The Token System828 / 1154

The Token System – Chapter 828

6 min read November 6, 2026

"क्योंकि ये लाइन उसकी अपनी नहीं थी," मैंने कहा। "उसे किसी ने लिखने को कहा था — एक नक़ल करने को। वो मूल काग़ज़ की नक़ल बनाकर भेज रहा था। और असली अपने मालिक के पास रखा था।"

शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा। "तो असली काग़ज़ कहाँ है?"

"वहीं जहाँ असली मालिक है।" मैंने चिट्ठी फिर जेब से निकाली। "और वो रात की छत पर मिलने का बुलावा भेज रहा है। मतलब मुझे अंदाज़ा है कि वो इस पूरे खेल का एक हिस्सा मुझे बनाना चाहता है।"

"तो क्या जाएगा?"

"हाँ जाऊँगा।"

"मन्नू!" काकी की आवाज़ पीछे से आई। "फिर से अकेले? पिछली बार तेरी हड्डी…"

"काकी," मैंने मुड़कर कहा, "इस बार अकेला नहीं जाऊँगा।"

मैंने राजेंद्र की तरफ़ देखा।

वो अपनी जेब से रुमाल निकालकर हाथ पोंछ रहा था। "क्या?"

"तेरे पास नंबर है किसी ऐसे की जो छत पर चुपचाप चढ़ सके?"

राजेंद्र ने मुझे घूरा। "हम पुलिस हैं, चोर नहीं।"

"मैंने चोर नहीं कहा। सिर्फ़ इतना कहा कि अंधेरे में पीछे से पहुँच सके।"

वो कुछ सोचने लगा।

भवानी अचानक हँसा। हथकड़ी में उसकी हँसी अजीब लग रही थी।

"तू समझता है मन्नू, तू छत तक पहुँचेगा?" उसने कहा। "मैं तुझे एक बात बताता हूँ। जिस आदमी ने ये खेल खेला है — उसने मेरे जैसे दस लोगों को बनाया और फेंक दिया। तू क्या है? तू तो अभी शुरुआत में है।"

"तूने तो बहुत खेला," मैंने कहा। "फिर भी हथकड़ी पहन रखी है।"

उसकी हँसी मर गई।

राजेंद्र ने भवानी की तरफ़ इशारा किया और सिपाहियों को उसे गाड़ी की तरफ़ ले जाने का आदेश दिया। जाते-जाते भवानी ने गर्दन घुमाकर मुझे देखा। उसकी आँखों में गुस्सा नहीं था। कुछ और था। डर। पहली बार मैंने भवानी को डरते देखा।

गाड़ी की दरवाज़ा बंद हुआ। भीड़ धीरे-धीरे बिखरने लगी।

काकी मेरे पास आईं। उन्होंने शेखर बाबू की कलाई पकड़ी — अभी भी रस्सी के निशान थे। "अंदर क्या किया तुमको इतने दिन?"

शेखर बाबू ने मुस्कुराने की कोशिश की। "कुछ नहीं काकी। भूखा रखा, बस। पर मैंने काग़ज़ बचा लिए।"

"भूखा?" काकी की आवाज़ भर्राई। "चल, पहले घर। तेरे लिए खिचड़ी बनाऊँगी।"

वो उन्हें साथ ले गईं। बीरा देवी भी चली गईं, लाठी की ठक-ठक सड़क पर गूँज रही थी।

मैं वहीं खड़ा रहा। सड़क खाली हो रही थी। सुमन दूर दुकान की छत पर बैठी थी। वो मेरी तरफ़ देख रही थी। मैंने हाथ हिलाया, वो नीचे उतर आई।

"क्या सोच रहे हो?" उसने पूछा।

"ये सब जो हुआ — मुझे भीड़ जुटाने का ख़्याल रामदीन ने दिया था।" मैंने कहा। "अगर वो साज़िश में है, तो उसने मुझे इस रात भवानी के होम तक खींचने का काम क्यों किया? ऐसा तो नहीं कि हम पकड़े जाते?"

"नहीं," सुमन ने कहा। "पकड़े तो भवानी गए।"

हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा।

"तो क्या ये सब — बुलाना, भीड़, खुलासा — पहले से तय था?" सुमन धीरे से बोली।

"हो सकता है।" मैंने टोकन जेब में रखा। "मुझे वो छत चाहिए।"

घर लौटकर मैंने चप्पल उतारी। दरवाज़े पर किशनचंद बैठे थे। उन्होंने मुझे देखा और पूछा, "क्या हुआ?"

"पापा, रामलाल का नाम आपने सुना है?"

उनका चेहरा बदला। उन्होंने अख़बार मोड़ा। "क्यों?"

"बस पूछ रहा हूँ।"

"मैं तेरे साथ कोर्ट में था न। रामलाल तो कोई दूर का रिश्तेदार था। माँ को बताया? और ये क्या, तेरे कपड़ों पर धूल?" उन्होंने मेरे कुर्ते पर हाथ फेरा। "कहीं धक्का-मुक्की हुई?"

"नहीं, बस भीड़ थी।"

वो कुछ कहने ही वाले थे कि माँ आ गईं। "छोड़ो इसे, पहले खाना दो।"

मैं अंदर चला गया। खाना खाया। पर मेरा दिमाग़ उस चिट्ठी पर अटका था। "तीसरा।"

मैंने सुमन को फ़ोन लगाया। "एक काम कर। बंसी के घर जा। रामदीन की कोई डायरी, कोई काग़ज़ मिले तो ले आ।"

"अभी?"

