे पूछ — 'काग़ज़ गाड़ी में' का क्या मतलब है।"
"क्या?"
"करना! और जो जवाब मिले, मुझे बताना। मैं तहसील जा रहा हूँ।"
गाड़ी ने मोड़ लिया और बंसी ने पैर दबाया। मैंने पीछे मुड़कर देखा — काकी के दरवाज़े पर भीड़ अब भी थी, पर छोटू का चेहरा दिख नहीं रहा था। दरवाज़ा बंद हो गया था।
पुराना तहसील दफ़्तर शहर के किनारे था — पीली इमारत, बंद खिड़कियाँ, और सामने लोहे का जंग लगा गेट।
हम पहुँचे तो गेट खुला था।
"कोई अंदर है," बंसी ने कहा।
मैंने गाड़ी रोकी और उतरा। सामने की सीढ़ियों पर धूल में एक ताज़ा पैरों का निशान था — और उसके साथ कुछ और — एक छोटा सा काग़ज़, धूल में आधा दबा।
मैंने उठाया। पीला काग़ज़, मुड़ा हुआ। खोला। उस पर एक ही लाइन थी, मेरी ही लिखाई में — "जो नाम कटा है, वो नाम एक नहीं, दो थे।"
मैंने बंसी की तरफ़ देखा।
"मैंने ये नहीं लिखा।"
बंसी ने काग़ज़ देखा, फिर मेरी तरफ़। "पर लिखाई तेरी है।"
मैंने काग़ज़ जेब में रखा और सीढ़ियाँ चढ़ना शुरू किया। अंदर का गलियारा अंधेरा था। दोनों तरफ़ बंद दरवाज़े, धूल, और दूर किसी कमरे से आती रोशनी।
तभी ऊपर के कमरे से एक आवाज़ आई — धीमी, हँसती हुई, दोहराती हुई।
"काग़ज़ गाड़ी में… काग़ज़ गाड़ी में…"
बंसी ने मेरा हाथ पकड़ा।
"मन्नू, ये आवाज़ शेखर बाबू की है।"
"मुझे भी लगी।"
हम ऊपर की सीढ़ी चढ़ने लगे। मेरी जेब में टोकन ठंडा था — एकदम ठंडा, पत्थर जैसा।
ऊपर के कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था। मैंने धक्का दिया।
कमरे के बीच एक कुर्सी थी, और कुर्सी पर कोई बैठा था — पीठ मेरी तरफ़, सिर झुका हुआ, सफ़ेद कुर्ता।
"शेखर बाबू?" मैंने कहा।
वो नहीं हिला। बस वही आवाज़ — "काग़ज़ गाड़ी में… काग़ज़ गाड़ी में…"
मैंने दो कदम बढ़ाए और कुर्सी के सामने आकर खड़ा हो गया।
शेखर बाबू नहीं थे।
कुर्सी पर एक पुराना शीशा रखा था — टूटा हुआ, धूल में ढका — और शीशे के सामने एक छोटा टेप रिकॉर्डर चल रहा था, जिससे वो आवाज़ आ रही थी।
मैंने रिकॉर्डर बंद किया। कमरा चुप हो गया।
और उसी चुप्पी में, कमरे की दूसरी तरफ़ से — एक बंद दरवाज़े के पीछे से — किसी के सिसकने की आवाज़ आई।
बंसी ने धीरे कहा, "ये कौन है?"
मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। दरवाज़े पर एक अलमारी आड़ी रखी थी — जैसे किसी ने बाहर से बंद कर दिया हो।
"हटा," मैंने कहा।
हम दोनों ने अलमारी खींची। दरवाज़े की कुंडी उठाई और दरवाज़ा खोला।
अंदर अंधेरा था, और उस अंधेरे में एक कोने में कोई बैठा था — घुटनों में सिर दिए, सफ़ेद कुर्ता, बिखरे बाल।
"शेखर बाबू?" मैंने धीरे कहा।
सिर उठा।
वो शेखर बाबू थे। आँखों में डर, होंठ सूखे, और दोनों हाथों में एक काग़ज़ दबाए हुए।
उन्होंने मुझे देखा और फुसफुसाए, "काग़ज़ गाड़ी में नहीं है।"
"क्या?"
"काग़ज़ गाड़ी में नहीं है!" वो ज़ोर से बोले, फिर काँपकर रुक गए। "जो गाड़ी में था, वो मेरे पास है। और जो गाड़ी में नहीं था, वो मेरे सिर में है।"
मैं उनके पास घुटनों के बल बैठ गया।
"शेखर बाबू, आप कैसे यहाँ?"
उन्होंने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने खोला। उस पर सेठ गोवर्धनदास की मुहर थी और नीचे मोटे हाथों में लिखी एक लाइन — "दो नाम काटे गए। बाकी दो ने खुद को काट लिया।"
"ये कहाँ से लाए आप?"
"वो आदमी लाया।" उनकी आवाज़ फिर काँपी। "वो मुझे अदालत से उठाकर लाया। कहा — चलो, तुम्हें गाड़ी वाला काग़ज़ दिखाता हूँ। और मैं… मैं चला आया। मुझे कुछ समझ नहीं आया।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा। "कौन आदमी?"
"वही जो सुबह अदालत में था। सफ़ेद कुर्ता। कोई अंगूठी नहीं। पर उसकी आवाज़…" शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा। "उसकी आवाज़ भवानी की आवाज़ थी।"
बंसी ने पीछे से कहा, "भवानी तो हथकड़ी में है।"
"मुझे पता है," शेखर बाबू ने कहा। "इसीलिए तो मैं डरा हुआ हूँ।"
मैंने उन्हें उठाया। "चलिए, यहाँ से।"
हम सीढ़ियों से उतर रहे थे कि मेरा फ़ोन बजा। राजेंद्र।
"मन्नू, जो अदालत में बैठा है, उससे पूछा।"
"क्या कहा?"
"उसने कहा — 'काग़ज़ गाड़ी में' का मतलब है कि जो सबूत गाड़ी में था, वो अब गाड़ी से निकलकर अदालत के रिकॉर्ड में जा चुका है।"
मैं रुक गया।
"पर उसने एक और बात कही," राजेंद्र की आवाज़ धीमी हुई। "उसने कहा कि तहसील के पुराने कमरे में अभी भी एक काग़ज़ है, जिस पर असली नाम है। और वो काग़ज़ किसी को नहीं मिलेगा — क्योंकि वो काग़ज़ काग़ज़ नहीं है।"
"तो क्या है?"
"उसने कहा — 'वो आदमी है।'"
मैंने फ़ोन काटा।
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "अब?"
मैंने शेखर बाबू की तरफ़ देखा — वो सीढ़ी की रेलिंग पकड़े खड़े थे, हाथ में वो काग़ज़ दबाए।
"पहले इन्हें अदालत पहुँचाते हैं," मैंने कहा। "फिर तहसील।"
हम नीचे उतरे। दरवाज़े तक आते-आते मेरी जेब में टोकन गरम हुआ — एक बार, धीरे से — और उस पर एक शब्द उभरा।
"देख।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा — हम जिस कमरे में थे, उसकी खिड़की पर कोई खड़ा था। सफ़ेद कुर्ता। मुँह पर कपड़ा।
हमारी नज़र मिली। और वो मुड़कर भाग गया।
बंसी दौड़ा, पर सीढ़ियों के मोड़ पर रुक गया।
"भाई," उसने लौटकर कहा, "पीछे का दरवाज़ा खुला है। वो निकल गया।"
मैंने शेखर बाबू की तरफ़ देखा। वो काँप रहे थे।
"चलिए," मैंने कहा। "यहाँ नहीं रुकना।"
हम गाड़ी में बैठे। बंसी ने गाड़ी आगे बढ़ाई और मैंने खिड़की से बाहर देखा — पुराने तहसील दफ़्तर की इमारत पीछे छूट रही थी, और उसकी छत पर कोई खड़ा था।
मैंने आँखें सिकोड़कर देखा। वो सफ़ेद कुर्ते में था, और उसका हाथ ऊपर उठा हुआ था — जैसे कोई सलाम कर रहा हो, या कोई शुरुआत।
शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू, ये काग़ज़ तुम रख लो।"
मैंने लिया। काग़ज़ पर सेठ की मुहर और वो लाइन — "दो नाम काटे गए। बाकी दो ने खुद को काट लिया।"
मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा और टोकन की तरफ़ देखा।
टोकन ठंडा था — एकदम शांत — जैसे वो भी सोच रहा हो कि अब क्या।
॥
गाड़ी जैसे ही अदालत की गली में घुसी, सामने काकी खड़ी थीं — सिर पर दुपट्टा भी नहीं, हाथ में छोटू की उँगली।
बंसी ने ब्रेक मारा।
“काकी, आप यहाँ?”
काकी गाड़ी की खिड़की तक आईं और मेरा हाथ पकड़ लिया। उनके हाथ सूखे होंठ काँप रहे थे।
“मन्नू, वो खिचड़ी खाने बैठे थे। मैंने ही तो बनाई थी। छोटू को खिला रही थी, तभी पीछे के दरवाज़े से दो आदमी आए।”
“कैसे दिखते थे?”
“काले कुर्ते। एक के हाथ में लाठी नहीं थी। दोनों ने शेखर बाबू की बाँह पकड़ी और खींचकर बाहर ले गए। उनकी थाली टेबल पर गिरी। छिछड़ी फैल गई।”
छोटू मेरी तरफ़ देखकर बोला, “मैंने दौड़कर देखा। गली खाली थी। पर धूल में टायरों के निशान थे और उन पर एक निशान बना था।”
“कैसा निशान?”
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