"अभी। और सुन — किसी को बताना नहीं कि मैंने कहा।"

"ठीक है।"

फ़ोन रखकर मैंने टोकन निकाला। गरम था। शब्द अभी भी वही — "देख। पहले।"

पर मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। पहले क्या देखूँ? चिट्ठी? काग़ज़? भवानी? या उसका डरा हुआ चेहरा?

मैंने टोकन जेब में रखा और बाहर आया।

छत दूर नहीं थी। गली के मोड़ पर पुरानी इमारत थी जिसकी छत पर मोहल्ले के लड़के रात में बैठते थे। पर आज वहाँ कोई नहीं था।

रास्ते में राजेंद्र का फ़ोन आया। "रामदीन पकड़ा गया।"

"कहाँ से?"

"स्टेशन के पास। टिकट ले रहा था। पर उसके पास कुछ नहीं मिला। कहता है उसने सिर्फ़ मेरी डायरी का पन्ना फाड़ा, बस।"

"जब पकड़ा गया, फ़ोन पर किससे बात कर रहा था?"

"यही तो। फ़ोन उसके पास नहीं है। कहता है कहीं गिर गया।"

मैं रुक गया। "राजेंद्र, पक्का कर — वो फ़ोन उसने किसी को दिया था?"

"मैं कोशिश करूँगा। पर तू छत पर मत जा। ये जाल हो सकता है।"

"मुझे पता है।" मैंने फ़ोन काटा।

छत की सीढ़ियाँ ऊपर को मुड़ती थीं। मैं चढ़ने लगा। पहला पायदान — पैर की आवाज़ तेज़ गूँजी। मैंने सोचा, रुक जाऊँ। पर नहीं, रुका तो जीवन भर मन खट्टा रहेगा।

दूसरी मंज़िल तक आया। वहाँ बीच में एक कमरा था, दरवाज़ा खुला। अंदर अंधेरा। मैंने जेब से मोबाइल निकाला। बैटरी कम थी। मैंने टॉर्च जलाई।

कमरे में कुछ नहीं — बस एक टूटी कुर्सी और दीवार पर एक शीशा। शीशे पर धूल थी। धूल में उँगली से कुछ लिखा था।

"अंदर आ।"

मैंने चारों तरफ़ देखा। कोई नहीं।

फिर छत के दरवाज़े से आवाज़ आई — धीमी, हँसी जैसी। "ऊपर आ जा मन्नू। तेरी टोकन गरम हो रही होगी।"

टोकन गरम था। बहुत। मैंने जेब से निकाला। उस पर लिखा था — "अब।"

मैंने छत का दरवाज़ा खोला। बाहर हवा चल रही थी। कोई खड़ा था — पर सामने नहीं, छत के किनारे पर। पीठ मेरी तरफ़।

"तो तू है तीसरा?"

वो मुड़ा। मैंने उसे पहचाना और मेरे हाथ से मोबाइल गिर गया। चेहरा वो था जिसे मैंने हर रोज़ देखा था, कभी सोचा भी नहीं था।

पर इससे पहले कि मैं कुछ बोलता, एक और आवाज़ आई, सीढ़ियों से — हाँफती हुई।

सुमन। वो दौड़कर आई और रुकी, हाथ में कुछ दबाए हुए।

"मन्नू," वो हाँफते हुए बोली, "रामदीन के कमरे में ये मिला।"

उसने एक काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने पढ़ा — कुछ लिखा हुआ नहीं था। सिर्फ़ एक नक्शा — उस होम का, जहाँ शेखर बाबू बंद थे। और नक्शे में पीछे की तरफ़ एक कमरा जिस पर गोला बना था और उसके नीचे लिखा था — "यहाँ मिलेगा तीसरा।"

मैंने सुमन को छत के किनारे की तरफ़ देखने से रोका, पर वो पहले ही देख चुकी थी। उसने आवाज़ नहीं निकाली।

वो वहाँ खड़ा था और मुस्कुरा रहा था।

"छोड़ दे मन्नू," उसने कहा। "तूने बहुत कर लिया। अब ये मेरा काम है।"

मैंने पीछे मुड़कर देखा — कोई नहीं आया था। फिर उसकी तरफ़ देखा। मेरे हाथ में काग़ज़ काँप रहा था।

और तभी शेखर बाबू का वो काग़ज़ याद आया — "हिसाब का असली मालिक: रामलाल का पोता।"

रामलाल के कोई पोता नहीं था। बीरा देवी ने खुद कहा था। फिर ये बात किसने लिखी, और किसके लिए?

अगर रामलाल का पोता सच में नहीं है — तो इसका मतलब जो नाम इस काग़ज़ पर है, वो मेरे ही परिवार का किसी का है। कोई जो खुद को रामलाल का पोता कहता है।

मैंने धीरे से कहा, "तूने तो बहुत पहले कह दिया था अपना नाम, मुझे समझ नहीं आया। राजेंद्र।"

राजेंद्र मुस्कुराया। "जज साहब के सामने बैठकर मैंने रामलाल का नाम पहचान लिया था। तूने नहीं पहचाना। हम एक ही पोते के हैं मन्नू।"

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